वनविभाग में अरण्ड भवन से तबादलों का उड़ता हुआ फरमान:अब कुर्सी पर फेविकोल या तबादले की दस्तक?
वर्षों से जमे वनकर्मियों पर अब उठे सवाल!पीसीसीएफ कार्यालय का आदेश—हर वनमंडल से 10-10 कर्मचारियों के स्थानांतरण प्रस्ताव 2 दिन में मांगे, महासमुंद में 10-15 साल से एक ही जगह जमे कर्मचारियों की सूची सामने आने का इंतजार!
रायपुर/छत्तीसगढ़ वन विभाग में लंबे समय से एक ही स्थान पर पदस्थ कर्मचारियों और अधिकारियों के तबादले को लेकर अब हलचल तेज होती दिखाई दे रही है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख कार्यालय, अरण्य भवन, सेक्टर-19, अटल नगर नवा रायपुर द्वारा 28 सितंबर 2026 को जारी आदेश ने वर्षों से एक ही कार्यालय, शाखा, वन परिक्षेत्र अथवा सेक्शन में पदस्थ कर्मचारियों की पदस्थिति पर नए सिरे से सवाल खड़े कर दिए हैं।
कार्यालय के आदेश क्रमांक प्रशा. अराज .1/444/ 2026/4976 के माध्यम से समस्त मुख्य वन संरक्षकों को निर्देशित किया गया है कि उनके वृत्त के अंतर्गत आने वाले वनमंडल कार्यालयों में ऐसे कर्मचारियों से स्थानांतरण के आवेदन प्राप्त किए जाएं, जो लंबे समय से एक ही स्थान पर पदस्थ हैं अथवा स्वास्थ्यगत गंभीर समस्या, पारिवारिक परेशानी तथा शासकीय सेवक पति-पत्नी को एक स्थान पर पदस्थ करने जैसे कारणों से स्थानांतरण चाहते हैं।
वन विभाग से सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आदेश में प्रत्येक वनमंडल से लगभग 10-10 कर्मचारियों के स्थानांतरण प्रस्ताव प्राथमिकता के आधार पर तैयार कर, संबंधित मुख्य वन संरक्षक की अनुशंसा एवं अभिमत सहित दो दिवस के भीतर प्रधान मुख्य वन संरक्षक कार्यालय को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।
आदेश ने खोल दिया वर्षों से जमे कर्मचारियों का मुद्दा
वन विभाग के इस आदेश के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या स्थानांतरण की प्रक्रिया केवल कर्मचारियों द्वारा आवेदन देने तक सीमित रहेगी, या फिर वनमंडल स्तर पर अधिकारियों द्वारा स्वयं भी वर्षों से एक ही स्थान पर पदस्थ कर्मचारियों की वास्तविक पदस्थिति का परीक्षण किया जाएगा?
महासमुंद वनमंडल को लेकर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वनमंडल कार्यालय, उपमंडल कार्यालय और विभिन्न वन परिक्षेत्र कार्यालयों में कुछ कर्मचारी लंबे समय से एक ही स्थान पर पदस्थ हैं। दावा किया जा रहा है कि कुछ कर्मचारी 10 से 15 वर्षों से एक ही कार्यालय अथवा क्षेत्र में कार्यरत हैं और इस अवधि में उनका परिक्षेत्र तक नहीं बदला गया।
कुछ मामलों में यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि वनरक्षक से वनपाल तथा वनपाल से उप वन क्षेत्रपाल जैसे पदोन्नति के बाद भी कुछ कर्मचारियों की कार्यस्थल पदस्थिति में अपेक्षित बदलाव नहीं हुआ।
पदोन्नति हुई, पद बदला, लेकिन कुर्सी वही?
वन विभाग की कार्यप्रणाली में पदोन्नति के बाद जिम्मेदारियों और पद की प्रकृति में बदलाव होता है। ऐसे में यदि कोई कर्मचारी वर्षों तक एक ही स्थान पर बना रहता है तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या उसकी पदस्थिति का समय-समय पर प्रशासनिक परीक्षण हुआ?
यही सवाल कार्यालयीन कर्मचारियों को लेकर भी उठाया जा रहा है। आरोप है कि कुछ बाबू ऐसे हैं जो अपनी पदस्थापना के दिन से लेकर आज तक उसी वनमंडल अथवा वन परिक्षेत्र कार्यालय में कार्यरत हैं। कुछ कर्मचारियों के बारे में यह भी दावा किया जा रहा है कि वर्षों से उनका सेक्शन तक नहीं बदला।
ऐसी स्थिति में अब 28 सितंबर का आदेश महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि दो दिन के भीतर भेजे जाने वाले प्रस्तावों से यह सामने आ सकता है कि संबंधित वनमंडलों ने वास्तव में लंबे समय से एक ही स्थान पर पदस्थ कर्मचारियों की पदस्थिति का कितना गंभीरता से परीक्षण किया।
महासमुंद, बागबाहरा, पिथौरा, बसना और सरायपाली पर निगाह!
