छत्तीसगढ़ में धान खरीदी से ठीक पहले पटवारियों की बेमियादी हड़ताल! किसानों के सामने नया संकट, चरमराई राजस्व व्यवस्था! विनोद सेवनलाल चंद्राकर!
विनोद चंद्राकर का भाजपा सरकार पर तीखा हमला—“तकनीकी आदेशों की जिद में पिस रहे किसान, फौती-नामांतरण से लेकर धान पंजीयन तक कामकाज प्रभावित होने का खतरा”
महासमुंद। छत्तीसगढ़ में धान खरीदी का समय नजदीक आते ही किसानों की चिंता बढ़ने लगी है। एक ओर किसान अपनी मेहनत से तैयार धान को समर्थन मूल्य पर बेचने की तैयारी में जुटे हैं, तो दूसरी ओर राजस्व पटवारियों की बेमियादी हड़ताल ने जमीन से जुड़े जरूरी कामकाज को लेकर नई परेशानी खड़ी कर दी है। फौती, नामांतरण, बंटवारा, भूमि अभिलेखों में त्रुटि सुधार और फसल सत्यापन जैसे कार्य प्रभावित होने की आशंका के बीच अब धान खरीदी की तैयारियों पर भी सवाल उठने लगे हैं।
पूर्व विधायक एवं छत्तीसगढ़ शासन के पूर्व संसदीय सचिव विनोद सेवन लाल चंद्राकर ने इस स्थिति को लेकर भाजपा सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार के अव्यावहारिक आदेशों और कर्मचारियों की समस्याओं की अनदेखी के कारण प्रदेश में बार-बार आंदोलन की स्थिति बन रही है, जिसका खामियाजा अंततः आम जनता और किसानों को भुगतना पड़ रहा है।
चंद्राकर ने कहा कि धान खरीदी से ठीक पहले किसानों को राजस्व संबंधी कार्यों के लिए परेशान होना पड़े, यह गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने सरकार से पटवारी संघ के साथ तत्काल बातचीत कर हड़ताल समाप्त कराने तथा धान खरीदी की प्रक्रिया प्रभावित न होने देने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था बनाने की मांग की।
पीवी ऐप बना विवाद की वजह, तकनीकी परेशानियों पर उठे सवाल!
विनोद चंद्राकर के अनुसार, राजस्व पटवारियों की बेमियादी हड़ताल के पीछे नए पीवी ऐप यानी फिजिकल वेरिफिकेशन ऐप के माध्यम से डिजिटल सर्वे और जीपीएस आधारित फोटो अपलोड करने की अनिवार्यता प्रमुख कारण है। पटवारी इस व्यवस्था को लेकर तकनीकी और व्यावहारिक समस्याएं सामने रख रहे हैं।
उन्होंने कहा कि पटवारी संघ द्वारा सर्वर डाउन रहने, लोकेशन मैच नहीं होने और फसलों के भौतिक सत्यापन में आने वाली कठिनाइयों की जानकारी सरकार को पहले ही दिए जाने की बात कही गई थी। इसके बावजूद समस्याओं का समाधान नहीं होने से कर्मचारियों को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा।
चंद्राकर का कहना है कि डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल प्रशासनिक कार्यों को आसान बनाने के लिए होना चाहिए, न कि ऐसी बाध्यता के रूप में, जिससे कर्मचारियों को काम करने में परेशानी हो और उसका असर आम जनता पर पड़े। उन्होंने सरकार से मांग की कि ऐप से जुड़ी तकनीकी खामियों की समीक्षा कराई जाए और व्यावहारिक समाधान निकलने तक विवादित अनिवार्यताओं पर पुनर्विचार किया जाए।
हालांकि, इस मामले में सरकार का पक्ष और ऐप संबंधी तकनीकी समस्याओं पर विभाग की आधिकारिक स्थिति भी सामने आना आवश्यक है, ताकि विवाद का समाधान तथ्यों और व्यावहारिक परिस्थितियों के आधार पर हो सके।
धान बेचने की तैयारी में जुटे किसानों की बढ़ सकती है परेशानी!
धान खरीदी से पहले किसानों के लिए भूमि संबंधी अभिलेखों का दुरुस्त होना बेहद महत्वपूर्ण है। कई मामलों में किसान अपनी जमीन के रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने, मृत खातेदार के स्थान पर वारिसों के नाम चढ़वाने, जमीन का बंटवारा कराने अथवा रिकॉर्ड में त्रुटियां सुधारने के लिए राजस्व कार्यालयों के चक्कर लगाते हैं।
विनोद चंद्राकर ने कहा कि पटवारियों की हड़ताल के कारण ऐसे कामकाज प्रभावित होने से किसानों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। उनके मुताबिक, धान खरीदी के लिए पंजीयन की प्रक्रिया के दौरान यदि जमीन के रिकॉर्ड में जरूरी सुधार नहीं हो पाता, तो किसानों को अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
उन्होंने आशंका जताई कि जिन किसानों के भूमि अभिलेखों में नाम, रकबा या अन्य विवरण संबंधी त्रुटियां हैं, उनके सामने धान बेचने के समय दिक्कतें खड़ी हो सकती हैं। ऐसे में किसानों को समय रहते राहत देना सरकार की जिम्मेदारी है।
चंद्राकर ने कहा कि किसान पूरे साल मेहनत करके फसल तैयार करता है। खाद, बीज, सिंचाई, मजदूरी और कृषि उपकरणों पर खर्च करने के बाद उसकी उम्मीद रहती है कि धान खरीदी शुरू होते ही वह अपनी उपज बेचकर आर्थिक जरूरतें पूरी कर सकेगा। लेकिन यदि जरूरी राजस्व दस्तावेज समय पर दुरुस्त नहीं होते, तो किसान को कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं।
फौती, नामांतरण और बंटवारे के प्रकरणों पर बढ़ सकता है दबाव!
