जिला शिक्षा अधिकारी विजय लहरे हुए पराजय—परीक्षा में विवादित प्रश्न पर शिक्षा विभाग भी दे बैठा ‘उत्तर’: निलंबन!”
छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्यवस्था इन दिनों पढ़ाई से ज्यादा “पहेलियों” के लिए चर्चा में है। मामला इतना दिलचस्प है कि बच्चे तो छोड़िए, बड़े-बड़े अफसर भी सवाल में उलझ गए—और आखिरकार जवाब आया एक जिला शिक्षा अधिकारी के“निलंबन” के रूप में!
जी हां, मामला महासमुंद जिला का है कक्षा चौथी की अंग्रेजी परीक्षा का, जहां मासूम बच्चों से प्रश्नपत्र में पूछा गया—“कुत्ते का नाम क्या है?
“चौथी की परीक्षा में सवाल पर बवाल, कुत्ते का नाम शेरू या राम ? को तत्काल संज्ञान में लेते हुए प्रकरण की जांच कराई गई। जांच उपरांत पाया गया कि जिला अंतर्गत संचालित प्राथमिक शालाओं के अर्धवार्षिक परीक्षा के प्रश्न पत्रों का निर्धारण, मुद्रण एवं वितरण की समस्त जवाबदारी संबंधित जिला शिक्षा अधिकारी की थी, फिर भी विजय कुमार लहरे, प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी महासमुन्द द्वारा परीक्षा के लिए प्रश्न पत्र तैयार करने की प्रक्रिया का निर्धारण एवं कार्य योजना नहीं बनायी गई थी, प्रश्न पत्र तैयार करने में गंभीर लापरवाही की गई है, जिसके कारण कक्षा चौथी के अंग्रेजी विषय के प्रश्न पत्र में पूछे गये प्रश्न में कुत्ते के नाम के विकल्प के रूप में हिन्दु धर्म के आराध्य देव भगवान राम का नाम सम्मिलित किया गया है, जो कि बहुत ही आपत्तिजनक, निंदनीय एवं धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला है, जिससे शासन एवं विभाग की छवि धूमिल हुई है।
महासमुंद जिले में कार्यरत कर्मचारियों द्वारा माननीय उच्च न्यायालय बिलासपुर में दायर की गई याचिका डब्ल्यू.पी. एस. नं. 1745/2022 के संबंध में जिला शिक्षा अधिकारी महासमुंद को विभागीय आदेश क्रमांक ला/1064/2025 अटल नगर दिनांक 26.11.2025 के द्वारा प्रभारी अधिकारी नियुक्त किया गया था। प्रकरण में श्री विजय कुमार लहरे, प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी महासमुंद द्वारा त्वरित कार्यवाही नहीं किया गया। इस संबंध में संचालनालय के विधि शाखा प्रभारी द्वारा भी दिनांक 03.12.2025 को उन्हे व्यक्तिगत व्हॉट्सऐप के माध्यम से अवगत कराया गया था। जिसे भी अनदेखा कर आदेश की अवहेलना करते हुए उक्त प्रकरण में माननीय उच्च न्यायालय में अपील दायर नहीं किया गया। श्री लहरे ने अपने पदीय दायित्वों एवं कर्तव्यों के प्रति सजगता से कार्य नहीं करते हुए स्वेच्छाचारिता मनमाना संव्यवहार किया है।
रायपुर संचालनालय के आदेश क्रमांक/139 आडिट /14/2025-26 दिनांक 30.01.2026 के माध्यम से कार्यालय जिला शिक्षा अधिकारी जिला महासमुंद के विभागीय लेखाओं का अंकेक्षण कराया गया। अंकेक्षण प्रतिवेदन के अनुसार विजय कुमार लहरे, प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी महासमुंद के कार्यकाल के दौरान विभागीय लेखाओं के अंकेक्षण में गंभीर अनियमितता पायी गई है।
विजय कुमार लहरे, जिला शिक्षा अधिकारी, महासमुन्द द्वारा अपने पदीय दायित्वों के निर्वहन में लापरवाही, स्वेच्छाचारिता एवं अनुशासनहीनता की गई है।
श्री लहरे का उक्त कृत्य छ.ग. सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के नियम-5/3 के विपरीत गंभीर कदाचार है।
शेरू या राम?” अब बच्चों के सामने सवाल था कि वे अपनी किताबों पर भरोसा करें या घर में सुनी धार्मिक कहानियों पर!
