खड़ी गाड़ी की दौड़,चलता रहा बिलों के भ्रष्टाचार का खेल!”“मरीज नहीं, बाबुओं की सैर कराती ‘VIP एम्बुलेंस सेवा’ का खुलासा!”
Bilaspur/स्वास्थ्य सेवा—जिसे आम आदमी भगवान का दूसरा रूप मानता है—जब खुद ही हास्य का विषय बन जाए, तो समझिए मामला केवल गड़बड़ी का नहीं, बल्कि “व्यवस्थित अव्यवस्था” का है। ऐसा ही एक चौंकाने वाला, हँसी और हैरानी से भरा मामला सामने आया है, जहाँ एम्बुलेंस ने मरीजों को नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार को ढोया… और वो भी पूरे सिस्टम के संरक्षण में!
कहानी शुरू होती है वर्ष 2022 से, जब SECL ने बड़ी नेक नीयत से आम मरीजों को त्वरित चिकित्सा सुविधा देने के लिए फोर्स कंपनी की चार चमचमाती एम्बुलेंस खरीदीं। उद्देश्य स्पष्ट था—“मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाना।” लेकिन जैसे ही ये एम्बुलेंस स्वास्थ्य विभाग के हवाले हुईं, इनकी “ड्यूटी” बदल गई!
बिना पंजीयन के दौड़ पड़ी व्यवस्था!
अब जरा इस दृश्य की कल्पना कीजिए—गाड़ी नई-नई, लेकिन नंबर प्लेट नहीं! जी हां, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) ने इन एम्बुलेंस का परिवहन विभाग से पंजीयन कराए बिना ही इन्हें बिल्हा, तखतपुर और मस्तूरी के खंड चिकित्सा अधिकारियों को सौंप दिया।
अब नियम कहता है—बिना पंजीयन वाहन सड़क पर नहीं दौड़ सकता। लेकिन यहां नियमों को “आराम” दे दिया गया और एम्बुलेंस “आराम से” दौड़ने लगीं… या यूं कहें कि “कागजों में दौड़ने लगीं”!
एम्बुलेंस बनी विभाग की‘एटीएम मशीन’!
खंड चिकित्सा अधिकारियों और जिला कार्यालय के वाहन शाखा प्रभारी के लिए ये एम्बुलेंस किसी वरदान से कम नहीं थीं। मरीजों की सेवा तो बहाना था, असली खेल था “धन उगाही” का।
हास्यास्पद स्थिति यह रही कि जहां एम्बुलेंस बीमार मरीजों को अस्पताल ले जाने के लिए थीं, वहीं उनका उपयोग उन नियमों के ज्ञाता कर्मचारियों को घुमाने में किया गया, जिन्हें शासकीय वाहन उपयोग करने का कोई अधिकार ही नहीं था।
“खड़ी गाड़ी चलती रही, डीजल पीती रही!”
अब आते हैं इस कहानी के सबसे मजेदार—और सबसे गंभीर—पहलू पर।मस्तूरी में तो कमाल ही हो गया। यहां एम्बुलेंस खड़ी-खड़ी ही “चलती” रही और डीजल पीती रही! रिकॉर्ड्स के अनुसार—
•26 महीनों में 3639 लीटर डीजल डाला गया
•41851 किलोमीटर चलना दर्शाया गया
•लेकिन असल में गाड़ी 15000 किलोमीटर भी नहीं चली!
•अब सवाल उठता है—बाकी 26039 किलोमीटर किसने चलाए?
•शायद “हवा में उड़ने वाली एम्बुलेंस” या “कागजों की रेसिंग कार”!
फर्जी लॉगबुक का खेल!
लॉगबुक—जो किसी भी वाहन की आत्मा होती है—यहां पूरी तरह “कल्पनाशील साहित्य” बन गई। इसमें ऐसे-ऐसे यात्रा विवरण दर्ज किए गए, जिनका हकीकत से कोई लेना-देना नहीं था।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि 15812 किलोमीटर की यात्रा उन कर्मचारियों के नाम दर्ज है, जिन्हें न अनुमति थी, न पात्रता। और मजे की बात—इन यात्राओं को प्रभारी अधिकारी ने प्रमाणित भी नहीं किया!
‘निजी जेब से डीजल’—सरकारी खजाने से भुगतान!
