September 18, 2026 7:03 am

नियमितीकरण के नाम पर ₹15 हजार की वसूली का आरोप:दैनिक वेतन भोगियों को कथित तौर पर दिया जा रहा ‘पैसा दो, स्थायी हो जाओ’ का लालच

नियमितीकरण के नाम पर ₹15 हजार की वसूली का आरोप:दैनिक वेतन भोगियों को कथित तौर पर दिया जा रहा ‘पैसा दो, स्थायी हो जाओ’ का लालच—उच्च अधिकारियों और मंत्री के नाम के इस्तेमाल की सूचना से बढ़ी चिंता!

नया रायपुर। छत्तीसगढ़ के वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग में कार्यरत दैनिक वेतन भोगी वाहन चालकों और कर्मचारियों के नियमितीकरण के नाम पर कथित अवैध वसूली किए जाने का मामला सामने आने के बाद विभागीय स्तर पर हड़कंप मच सकता है। वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग वाहन चालक/कर्मचारी संघ, छत्तीसगढ़, पंजीयन क्रमांक 122202319004 की ओर से प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख, अरण्य भवन, अटल नगर, नया रायपुर को भेजे गए पत्र में गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

पत्र क्रमांक 10, दिनांक 16 फरवरी 2026 को संघ के प्रांत सचिव हैदर अली ने आरोप लगाया है कि कुछ व्यक्तियों अथवा संगठनों द्वारा विभाग में कार्यरत दैनिक वेतन भोगी वाहन चालकों एवं अन्य कर्मचारियों से नियमितीकरण और स्थायीकरण के नाम पर ₹15,000 प्रति कर्मचारी की राशि कथित रूप से मांगी जा रही है। इतना ही नहीं, पत्र के अनुसार कर्मचारियों के बीच यह बात भी कही जा रही है कि जो कर्मचारी निर्धारित राशि देगा, उसी का नियमितीकरण अथवा स्थायीकरण कराया जाएगा।

यहीं से पूरा मामला गंभीर सवालों के घेरे में आ जाता है—अगर वास्तव में किसी कर्मचारी से नियमितीकरण के नाम पर पैसा मांगा जा रहा है तो आखिर यह रकम किसके नाम पर ली जा रही है? किसके भरोसे पर कर्मचारी अपनी मेहनत की कमाई दे रहे हैं? और क्या इस पूरी गतिविधि की जानकारी विभागीय अधिकारियों को है?

सबसे बड़ा सवाल—नाम बड़े, जिम्मेदारी किसकी?

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कथित वसूली के दौरान कुछ मामलों में छत्तीसगढ़ के वन विभाग के उच्च अधिकारियों और वन के विभागीय मंत्री के नाम का भी हवाला दिए जाने की बात सामने आ रही है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि जांच के बिना नहीं की जा सकती, लेकिन यदि किसी कर्मचारी से सरकारी सेवा में नियमितीकरण का भरोसा दिलाकर किसी मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी अथवा शासन के नाम का इस्तेमाल करते हुए धन लिया जा रहा है, तो यह बेहद गंभीर विषय है।

क्योंकि नियमितीकरण कोई निजी सौदा नहीं, बल्कि शासन के नियमों, पात्रता, उपलब्ध नीतियों और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय से जुड़ा प्रशासनिक विषय है। ऐसे में किसी व्यक्ति या कथित संगठन द्वारा धन लेकर नियमितीकरण कराने का दावा किया जाना अपने आप में जांच का विषय बन जाता है।

जंगल सफारी पहले ही जारी कर चुका है चेतावनी!

संघ के पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि जंगल सफारी, नवा रायपुर के कार्यालय द्वारा दिनांक 19 जून 2026 को क्रमांक/स्था./265 के माध्यम से कर्मचारियों को इस प्रकार की धोखाधड़ी से सावधान करने के लिए सामान्य परिपत्र जारी किया जा चुका है।

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यदि संबंधित कार्यालय ने कर्मचारियों को पहले ही सावधान किया था, तो अब सवाल यह उठता है कि ऐसी शिकायतें अन्य वन मंडलों और कार्यालयों तक क्यों पहुंच रही हैं? क्या चेतावनी के बावजूद कथित वसूली का नेटवर्क सक्रिय है? अथवा अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग लोग कर्मचारियों को भ्रमित कर रहे हैं?

इन सवालों का जवाब केवल निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है।

चार-पांच हजार कर्मचारी, तो रकम कितनी?