पूर्व विधायक ने राजस्व विभाग में लंबित प्रकरणों को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पटवारी प्रतिवेदन के बिना कई राजस्व मामलों के निराकरण में बाधा उत्पन्न हो सकती है। तहसीलदार और अनुविभागीय अधिकारी राजस्व (एसडीएम) कार्यालयों में ऐसे मामलों की प्रक्रिया प्रभावित होने से आम नागरिकों को इंतजार करना पड़ सकता है।
फौती दर्ज कराने, नामांतरण, बंटवारा और भूमि अभिलेखों में त्रुटि सुधार जैसे कार्य ग्रामीण क्षेत्रों में बेहद जरूरी हैं। इनका संबंध केवल धान खरीदी से ही नहीं, बल्कि जमीन के स्वामित्व संबंधी रिकॉर्ड, पारिवारिक बंटवारे और अन्य प्रशासनिक जरूरतों से भी जुड़ा होता है।
चंद्राकर ने धारा 115 के अंतर्गत लंबित प्रकरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले से लंबित मामलों के बीच यदि नए प्रतिवेदन भी समय पर तैयार नहीं होते, तो राजस्व कार्यालयों पर काम का दबाव और बढ़ सकता है। उन्होंने मांग की कि सरकार लंबित प्रकरणों की स्थिति की समीक्षा करे और जरूरी मामलों के निराकरण के लिए ठोस कार्ययोजना बनाए।
छात्रों के प्रमाण पत्रों पर भी पड़ सकता है असर!
पटवारियों की हड़ताल का असर केवल किसानों तक सीमित रहने की आशंका नहीं है। विनोद चंद्राकर ने कहा कि जाति प्रमाण पत्र और मूल निवास प्रमाण पत्र जैसे जरूरी दस्तावेज बनवाने वाले विद्यार्थियों और अन्य आवेदकों को भी परेशानी हो सकती है।
विशेष रूप से ऐसे छात्र, जिन्हें स्कूल, कॉलेज, छात्रवृत्ति, प्रवेश प्रक्रिया अथवा प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए निर्धारित समय सीमा के भीतर दस्तावेज जमा करने होते हैं, उनके लिए देरी मुश्किल पैदा कर सकती है। हालांकि, अलग-अलग प्रमाण पत्रों की प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका के अनुसार प्रभाव की स्थिति अलग-अलग हो सकती है।
उन्होंने कहा कि प्रशासनिक व्यवस्था का उद्देश्य नागरिकों को समय पर सुविधाएं उपलब्ध कराना है। इसलिए कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान और जनता के जरूरी कामों को जारी रखना, दोनों प्राथमिकताएं होनी चाहिए।
सरकार से तीन प्रमुख मांगें, समाधान नहीं निकला तो बढ़ेंगी मुश्किलें!
विनोद चंद्राकर ने राज्य सरकार से तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग करते हुए कहा कि पटवारी संघ के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत कर विवाद का समाधान निकाला जाए। उन्होंने तकनीकी बाध्यताओं पर पुनर्विचार करने, डिजिटल सर्वे में आ रही समस्याओं को दूर करने और किसानों के हित में गिरदावरी तथा धान पंजीयन की वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
उनके अनुसार, सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि फसल सत्यापन और राजस्व अभिलेखों से संबंधित जरूरी कार्य अनिश्चितकाल तक लंबित न रहें। यदि समय रहते व्यवस्था नहीं सुधारी गई, तो धान खरीदी के दौरान किसानों को अतिरिक्त परेशानी हो सकती है। इसके साथ ही फसल नुकसान के सर्वे जैसे अन्य महत्वपूर्ण कार्यों पर भी असर पड़ने की आशंका है।
उन्होंने कहा कि कर्मचारियों की मांगों और प्रशासनिक जरूरतों के बीच टकराव बढ़ने के बजाय संवाद के माध्यम से समाधान निकाला जाना चाहिए। तकनीकी व्यवस्था लागू करने से पहले उसकी उपयोगिता, नेटवर्क की उपलब्धता, मैदानी परिस्थितियों और कार्यभार का आकलन करना जरूरी है।
किसानों को राहत मिले, राजस्व व्यवस्था पटरी पर लौटे!
चंद्राकर ने अंत में कहा कि धान खरीदी छत्तीसगढ़ के लाखों किसानों की आर्थिक स्थिति से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। ऐसे समय में राजस्व व्यवस्था का सुचारु संचालन और भूमि रिकॉर्ड का समय पर दुरुस्त होना आवश्यक है। सरकार को किसानों की समस्याओं को प्राथमिकता देते हुए पटवारियों की हड़ताल समाप्त कराने के लिए ठोस पहल करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसानों को अपनी ही जमीन के दस्तावेज दुरुस्त कराने के लिए बार-बार कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें और न ही राजस्व संबंधी देरी के कारण उनकी धान बिक्री प्रभावित हो। सरकार, राजस्व विभाग और पटवारी संघ के बीच समन्वय स्थापित करके ही इस संकट को टाला जा सकता है।
अब बड़ा सवाल यह है कि धान खरीदी की तैयारियों के बीच सरकार पटवारियों की मांगों का समाधान कितनी जल्दी निकालती है और किसानों के जरूरी राजस्व कार्यों को निर्बाध रखने के लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था करती है। किसानों की निगाहें अब प्रशासनिक पहल पर टिकी हैं, क्योंकि समय पर समाधान ही उन्हें संभावित परेशानी से राहत दिला सकता है।