अब इस कहानी में आता है एक और हास्यप्रद मोड़।
मस्तूरी में पदस्थ एक कर्मचारी, श्री एस. ए. नियाजी (B.E.T.O), ने दावा किया कि उन्होंने “हॉट बाजार योजना” के अंतर्गत अपने निजी पैसे से एम्बुलेंस में डीजल भरवाया।उन्होंने 13 बिल वाउचर के साथ आवेदन दिया और कहा—
“मैंने अपने निजी खाते से डीजल भरवाया है, कृपया मुझे रिम्बर्समेंट दिया जाए।”
अब असली मजा देखिए—लॉगबुक में उनके द्वारा वाहन उपयोग का कोई उल्लेख नहीं, फिर भी तत्कालीन BMO ने बिल पास कर दिया और भुगतान भी कर दिया!
वाह! इसे कहते हैं—“न चलने वाली गाड़ी में चलने वाला भुगतान”!
सर्विसिंग के नाम पर ‘वित्तीय सर्विस’!
अब बात करते हैं एम्बुलेंस की “देखभाल” की।
जहां इन वाहनों की सर्विसिंग अधिकृत एजेंसी में होनी चाहिए थी, वहीं इन्हें निजी गैरेज में ले जाया गया। वहां सर्विसिंग और पार्ट्स के नाम पर 3 लाख से अधिक के बिल बना दिए गए।और तो और, एम्बुलेंस के इंजन का एक महत्वपूर्ण पार्ट ही गायब कर दिया गया, जिसकी कीमत 2 से 2.5 लाख रुपये बताई जा रही है!
अब सवाल ये है—क्या एम्बुलेंस खुद ही अपने पार्ट्स “दान” कर रही थी?
25-30 करोड़ का ‘महाघोटाला’!
यह मामला सिर्फ एम्बुलेंस तक सीमित नहीं है। संघ ने आरोप लगाया है कि पिछले वर्षों में CMHO बिलासपुर को विभिन्न योजनाओं के तहत मिले 25 से 30 करोड़ रुपये में भी भारी अनियमितताएं हुई हैं।
इनमें शामिल हैं—
•कर्मचारियों की प्रोत्साहन राशि,
•यात्रा भत्ता,
•प्रशिक्षण राशि,
यानी जहां पैसा होना चाहिए था सेवा के लिए, वहां वह बन गया “सेवा शुल्क”!
जिला कलेक्टर का आदेश—और साल भर की ‘नींद’!
संघ ने इस पूरे मामले की शिकायत कलेक्टर को की। कलेक्टर ने गंभीरता दिखाते हुए CMHO को 7 दिनों के भीतर जांच कर रिपोर्ट देने का आदेश दिया।
लेकिन…
एक साल बीत गया…
और जांच अभी तक “चल रही है”… या शायद “खड़ी है”!सूत्रों के अनुसार, एक जांच समिति भी बनाई गई, लेकिन उसमें कौन है, क्या कर रही है—यह किसी को नहीं पता।शायद वह समिति भी उसी एम्बुलेंस में बैठकर “कागजों में घूम” रही है!
अब CBI और ACB की चेतावनी!
छत्तीसगढ़ प्रदेश स्वास्थ्य कर्मचारी संघ ने हार नहीं मानी। उन्होंने पुनः ज्ञापन सौंपते हुए स्पष्ट चेतावनी दी—
“यदि 15 दिनों के भीतर जांच कर दोषियों पर कार्रवाई नहीं की गई, तो RTI से प्राप्त सभी साक्ष्य CBI और ACB को सौंप दिए जाएंगे।”
इस चेतावनी ने पूरे प्रशासनिक तंत्र में हलचल मचा दी है।
जब जनसेवा बन जाए तमाशा!
यह पूरा मामला एक गंभीर सच्चाई को उजागर करता है—जब सिस्टम में जवाबदेही खत्म हो जाती है, तो सेवा भी तमाशा बन जाती है।एम्बुलेंस, जो जीवन बचाने का प्रतीक होती है, यहां “घोटाले की गाड़ी” बन गई। मरीज इंतजार करते रहे, और गाड़ियां कागजों में दौड़ती रहीं।अगर यही हाल रहा, तो भविष्य में शायद हमें यह सुनने को मिले—
“हमारी एम्बुलेंस इतनी तेज है कि बिना चले ही हजारों किलोमीटर दौड़ जाती है!और इतना ईंधन पीती है कि पेट्रोल पंप भी शर्मिंदा हो जाए!”
अब देखना यह है कि यह मामला भी अन्य फाइलों की तरह “धूल फांकता” है या फिर सच में कोई कार्रवाई होती है।क्योंकि जनता अब सिर्फ इलाज नहीं, जवाब भी चाहती है!












