May 7, 2026 11:51 am

कुर्सी की कसमकस या सत्ता का संदेश?”—कोरबा नगर निगम में तिवारी हटे, अनिरुद्ध सिंह की एंट्री से मचा सियासी भूचाल

कुर्सी की कसमकस या सत्ता का संदेश?”—कोरबा नगर निगम में तिवारी हटे, अनिरुद्ध सिंह की एंट्री से मचा सियासी भूचाल!

कोरबा। शहर की सियासत और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक ही नाम गूंज रहा है—“तिवारी हटे, सिंह चढ़े!” कोरबा नगर निगम में हुए इस अचानक प्रशासनिक फेरबदल ने मानो शांत पानी में पत्थर फेंक दिया हो। हर ओर सवाल, हर जुबान पर चर्चा—आखिर ऐसा क्या हुआ कि प्रभारी सम्पदा अधिकारी तिवारी को पद से हटाना पड़ा?
नगर निगम आयुक्त के आदेश ने जैसे ही दस्तक दी, दफ्तरों के भीतर फाइलों की सरसराहट तेज हो गई और बाहर राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ गया। वर्षों से निगम की सम्पदा शाखा संभाल रहे तिवारी को हटाकर यह जिम्मेदारी अनिरुद्ध सिंह को सौंप दी गई। आदेश भले ही कागज पर स्याही भर हो, लेकिन उसके पीछे छिपे संकेतों ने कई लोगों की नींद उड़ा दी है।
सूत्रों की मानें तो यह बदलाव केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि अंदरूनी असंतोष और बढ़ते दबावों का नतीजा बताया जा रहा है। नगर निगम की सम्पदा शाखा—जहां जमीन, दुकान, पट्टे और करोड़ों की संपत्तियों का खेल चलता है—वह हमेशा से विवादों और आरोपों का केंद्र रही है। ऐसे में तिवारी की विदाई को कई लोग “साफ-सफाई अभियान” का हिस्सा बता रहे हैं, तो कुछ इसे “बलि का बकरा” बनाए जाने की कहानी कह रहे हैं।
दफ्तर के भीतर कर्मचारियों के बीच कानाफूसी तेज है। कोई कह रहा है—“ऊपर से दबाव था”, तो कोई फुसफुसा रहा है—“फाइलों में कुछ ऐसा था जो सामने आ सकता था।” हालांकि आधिकारिक तौर पर इस फेरबदल को सामान्य प्रक्रिया बताया जा रहा है, लेकिन अंदरखाने की हलचल कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
इधर, अनिरुद्ध सिंह की नियुक्ति ने भी नई उम्मीदों और आशंकाओं का मिश्रण पैदा कर दिया है। सिंह को तेज-तर्रार और कड़े फैसले लेने वाला अधिकारी माना जाता है। उनके आने से जहां एक ओर व्यवस्था में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग यह भी सोच रहे हैं कि अब “कई पुराने खेल” बंद होने वाले हैं।
राजनीतिक गलियारों में भी यह मुद्दा गर्माया हुआ है। विपक्ष इसे निगम की कार्यशैली पर सवाल उठाने का मौका मान रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे प्रशासनिक मजबूती की दिशा में उठाया गया कदम बता रहा है। कुछ नेताओं का कहना है कि “नगर निगम में पारदर्शिता लाने के लिए ऐसे सख्त फैसले जरूरी हैं”, वहीं विरोधी इसे “आंतरिक खींचतान का परिणाम” बता रहे हैं।
शहर के जानकारों का मानना है कि सम्पदा विभाग में बदलाव का सीधा असर शहर के व्यापारियों और पट्टा धारकों पर पड़ेगा। कई लंबित मामलों की फाइलें अब नए सिरे से खुल सकती हैं। जिन लोगों ने वर्षों से अपनी फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल रखा था, उनके लिए अब यह समय “घबराहट” का हो सकता है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम पर अभी तक तिवारी की ओर से कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। उनकी खामोशी भी कई सवाल खड़े कर रही है। क्या यह चुप्पी तूफान से पहले की शांति है, या फिर एक अधिकारी की मजबूरी—यह आने वाला वक्त ही बताएगा।
वहीं, निगम आयुक्त के इस फैसले को कुछ लोग “सर्जिकल स्ट्राइक” की तरह देख रहे हैं—एक ऐसा कदम, जो बिना ज्यादा शोर के बड़ा असर छोड़ जाता है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अनिरुद्ध सिंह अपनी नई जिम्मेदारी को किस अंदाज में निभाते हैं और क्या वह उन उम्मीदों पर खरे उतर पाते हैं, जो इस बदलाव के साथ जुड़ी हैं।
कुल मिलाकर, कोरबा नगर निगम में हुआ यह फेरबदल केवल एक अधिकारी के हटने और दूसरे के आने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की झलक है, जहां हर फैसला कई परतों में लिपटा होता है। यह घटना आने वाले दिनों में और बड़े खुलासों की भूमिका भी बन सकती है।
फिलहाल, शहर में एक ही चर्चा है—
“तिवारी की विदाई एक अंत है या किसी बड़े खुलासे की शुरुआत?”

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