September 24, 2026 6:55 pm

गरीबों के कैंसर इलाज के लियें 125 करोड़ की उम्मीद पर निजीकरण का ग्रहण!विनोद चंद्राकर का बड़ा आरोप,

गरीबों के कैंसर इलाज के लियें 125 करोड़ की उम्मीद पर निजीकरण का ग्रहण!विनोद चंद्राकर का बड़ा आरोप“गरीबों के इलाज को नीलाम कर रही साय सरकार, सरकारी सुविधा पर निजी शुल्क का खतरा”!

महासमुंद। छत्तीसगढ़ में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक बार फिर सियासी घमासान तेज हो गया है। बिलासपुर में निर्माणाधीन प्रदेश के पहले सरकारी कैंसर अस्पताल को लेकर महासमुंद के पूर्व विधायक एवं छत्तीसगढ़ शासन के पूर्व संसदीय सचिव विनोद सेवनलाल चंद्राकर ने भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। चंद्राकर ने आरोप लगाया है कि करीब 125 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हो रहा सरकारी कैंसर अस्पताल शुरू होने से पहले ही निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर ली गई है।

चंद्राकर ने इसे गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों के हितों से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताते हुए कहा कि जिस अस्पताल का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का सरकारी और अपेक्षाकृत सुलभ उपचार उपलब्ध कराना था, उसी अस्पताल के संचालन को निजी क्षेत्र को सौंपने का निर्णय सरकार की स्वास्थ्य नीति पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

125 करोड़ की लागत, 70 करोड़ केंद्र का अंश—फिर निजी मॉडल क्यों?

पूर्व संसदीय सचिव के मुताबिक बिलासपुर में बन रहा यह कैंसर अस्पताल लगभग 125 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया जा रहा है। इसमें करीब 70 करोड़ रुपये केंद्र सरकार का अंश बताया गया है। उनका दावा है कि अस्पताल का 90 प्रतिशत से अधिक निर्माण कार्य पूरा हो चुका है।

चंद्राकर का कहना है कि अस्पताल के संचालन के लिए पहले सरकारी स्तर पर चिकित्सकों और कर्मचारियों की नियुक्ति की योजना थी। करीब 289 पदों पर डॉक्टरों एवं कर्मचारियों की भर्ती की जानी थी। योजना के अनुसार सिम्स के विशेषज्ञ चिकित्सकों की सेवाओं से अस्पताल का संचालन किया जाना था तथा प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर जैसे पद भी भरे जाने थे।

लेकिन अब, चंद्राकर के आरोप के मुताबिक, प्रस्तावित सरकारी भर्तियों को रद्द कर दिया गया है और सिम्स के चिकित्सकों की भूमिका भी समाप्त कर अस्पताल को पीपीपी यानी पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल पर संचालित करने की दिशा में कदम बढ़ाया जा रहा है।

सरकारी भवन, लेकिन निजी अस्पताल जैसा शुल्क?”

चंद्राकर ने सरकार के इस निर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि निर्माण सरकारी धन से हुआ है, जमीन और आधारभूत संरचना सरकार की है तथा अस्पताल की स्थापना का उद्देश्य आम जनता को उपचार उपलब्ध कराना है, तो उसके संचालन में निजी संस्था को प्राथमिक भूमिका देने का औचित्य क्या है?

उनका आरोप है कि पीपीपी मॉडल में यदि मरीजों से निजी क्षेत्र के अनुरूप शुल्क लिया गया तो इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ेगा।

कैंसर का इलाज पहले से ही लंबा और महंगा होता है। बीमारी की जांच, कीमोथेरेपी, रेडिएशन, सर्जरी, दवाइयां और नियमित फॉलोअप जैसे उपचारों में परिवार की आर्थिक स्थिति पर भारी दबाव पड़ सकता है। ऐसे में सरकारी अस्पतालों से मरीजों को कम लागत पर उपचार मिलने की उम्मीद रहती है।

चंद्राकर ने इसी बिंदु को उठाते हुए कहा कि यदि सरकारी संसाधनों से बने अस्पताल में भी निजी शुल्क व्यवस्था प्रभावी होती है तो आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के सामने उपचार जारी रखना चुनौती बन सकता है।

“यह अकेला मामला नहीं, स्वास्थ्य व्यवस्था के निजीकरण की कड़ी है”

पूर्व विधायक ने आरोप लगाया कि बिलासपुर का कैंसर अस्पताल कोई अलग मामला नहीं है। उनके मुताबिक इससे पहले भी प्रदेश में नवनिर्मित 11 मंजिला सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के संचालन को निजी हाथों में सौंपे जाने का मामला सामने आया है।

उन्होंने दावा किया कि प्रदेश के विभिन्न जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों की लैब सेवाओं को भी निजी कंपनियों को सौंपने की प्रक्रिया चल रही है। चंद्राकर का आरोप है कि जांच सेवाओं के निजीकरण से मरीजों को जांच के नाम पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि यदि सरकारी अस्पतालों की महत्वपूर्ण सेवाएं लगातार आउटसोर्स की जाती रहीं तो आने वाले समय में सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों का मूल स्वरूप ही बदल सकता है।

“स्वास्थ्य विभाग को आउटसोर्स करने की दिशा में बढ़ रही सरकार”

