October 22, 2026 2:43 pm

स्वास्थ्य विभाग में निलंबन का इंजेक्शन ! डॉ. धर्मेन्द्र गहवई निलंबित, मंत्रालय के आदेश से मचा हड़कंप!वर्षों से एक ही जगह जमे उपसंचालक पर शासन का चाबुक!

स्वास्थ्य विभाग में निलंबन का इंजेक्शन ! डॉ. धर्मेन्द्र गहवई निलंबित, मंत्रालय के आदेश से मचा हड़कंप!वर्षों से एक ही जगह जमे उपसंचालक पर शासन का चाबुक!
स्वास्थ्य सेवाओं के संचालनालय में गिरी पहली गाज, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही के कथित भ्रष्टाचार मामले को लेकर भी उठे सवाल; अब दूसरे विकेट का इंतजार!

महासमुंद/नवा रायपुर। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग में 21 अक्टूबर 2026 को जारी एक शासकीय आदेश ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है। लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, छत्तीसगढ़ शासन ने स्वास्थ्य सेवाओं के संचालनालय, नवा रायपुर में पदस्थ उपसंचालक डॉ. धर्मेन्द्र कुमार गहवई को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। शासन के इस आदेश के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली, अधिकारियों की जवाबदेही और लंबे समय से उठ रही शिकायतों पर कार्रवाई को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।

शासन के आदेश में स्पष्ट उल्लेख है कि डॉ. धर्मेन्द्र कुमार गहवई द्वारा छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियम, 1965 के नियम 3 एवं 22 (क) का उल्लंघन किए जाने के फलस्वरूप उनके विरुद्ध निलंबन की कार्रवाई की गई है। यह आदेश मंत्रालय महानदी भवन, नवा रायपुर अटल नगर से जारी किया गया है। आदेश पर अवर सचिव दिव्या वैष्णव के हस्ताक्षर हैं।इस कार्रवाई को स्वास्थ्य विभाग के प्रशासनिक ढांचे में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, निलंबन आदेश में नियमों के उल्लंघन के विशिष्ट तथ्यों का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है। ऐसे में पूरे मामले की वास्तविक परिस्थितियां और आगे की विभागीय कार्रवाई जांच तथा आधिकारिक अभिलेखों से ही स्पष्ट हो सकेंगी।

मंत्रालय का सख्त संदेश—नियमों से ऊपर कोई नहीं!

शासन द्वारा जारी आदेश क्रमांक ESTB/38010/2026-HEALTH SECTION-1, दिनांक 21 अक्टूबर 2026 के अनुसार, डॉ. धर्मेन्द्र कुमार गहवई को छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966 के नियम 9(1)(क) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है।इस आदेश के साथ ही उनके निलंबन काल के दौरान मुख्यालय भी निर्धारित कर दिया गया है। उन्हें संभागीय संयुक्त संचालक, स्वास्थ्य सेवाएं, रायपुर संभाग, रायपुर के कार्यालय में मुख्यालय निर्धारित किया गया है। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि वे सक्षम अधिकारी की अनुमति के बिना मुख्यालय नहीं छोड़ सकेंगे।

निलंबन अवधि में डॉ. गहवई को मूलभूत नियम-53 के अंतर्गत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ते की पात्रता भी प्रदान की गई है।

प्रशासनिक दृष्टि से यह कार्रवाई इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी अधिकारी को निलंबित करना केवल पद से दूर करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि विभागीय अनुशासन के तहत आगे की कार्रवाई का हिस्सा भी हो सकता है। हालांकि, निलंबन अपने आप में दोषसिद्धि नहीं है। संबंधित अधिकारी को अपना पक्ष रखने और नियमानुसार प्रक्रिया का सामना करने का अवसर प्राप्त होगा।

वर्षों से एक ही जगह पदस्थ रहने पर भी उठे सवाल!

इस घटनाक्रम के बीच इनकी लगातार शिकायते  हो रही थी यह दावा किया जा रहा है कि डॉ. धर्मेन्द्र कुमार गहवई लंबे समय से स्वास्थ्य सेवाओं के संचालनालय में पदस्थ थे और उनके कामकाज को लेकर पहले भी शिकायतें की गई थीं।इन शिकायतों और विभागीय गतिविधियों की जानकारी स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों, यहां तक कि सचिव स्तर तक पहुंचाई जाती रही है। अब निलंबन आदेश सामने आने के बाद पुराने मामलों और शिकायतों की स्थिति को लेकर सवाल उठने लगे हैं।यदि पूर्व में प्रस्तुत शिकायतें विभाग के पास लंबित रही हैं, तो यह भी जांच का विषय हो सकता है कि उन पर समय रहते क्या कार्रवाई की गई, शिकायतों की जांच किस स्तर पर हुई और संबंधित अधिकारियों से क्या जवाब मांगा गया। सूत्रों से मिली जानकारी से यह ज्ञात हुआ है कि डॉ. धर्मेन्द्र कुमार गहवई आयुष्मान भारत योजना के प्रभारी भी थे छत्तीसगढ़ में आयुष्मान भारत योजना के भ्रष्टाचार का लगातार प्रकाशन किया जा रहा है निजी अस्पतालों द्वारा ओडिशा से मरीजो को लाकर फर्जी तरीके से  ईलाज के नाम सेआयुष्मान कार्ड  ब्लॉकिंग किया जा रहा है !