महासमुंद वनमंडल के अंतर्गत आने वाले वन परिक्षेत्र कार्यालय महासमुंद, बागबाहरा, पिथौरा, बसना और सरायपाली क्षेत्र के कार्यालयों में लंबे समय से पदस्थ कर्मचारियों को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।
आरोप है कि प्रत्येक क्षेत्र में ऐसे अधिकारी-कर्मचारी मौजूद हैं जो कथित रूप से लंबे समय से उसी स्थान पर पदस्थ हैं। हालांकि वास्तविक स्थिति संबंधित विभागीय सेवा अभिलेख, पदस्थापना आदेश और स्थानांतरण रिकॉर्ड के परीक्षण के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
अब निगाहें इस बात पर है कि संबंधित!
वनमंडलाधिकारी और उच्च अधिकारी इन कर्मचारियों की वास्तविक पदस्थापना अवधि का परीक्षण किस प्रकार करते हैं और स्थानांतरण प्रस्ताव में किन कर्मचारियों के नाम शामिल किए जाते हैं।
सवाल—आवेदन नहीं तो क्या प्रशासन स्वयं करेगा परीक्षण?
सबसे अहम सवाल यही है कि यदि कोई कर्मचारी वर्षों से एक ही स्थान पर पदस्थ होने के बावजूद स्थानांतरण के लिए आवेदन नहीं करता, तो क्या विभागीय अधिकारी उसकी पदस्थिति का स्वतः परीक्षण कर प्रस्ताव तैयार करेंगे?
या फिर केवल उन्हीं कर्मचारियों के नाम प्रस्तावित किए जाएंगे, जिन्होंने स्वयं आवेदन प्रस्तुत किया है?
यहीं से आदेश की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है। यदि विभाग वर्षों से एक ही स्थान पर पदस्थ कर्मचारियों का रिकॉर्ड सामने रखकर निष्पक्ष परीक्षण करता है तो लंबे समय से लंबित स्थानांतरण संबंधी सवालों का जवाब मिल सकता है। वहीं यदि प्रस्ताव केवल चुनिंदा आवेदनों तक सीमित रहता है, तो पारदर्शिता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
“कुर्सी तोड़ रहे या व्यवस्था चला रहे?”
विभाग में लंबे समय से जमे कर्मचारियों को लेकर उठ रहे सवालों ने अब एक तीखा रूप ले लिया है। आरोप लगाने वालों का कहना है कि कुछ कर्मचारी वर्षों से एक ही शाखा या कार्यालय में जमे हुए हैं और उनकी पदस्थापना में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं हुआ।
इसी संदर्भ में यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि क्या कुछ कर्मचारियों की कुर्सियां इतनी स्थायी हो गई हैं कि स्थानांतरण आदेश भी वहां तक पहुंचने से पहले ही रास्ता बदल लेते हैं?
हालांकि इन आरोपों की वास्तविकता का निर्धारण विभागीय रिकॉर्ड और सक्षम जांच के आधार पर ही किया जा सकता है।
अब प्रस्ताव बताएगा विभाग की मंशा!
28 सितंबर के आदेश के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज वे प्रस्ताव होंगे जिन्हें संबंधित मुख्य वन संरक्षक और वनमंडलाधिकारी शासन स्तर पर भेजेंगे। इन्हीं प्रस्तावों से यह स्पष्ट होगा कि वर्षों से एक ही स्थान पर पदस्थ कर्मचारियों के मामलों को किस प्राथमिकता से देखा गया।
यदि लंबे समय से पदस्थ कर्मचारियों की जानकारी प्रस्तावों में शामिल होती है तो विभागीय व्यवस्था में व्यापक बदलाव की शुरुआत मानी जा सकती है। वहीं यदि ऐसे कर्मचारियों के नाम लगातार बाहर रहते हैं, तो प्रशासनिक पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठने की संभावना बनी रहेगी।
शिकायतकर्ता ने संकेत दिया है कि यदि नियमों के अनुरूप वास्तविक पदस्थिति का परीक्षण नहीं किया गया और लंबे समय से एक ही स्थान पर पदस्थ कर्मचारियों को प्रस्ताव प्रक्रिया से बाहर रखा गया, तो शासन स्तर पर संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध शिकायत प्रस्तुत की जाएगी।
अब गेंद वन विभाग के पाले में है—दो दिन में भेजे जाने वाले प्रस्ताव बताएंगे कि वर्षों से जमी कुर्सियों पर तबादले की आरी चलेगी या फिर पुरानी व्यवस्था ही कायम रहेगी