चंद्राकर ने कहा कि अस्पताल केवल भवन नहीं होता, बल्कि डॉक्टर, नर्स, तकनीकी कर्मचारी, जांच सुविधा, दवा, मशीनरी और मरीजों के प्रति जवाबदेही मिलकर एक सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था बनाते हैं। ऐसे में अस्पताल के संचालन और महत्वपूर्ण सेवाओं को लगातार निजी एजेंसियों के हवाले करने से सरकार की प्रत्यक्ष जवाबदेही पर सवाल उठ सकते हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार का मॉडल अब स्वास्थ्य सेवाओं में भी निजीकरण को बढ़ावा देने वाला बनता जा रहा है।

हालांकि, पीपीपी मॉडल के समर्थकों की ओर से आमतौर पर यह तर्क दिया जाता है कि निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता, तकनीकी दक्षता और प्रबंधन क्षमता का उपयोग करके अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं। ऐसे मॉडल में सरकार द्वारा मरीजों के लिए निर्धारित दरें, पात्रता, मुफ्त अथवा रियायती उपचार और सेवा-स्तर की शर्तें महत्वपूर्ण होती हैं। इसलिए कैंसर अस्पताल के मामले में वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार और निजी संचालक के बीच हुए समझौते में मरीजों के लिए क्या शुल्क, मुफ्त उपचार और निगरानी की व्यवस्था निर्धारित की गई है।

अस्पताल से आगे बढ़ा सियासी हमला!

चंद्राकर ने स्वास्थ्य व्यवस्था के मुद्दे को प्रदेश की व्यापक सरकारी नीतियों से जोड़ते हुए भाजपा सरकार पर तीखा राजनीतिक हमला बोला। उन्होंने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य ऐसी बुनियादी सेवाएं हैं, जिन्हें केवल व्यावसायिक गतिविधि के रूप में नहीं देखा जा सकता।

उन्होंने केंद्र सरकार की नीतियों का उल्लेख करते हुए रेलवे, हवाई अड्डे, बंदरगाह, कोयला, बिजली, एलआईसी और बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े निजीकरण के मुद्दों पर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार भी उसी दिशा में आगे बढ़ रही है।

उन्होंने कहा कि सरकारी स्कूलों में युक्तियुक्तकरण, राशन दुकानों की संख्या में बदलाव और स्वास्थ्य संस्थानों के संचालन में निजी भागीदारी जैसे निर्णयों को जनता के नजरिए से देखने की जरूरत है।

गरीबों के इलाज का रास्ता बंद नहीं होना चाहिए”

चंद्राकर ने कहा कि सरकार की प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को समय पर इलाज मिले और आर्थिक स्थिति इलाज के रास्ते में बाधा न बने।

उन्होंने मांग की कि बिलासपुर के निर्माणाधीन कैंसर अस्पताल के संचालन मॉडल को सार्वजनिक किया जाए। अस्पताल में कितने मरीजों को निशुल्क या रियायती उपचार मिलेगा, कौन-कौन सी सेवाएं उपलब्ध होंगी, निजी संस्था को किस आधार पर संचालन दिया जा रहा है, मरीजों से कितना शुल्क लिया जाएगा और सरकार की निगरानी व्यवस्था क्या होगी—इन सभी बिंदुओं पर सरकार को स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए।

2028 के चुनाव का भी आया जिक्र!

अपने बयान के अंत में चंद्राकर ने भाजपा सरकार की नीतियों को लेकर राजनीतिक चेतावनी भी दी। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश की जनता सरकार की नीतियों और फैसलों को देख-समझ रही है और आने वाले विधानसभा चुनाव में जनता इसका जवाब देगी।

कैंसर अस्पताल को लेकर उठे सवाल अब केवल एक अस्पताल के संचालन तक सीमित नहीं रह गए हैं। यह मामला सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की दिशा, पीपीपी मॉडल की भूमिका, मरीजों पर संभावित आर्थिक प्रभाव और सरकार की जवाबदेही से जुड़ा व्यापक राजनीतिक मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है।

अब निगाहें सरकार के आधिकारिक पक्ष और उस समझौते की शर्तों पर टिकी हैं, जिसके आधार पर अस्पताल के संचालन का मॉडल तय किया जा रहा है। यदि सरकार इन सवालों पर स्पष्ट करती है कि गरीब मरीजों को कौन-कौन सी मुफ्त या रियायती सुविधाएं मिलेंगी और निजी संचालन के बावजूद सरकारी नियंत्रण किस तरह कायम रहेगा, तो विवाद के कई पहलुओं पर स्थिति साफ हो सकती है।

फिलहाल बिलासपुर का 125 करोड़ रुपये का यह निर्माणाधीन कैंसर अस्पताल स्वास्थ्य सुविधा से कहीं आगे बढ़कर सत्ता और विपक्ष के बीच नीतिगत टकराव का नया केंद्र बन चुका है—एक तरफ सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं को आधुनिक और प्रभावी बनाने की दलील होगी, तो दूसरी तरफ विपक्ष सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के निजीकरण को लेकर सवाल उठा रहा है। असली कसौटी यही होगी कि अस्पताल शुरू होने के बाद कैंसर मरीजों को उपचार कितनी आसानी से, कितने खर्च में और कितनी पारदर्शिता के साथ उपलब्ध होता है।

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