क्या डॉ. धर्मेन्द्र कुमार गहवई को हटाने के पीछे यह भी एक कारण हो सकता है आयुष्मान भारत योजना में निजी अस्पतालों के संचालको के साथ  इनके संलिप्ता लम्बे समय से थी ?

हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि तथा शिकायतों पर हुई कार्रवाई का आधिकारिक विवरण उपलब्ध होना आवश्यक है। इसलिए इन आरोपों को जांच के निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि शिकायतों  द्वारा उठाए गए सवालों के रूप में देखा जाना चाहिए।

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही का मामला फिर चर्चा में!

डॉ. गहवई के निलंबन के बाद गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय में कथित भ्रष्टाचार से जुड़े मामले को लेकर भी शिकायतकर्ता ने गंभीर सवाल उठाए हैं।शिकायतकर्ता का आरोप है कि उक्त मामले में अनियमितताओं को सामने लाने और उन पर प्रभावी कार्रवाई कराने के बजाय उन्हें दबाने में डॉ. गहवई की भूमिका रही। इस संबंध में शिकायतकर्ता का कहना है कि पूर्व में भी अधिकारियों को शिकायतें भेजी गई थीं।

यह आरोप गंभीर प्रकृति का है। यदि संबंधित कार्यालय में भ्रष्टाचार या वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतें हुई थीं, तो उनकी निष्पक्ष जांच, अभिलेखों का परीक्षण और जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका निर्धारित करना आवश्यक है। लेकिन डॉ. गहवई के निलंबन आदेश में गौरेला-पेंड्रा-मरवाही के इस कथित मामले को निलंबन का कारण नहीं बताया गया है। इसलिए दोनों घटनाक्रमों के बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करने के लिए आधिकारिक दस्तावेजों और जांच के निष्कर्षों की आवश्यकता होगी।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या विभाग इस मामले की स्वतंत्र जांच कराएगा? क्या पूर्व में प्रस्तुत शिकायतों की समीक्षा होगी? और क्या संबंधित कार्यालय के रिकॉर्ड खंगालकर जिम्मेदारी तय की जाएगी? इन सवालों पर स्वास्थ्य विभाग की ओर से स्थिति स्पष्ट किया जाना महत्वपूर्ण होगा।

पहला विकेट गिरा, अब दूसरे विकेट पर निगाहें!

स्वास्थ्य विभाग में हुई इस कार्रवाई को लेकर शिकायतकर्ता पक्ष ने संतोष व्यक्त करते हुए कहा है कि देर से ही सही, कार्रवाई की शुरुआत हुई है। शिकायतकर्ता के शब्दों में, “खैर, देर आई मगर दुरुस्त आई। अभी एक विकेट गिरा है, अब संचालनालय में दूसरे विकेट का इंतजार है।”यह बयान विभाग में अन्य संभावित अनियमितताओं की जांच और जवाबदेही तय करने की मांग को सामने लाता है। हालांकि, किसी अन्य अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई होगी या नहीं, यह संबंधित शिकायतों, उपलब्ध साक्ष्यों और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय पर निर्भर करेगा।

स्वास्थ्य विभाग आम नागरिकों की जिंदगी से सीधे जुड़ा हुआ है। सरकारी अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता, चिकित्सकीय सेवाओं की गुणवत्ता, योजनाओं का क्रियान्वयन और सरकारी धन का पारदर्शी उपयोग ऐसी जिम्मेदारियां हैं, जिनमें किसी भी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता की शिकायत को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

अब जांच और जवाबदेही की असली परीक्षा!

डॉ. धर्मेन्द्र कुमार गहवई के निलंबन के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या विभागीय कार्रवाई केवल निलंबन तक सीमित रहेगी या संबंधित तथ्यों की निष्पक्ष जांच कर आगे का निर्णय भी लिया जाएगा।शासन के सामने यह अवसर है कि पूर्व में प्राप्त शिकायतों, विभागीय फाइलों, जांच प्रतिवेदनों और संबंधित कार्यालयों के अभिलेखों की नियमानुसार समीक्षा की जाए। यदि किसी अन्य अधिकारी की भूमिका सामने आती है, तो साक्ष्यों के आधार पर उचित कार्रवाई की जाए। वहीं, जिन आरोपों की पुष्टि नहीं होती, उनके संबंध में भी स्पष्ट निष्कर्ष सामने आना चाहिए।

फिलहाल 21 अक्टूबर 2026 का निलंबन आदेश स्वास्थ्य विभाग में जवाबदेही को लेकर एक बड़ा घटनाक्रम है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि विभाग कथित अनियमितताओं से जुड़े सवालों पर कितना पारदर्शी रुख अपनाता है और लंबित शिकायतों की जांच में कितनी तेजी दिखाता है।

क्योंकि सरकारी व्यवस्था में असली कसौटी केवल कार्रवाई का आदेश जारी करना नहीं, बल्कि तथ्यों की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय करना और जनता का विश्वास कायम रखना है।

 

Leave a Comment

और पढ़ें

Cricket Live Score

Corona Virus

Rashifal

और पढ़ें

error: Content is protected !!