इस अनोखे सवाल ने ऐसा बवाल मचाया कि शिक्षा विभाग की नींद उड़ गई। जो सवाल बच्चों को ‘पास’ कराने के लिए बनाया गया था, वही सवाल अधिकारियों को ‘फेल’ कर गया।
सवाल छोटा, विवाद बड़ा!
बताया जा रहा है कि यह प्रश्न पत्र जिले की प्राथमिक शालाओं में अर्धवार्षिक परीक्षा के दौरान बांटा गया था। बच्चों ने तो भोलेपन में जवाब दे दिया, लेकिन जब यह खबर जिला के समाचार पत्रों एवं पोर्टलों में छपी, तो विभाग के गलियारों में हड़कंप मच गया।
अफसरशाही की ‘रचनात्मकता’!
जांच में पाया गया कि प्रश्न पत्र बनाने की जिम्मेदारी महासमुंद जिला शिक्षा अधिकारी की थी, लेकिन साहब ने शायद यह सोचकर काम छोड़ दिया कि “कुछ भी पूछ लो, बच्चे तो बच्चे हैं!”
पर यही ‘कुछ भी’ अब जिला शिक्षा अधिकारी विजय लहरे को भारी पड़ गया। सवाल पूछने में इतनी रचनात्मकता दिखाई गई कि विभाग की छवि ही ‘रचनात्मक रूप से धूमिल’ हो गई।
कहा जा रहा है कि प्रश्न पत्र बनाने की कोई ठोस योजना ही नहीं बनाई गई थी। यानी सवाल ऐसे तैयार हुए जैसे व्हाट्सऐप फॉरवर्ड—जो मिला, उसे जोड़ दिया!
व्हाट्सऐप भी हुआ बेअसर!
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। विभाग के विधि शाखा प्रभारी ने भी व्हाट्सऐप के जरिए अधिकारी को जानकारी दी थी कि उच्च न्यायालय में एक केस पर कार्रवाई करनी है।
लेकिन लगता है कि व्हाट्सऐप मैसेज भी उस समय “म्यूट” पर था। न कोई जवाब, न कोई कार्रवाई।
अब लोग कह रहे हैं—“जब सवालों में भगवान को शामिल कर सकते हैं, तो व्हाट्सऐप को क्यों नहीं?”
ऑडिट में भी निकली ‘कहानी’!
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि विभागीय खातों के ऑडिट में भी कई गड़बड़ियां मिलीं। यानी मामला सिर्फ ‘शेरू और राम’ तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरी कहानी ही गड़बड़झाला निकली।
एक अधिकारी ने मजाक में कहा—“यह तो पूरा ‘सिलेबस’ ही गड़बड़ था—प्रश्न पत्र से लेकर खातों तक!”
सरकार का सख्त ‘उत्तर’!
आखिरकार शासन ने इस पूरे प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए संबंधित जिला शिक्षा अधिकारी महासमुंद विजय लहरे को राज्य शासन एतद्वारा छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण,नियंत्रण,अपील) नियम 1966 के नियम-(9)1 को तत्काल प्रभाव निलंबित कर दिया।
अब उनका मुख्यालय कार्यालय संभागीय संयुक्त संचालक रायपुर तय किया गया है, और उन्हें निलंबन काल में “जीवन निर्वाह भत्ता” मिलेगा—यानी अब वे आराम से बैठकर सोच सकते हैं कि अगली बार कुत्ते का नाम क्या रखा जाए!
शिक्षा या मनोरंजन?
इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था अब पढ़ाई से ज्यादा मनोरंजन का माध्यम बनती जा रही है?
जहां बच्चों को भाषा सिखानी थी, वहां उन्हें ‘नामों की राजनीति’ सिखाई जा रही है।पूरे मामले को देखकर यही लगता है कि शिक्षा विभाग ने एक नया फार्मूला खोज लिया है—“अगर सवाल में दम नहीं है, तो विवाद डाल दो!”
लेकिन यह फार्मूला उल्टा पड़ गया, और अब विभाग खुद ही सवालों के घेरे में है।
अब असली सवाल यह है कि—क्या अगली परीक्षा में बच्चों से पूछा जाएगा:“अधिकारी का पद क्या है? जिम्मेदार या लापरवाह?”
और विकल्प होंगे—
(A) योजना बनाना
(B) निलंबित होना
यह पूरा मामला भले ही हास्य और व्यंग्य का विषय बन गया हो, लेकिन यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर करता है।
जहां बच्चों को सही दिशा देने की जरूरत है, वहां सवाल ही दिशा भटकाने लगे—तो समझ लीजिए कि सुधार की जरूरत सिर्फ बच्चों को नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को है।












