April 14, 2026 6:55 pm

खण्ड“आधा अधूरा”चिकित्सा”उपचार” आधा-अधूरा उपचार अधिकारी:कसडोल खण्ड चिकित्सा अधिकारी की ‘चयनात्मक कार्रवाई’ से स्वास्थ्य विभाग में मचा बवाल!

खण्ड“आधा अधूरा” चिकित्सा”उपचार”आधा-अधूरा उपचार अधिकारी:कसडोल खण्ड चिकित्सा अधिकारी की ‘चयनात्मक कार्रवाई’ से स्वास्थ्य विभाग में मचा बवाल!

कसडोल से उठी सिसकियां: आदेशों की धज्जियां, नियमों का पोस्टमार्टम और ‘सिस्टम’ का खुला ऑपरेशन!

Baloda bazar/छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग में इन दिनों जो कुछ चल रहा है, उसे देखकर आम जनता के मन में एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या यहां इलाज भी “आधा-अधूरा” और प्रशासन भी “आधा-अधूरा” हो गया है? मामला कसडोल ब्लॉक का है, जहां खण्ड चिकित्सा अधिकारी (BMO) की कार्यप्रणाली ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

दरअसल, 12 मार्च 2026 को संचालनालय स्वास्थ्य सेवाएं छत्तीसगढ़ से एक स्पष्ट और कड़ा आदेश जारी किया गया था। इस आदेश में आयुक्त सह संचालक संजीव झा द्वारा साफ निर्देश दिया गया था कि प्रदेशभर में सभी प्रकार के संलग्नीकरण (अटैचमेंट) को तत्काल प्रभाव से समाप्त किया जाए। यह निर्देश खुद स्वास्थ्य मंत्री की विधानसभा में की गई घोषणा के बाद जारी हुआ था। आदेश में यह भी कहा गया था कि तीन दिन के भीतर कार्रवाई कर उसका प्रमाण प्रस्तुत किया जाए।

लेकिन कसडोल ब्लॉक में इस आदेश का जो “इलाज” किया गया, वह खुद एक गंभीर बीमारी की तरह सामने आया है।

“19 पर गाज, 50 पर मेहरबानी” –आखिर यह कैसा न्याय?

तत्कालीन BMO डॉ. रवि शंकर अजगले ने 27 मार्च को एक आदेश जारी कर 19 स्वास्थ्य संयोजक कर्मचारियों के संलग्नीकरण को समाप्त कर दिया। पहली नजर में यह कार्रवाई शासन के निर्देशों का पालन लगती है, लेकिन जैसे ही परतें खुलती हैं, मामला बेहद संदिग्ध और चौंकाने वाला बन जाता है।

कसडोल खण्ड चिकित्सा अधिकारी

सूत्रों के अनुसार, कसडोल ब्लॉक में केवल 19 नहीं, बल्कि 50 से अधिक अधिकारी और कर्मचारी विभिन्न पदों पर संलग्नीकरण में कार्यरत हैं। लेकिन कार्रवाई सिर्फ उन्हीं 19 कर्मचारियों पर हुई—बाकी को जैसे “छूट” दे दी गई हो।

यहां सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या शासन का आदेश केवल कुछ कर्मचारियों के लिए था? या फिर यह “चयनात्मक न्याय” का एक नया नमूना है, जहां नियमों को भी व्यक्ति देखकर लागू किया जाता है?

आदेश के 3 दिन बाद… फिर नया संलग्नीकरण!

मामला यहीं खत्म नहीं होता। जिस आदेश में संलग्नीकरण समाप्त करने की बात कही गई थी, उसी के कुछ ही दिनों बाद—30 मार्च को—कसडोल BMO द्वारा एक और आदेश जारी किया गया। इस बार दो द्वितीय एएनएम (2nd ANM) को DMF मद से पदस्थ करते हुए उप स्वास्थ्य केंद्र नवागांव से पुटपुरा में संलग्नीकरण कर कार्य करने के निर्देश दे दिए गए।

संलग्नीकरण आदेश

अब सवाल और भी गहरा हो जाता है—जब पूरे प्रदेश में संलग्नीकरण समाप्त करने का आदेश था, तो नया संलग्नीकरण कैसे और किस आधार पर कर दिया गया?

क्या यह आदेशों की खुली अवहेलना नहीं है? या फिर नियमों को अपने हिसाब से “मोड़ने” की कला यहां पूरी तरह विकसित हो चुकी है?

“आधा-अधूरा” शब्द बना हकीकत में तबलीत दिखता!

खण्ड चिकित्सा अधिकारी शब्द का व्यंग्यात्मक अर्थ इन दिनों कसडोल में हकीकत बन गया है। “खण्ड” यानी आधा- अधूरा और “चिकित्सा” यानी उपचार—और यहां प्रशासनिक इलाज भी आधा-अधूरा ही नजर आ रहा है।

जहां एक तरफ शासन के आदेश को लागू करने का दिखावा किया गया, वहीं दूसरी तरफ उसी आदेश की आत्मा को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।

सिस्टम पर उठते बड़े सवाल!

इस पूरे घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—

•क्या BMO को शासन के स्पष्ट आदेशों की जानकारी नहीं थी?

•अगर थी, तो फिर केवल चुनिंदा कर्मचारियों पर ही कार्रवाई क्यों?

•क्या बाकी कर्मचारियों को किसी विशेष “संरक्षण” का लाभ मिल रहा है?

•और सबसे अहम—क्या यह सब बिना उच्च अधिकारियों की जानकारी के संभव है?

क्षेत्र की जनता की स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर!

इस तरह की प्रशासनिक लापरवाही का सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ता है। जब कर्मचारी अपने मूल पदस्थ स्थान पर नहीं होते, तो ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित होती हैं।

संलग्नीकरण की इस “खेल” में सबसे बड़ा नुकसान आम जनता का हो रहा है, जो पहले ही सीमित संसाधनों में भी इलाज के लिए आज भी संघर्ष कर रही है।

क्या होगी कार्रवाई?

अब निगाहें जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों पर टिकी हैं। क्या इस मामले में जांच होगी? क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी? या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?

अगर शासन के आदेशों का इस तरह खुलेआम उल्लंघन होता रहा, तो फिर नियमों और कानूनों का क्या महत्व रह जाएगा?

इलाज से ज्यादा बीमार सिस्टम”!

कसडोल का यह मामला केवल एक ब्लॉक का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। जब आदेशों का पालन “चयनात्मक” हो जाए और नियमों को “सुविधानुसार” लागू किया जाए, तो फिर यह व्यवस्था खुद ही बीमार हो जाती है।

और सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जहां स्वास्थ्य विभाग को लोगों का इलाज करना चाहिए, वहीं अब खुद विभाग के अंदर “उपचार” की जरूरत महसूस होने लगी है।

अब देखना यह है कि इस ‘आधा-अधूरा उपचार’ पर कोई सर्जिकल स्ट्राइक होती है या फिर यह संलग्नीकरण  की बीमारी यूं ही फैलती रहेगी…

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