“सागौन की खुशबू में घोटाले की आहट! जम्हर में जब्ती के पीछे छुपी है 70 पेड़ों की अवैध कटाई? रेंजर पर संरक्षण का आरोप—जांच या लीपापोती?”
Mahasamund/महासमुंद वन मंडल के पिथौरा वन परिक्षेत्र अंतर्गत ग्राम जम्हर में की गई हालिया कार्रवाई ने जहां एक ओर वन विभाग की तत्परता और सख्ती का संदेश दिया, वहीं दूसरी ओर उसी कार्रवाई को लेकर कई गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। 13 जनवरी 2026 की तड़के सुबह गुप्त सूचना के आधार पर सीताराम चौधरी के घर पर छापेमारी कर सागौन की कीमती लकड़ी जब्त की गई। विभाग के अनुसार, लगभग 1 लाख 32 हजार रुपये मूल्य की सागौन लकड़ी—लट्ठे और चिरान—घर और बाड़ी में छिपाकर रखी गई थी। आरोपी ने पूछताछ में स्वीकार किया कि उसने अपनी बेटी की शादी के लिए फर्नीचर बनवाने के उद्देश्य से मजदूरों से जंगल से लकड़ी मंगवाई थी। कानूनन यह अपराध है और भारतीय वन अधिनियम के तहत सख्त कार्रवाई का प्रावधान है।
इस कार्रवाई का संचालन वन मंडलाधिकारी मयंक पांडेय के निर्देशन में तथा संयुक्त वन मंडलाधिकारी डिम्पी बैस के मार्गदर्शन में किया गया। ऑपरेशन का नेतृत्व वन परिक्षेत्र अधिकारी शालिकराम डड़सेना ने किया। टीम में सहायक परिक्षेत्र अधिकारी, परिसर रक्षी और अन्य कर्मचारी शामिल रहे। जब्त की गई वन संपदा को काष्ठागार पिथौरा भेजकर आगे की जांच शुरू की गई। वन अपराध प्रकरण क्रमांक 13417/25 दर्ज किया गया, जो भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 33 सहित अन्य प्रासंगिक धाराओं के अंतर्गत है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती—यहीं से असली सवाल शुरू होते हैं।
सूत्रों के दावे और सवालों की लंबी कतार स्थानीय सूत्रों और ग्रामीणों के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि ग्राम जम्हर के कक्ष क्रमांक 242 में कथित तौर पर लगभग 70 सागौन पेड़ों की अवैध कटाई हुई है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या घर से बरामद लकड़ी की जब्ती, उस बड़े पैमाने की अवैध कटाई को “कवर” करने की कार्रवाई तो नहीं? क्या यह छापेमारी असल में बड़े मामले से ध्यान हटाने का प्रयास है? सूत्रों का आरोप है कि पिथौरा परिक्षेत्र के रेंजर शालिकराम डड़सेना को बचाने के लिए यह सीमित कार्रवाई दिखाई गई, जबकि जंगल के भीतर कटे हुए सैकड़ों पेड़ों के ठूंठ आज भी सच्चाई बयां कर रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक, आरोप यह भी है कि आरोपी सीताराम चौधरी से कथित तौर पर लाखों का लेनदेन कर मामला नियम विरुद्ध तरीके से दर्ज किया गया। यदि ये आरोप सही हैं, तो यह न केवल विभागीय लापरवाही बल्कि गंभीर भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं हुई है और विभाग की ओर से इन पर कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है।
ठूंठों की जांच—क्यों चुप्पी?
सबसे बड़ा और अहम प्रश्न यह है कि क्या अवैध कटाई के बाद जंगल में बचे ठूंठों की वैज्ञानिक और स्थल-आधारित जांच की गई? वन संरक्षण के मामलों में ठूंठों की गिनती, उनकी ताजगी, कटाई का समय और क्षेत्रफल का आकलन ही सच्चाई तक पहुंचने का आधार होता है। यदि वास्तव में कक्ष क्रमांक 242 में बड़े पैमाने पर सागौन कटे हैं, तो उनकी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं? क्या उच्चाधिकारियों द्वारा स्वतंत्र जांच दल गठित किया गया? या फिर मामला कागजों में ही सिमटकर रह जाएगा?
कानून और नैतिकता की कसौटी!
सागौन जैसे बहुमूल्य वृक्षों की अवैध कटाई केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि पर्यावरणीय अपराध है। यह जैव विविधता, जल-चक्र और स्थानीय आजीविका पर सीधा प्रहार है। भारतीय वन अधिनियम और लोक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम ऐसे अपराधों पर कठोर दंड का प्रावधान करते हैं। यदि किसी अधिकारी पर संरक्षण या मिलीभगत के आरोप हैं, तो विभागीय जांच और निलंबन जैसी त्वरित कार्रवाइयां अपेक्षित होती हैं। सवाल यह है कि क्या रेंजर स्तर पर कोई जवाबदेही तय की गई? या जांच की दिशा केवल एक आरोपी तक सीमित रखी गई है?
विभाग की अपील बनाम जमीनी हकीकत!
वन विभाग ने ग्रामीणों से अपील की है कि वे अवैध गतिविधियों की सूचना दें और जंगलों की रक्षा में भागीदार बनें। यह अपील तभी सार्थक होगी जब सूचना देने वालों को भरोसा हो कि कार्रवाई निष्पक्ष होगी—न कि चुनिंदा। जम्हर की घटना ने इसी भरोसे की परीक्षा ले ली है। ग्रामीण पूछ रहे हैं: “अगर बड़े पैमाने पर कटाई हुई है, तो सिर्फ घर से बरामद लकड़ी पर ही कार्रवाई क्यों?”
विभाग की आगे क्या कार्यवाही करेगा या अपने रेंजर को बचाएगा?
अब निगाहें उच्च स्तरीय जांच पर टिकी हैं। क्या कक्ष क्रमांक 242 का संयुक्त निरीक्षण होगा? क्या ठूंठों की गिनती और कटाई-समय का वैज्ञानिक आकलन सार्वजनिक किया जाएगा? क्या आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए बाहरी या स्वतंत्र टीम बनाई जाएगी? और सबसे अहम—यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई होगी?
जम्हर की यह कार्रवाई एक मिसाल भी बन सकती है और एक चेतावनी भी—मिसाल, यदि सचमुच पूरी सच्चाई सामने लाई जाए; चेतावनी, यदि यह मामला लीपापोती में दब गया। जंगल जवाब मांग रहा है, ठूंठ गवाही दे रहे हैं, और जनता पारदर्शिता की प्रतीक्षा में है। आगे की जांच ही तय करेगी कि यह “सख्ती” थी या “संरक्षण”—और किसके लिए।
यह वही सालिकराम डडसेना पूर्व में भी महासमुंद परिक्षेत्र में दागदार डिप्टीरेंजर रह चुके है इनको पूर्व में भी निलंबित किया जा चुका है फिर भी विभाग द्वारा इनको पिथौरा परिक्षेत्र अधिकारी बनाया गया इससे ऐसा प्रतीत होता है कि कही ना कही विभाग दागदार कर्मचारियों/अधिकारियों संरक्षण प्रदान कर रहा है।
पूर्व में हमारे द्वारा एक मामले को लेकर विभाग को शिकायत किया गया है लेकिन विभाग की निष्क्रियता के कारण आज भी वह मामल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है और निलंबित की जगह प्रमोशन दिया जा रहा है उस मामले की सच्चाई भी लेकर हम अगले अंक में आएंगे।