छत्तीसगढ़ के वन विभाग में यदि हजारों दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी कार्यरत हैं और उनमें से बड़ी संख्या से नियमितीकरण के नाम पर ₹15 हजार की कथित वसूली की जा रही है, तो मामला कुछ हजार रुपये का नहीं रह जाता।

मसलन, केवल उदाहरण के तौर पर यदि 4,000 कर्मचारियों से ₹15 हजार की राशि ली जाए तो रकम ₹6 करोड़ होती है। वहीं 5,000 कर्मचारियों से यही राशि ली जाए तो यह आंकड़ा ₹7.50 करोड़ तक पहुंच जाता है।

यह केवल गणितीय अनुमान है, किसी वास्तविक वसूली का प्रमाण नहीं। वास्तविक राशि कितनी है, कितने कर्मचारियों से पैसा लिया गया और किस व्यक्ति अथवा संगठन तक पैसा पहुंचा—यह सब जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकता है।

क्या जिला और परिक्षेत्र स्तर के अधिकारियों को जानकारी नहीं?

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि यदि किसी वन मंडल, वन परिक्षेत्र या कार्यालय में कर्मचारियों से नियमितीकरण के नाम पर कथित रूप से पैसा मांगा जा रहा है, तो क्या इसकी जानकारी संबंधित अधिकारियों को नहीं है?

यदि जानकारी नहीं है, तो यह प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है और विभाग को जिला, वन मंडल तथा परिक्षेत्र स्तर पर सूक्ष्म जांच करानी चाहिए।

और यदि किसी अधिकारी को जानकारी है, तो फिर यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि शिकायत सामने आने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

संगठन की बैठकें भी जांच के दायरे में आएं

ऐसी शिकायतों के मद्देनजर एक अन्य महत्वपूर्ण मांग यह भी उठ रही है कि विभाग से जुड़े कर्मचारी संगठनों की गतिविधियों में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।

यदि कोई संगठन विभागीय कर्मचारियों के नाम पर बैठक, सम्मेलन या संगठनात्मक कार्यक्रम आयोजित करता है, तो संबंधित संगठन की पंजीयन प्रमाण-पत्र की प्रति विभागीय कार्यालय में उपलब्ध होनी चाहिए। साथ ही बैठक का उद्देश्य, स्थान और आयोजक पदाधिकारियों की जानकारी सक्षम अधिकारी के संज्ञान में लाई जानी चाहिए।

विशेष रूप से यदि किसी शासकीय विश्राम गृह या अन्य सरकारी परिसर में बैठक आयोजित की जाती है, तो उसके लिए पूर्व सूचना, संगठन के पंजीयन दस्तावेज और बैठक का उद्देश्य संबंधित अधिकारी को प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इससे वैध कर्मचारी संगठन और किसी कथित फर्जी अथवा अनधिकृत गतिविधि के बीच अंतर स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है।

जांच हो तो सामने आएगा असली चेहरा

संघ ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख से मामले में तत्काल जांच कराने, कथित अवैध वसूली करने वाले व्यक्तियों या संगठनों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने तथा सभी वन मंडलों और कार्यालयों के लिए स्पष्ट जागरूकता आदेश जारी करने की मांग की है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी अक्सर आर्थिक रूप से कमजोर स्थिति में होते हैं। यदि उन्हें नौकरी के भविष्य और नियमितीकरण का सपना दिखाकर पैसे देने के लिए मजबूर या प्रेरित किया जा रहा है, तो मामला केवल वित्तीय लेनदेन का नहीं, बल्कि कर्मचारियों के भरोसे और उनके भविष्य से जुड़ा विषय बन जाता है।

अब निगाहें वन विभाग के उच्च अधिकारियों पर हैं। क्या विभाग इस शिकायत को केवल एक संगठन का पत्र मानकर फाइलों में दबा देगा, या फिर जिला स्तर से लेकर परिक्षेत्र स्तर तक वास्तविक जांच कराएगा?

जांच में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि कथित वसूली हुई या नहीं, कितने कर्मचारियों से राशि मांगी गई, राशि किसने मांगी, किस माध्यम से ली गई, क्या किसी अधिकारी अथवा राजनीतिक पदाधिकारी का नाम इस्तेमाल किया गया और क्या किसी कर्मचारी को नियमितीकरण का लिखित अथवा मौखिक आश्वासन दिया गया।

यदि आरोप गलत हैं तो जांच से स्थिति साफ होगी और यदि आरोपों में तथ्य पाए जाते हैं तो दोषियों की पहचान भी हो सकेगी।

दैनिक वेतन भोगियों के भविष्य के नाम पर यदि कहीं कोई आर्थिक खेल चल रहा है, तो उसका पर्दाफाश निष्पक्ष जांच से ही संभव है। अब सवाल सिर्फ ₹15 हजार का नहीं, बल्कि उन हजारों कर्मचारियों के भरोसे का है जिनके भविष्य को किसी भी प्रकार के कथित लालच, भय या भ्रम से प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।

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