छत्तीसगढ़ राजस्व विभाग की साख पर गिरी गाज :पत्थलगांव एसडीएम का ड्राइवर बना “बाबू”, सरकारी फाइलों से लेकर जनता के दर्द तक सब कुछ उसी की मुट्ठी में!
भ्रष्टाचार, मनमानी और मिलीभगत का खुला खेल… शासन-प्रशासन क्यों मौन?
Jashpur/ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के गृह जिले में राजस्व विभाग के भीतर से जो तस्वीर उभरकर सामने आई है, उसने पूरे सिस्टम की नींव हिला दी है। जहां शासन “गढ़बो नवा छत्तीसगढ़” का सपना दिखा रहा है, वहीं पत्थलगांव के राजस्व कार्यालय में एक ड्राइवर ही बाबू बन बैठा है! एसडीएम रितुराज सिंह बिसेन का ड्राइवर लम्बोदर यादव न सिर्फ दफ्तर की फाइलें चलाता है, बल्कि अफसरों की तरह आदेश देता और जनता से पैसा वसूलता भी बताया जा रहा है।
यह कोई अफवाह नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत है — दफ्तर में प्रवेश करने वाला हर व्यक्ति जानता है कि “काम तभी होगा जब लम्बोदर यादव बोलेगा।” राजस्व विभाग की इमारत में अब फाइलों से ज्यादा चर्चे “ड्राइवर बाबू” के रसूख के हैं।
भ्रष्टाचार का हब बना राजस्व कार्यालय!
सूत्रों की मानें तो जमीन डायवर्सन, नामांतरण और पेशी से जुड़ी हर फाइल पर “लम्बोदर यादव की मंजूरी” जरूरी मानी जाती है। कई बार अधिकारी अनुपस्थित होते हैं, तब भी यह ड्राइवर अपने मन से नोटिंग कर फाइल आगे बढ़ा देता है।
जानकारों का कहना है कि “एसडीएम का नाम लेकर” वह वसूली करता है — कोई ₹10,000 तो कोई ₹60,000 तक “सेवा शुल्क” के नाम पर देना पड़ता है।
शिकायतें कई बार कलेक्टर कार्यालय तक पहुंची, लेकिन कार्यवाही शून्य ?लोग पूछने लगे हैं —
•“क्या पत्थलगांव का प्रशासन अब ड्राइवरों के भरोसे चल रहा है?”
नागरिकों का दर्द — ‘ड्राइवर से काम करवाना मजबूरी बन गई!’आवेदक हरदेव बताता है-
“हमसे ड्राइवर ने जमीन डायवर्सन के लिए ₹60,000 मांगे। हमने कलेक्टर को शिकायत दी। कलेक्टर ने कहा, ‘पैसा मत दो, काम हो जाएगा।’ और सच में काम हो गया। तब समझ आया कि ड्राइवर ने अपने रसूख से पूरा तंत्र जकड़ रखा है।”
अन्य कई ग्रामीणों का कहना है कि बिना “ड्राइवर साहब” की अनुमति कोई फाइल नहीं चलती। यहां तक कि पेशी में किसे बुलाना है, यह भी वही तय करता है।
प्रशासनिक चुप्पी और जनाक्रोश!
अब सवाल यह है कि जब शिकायतें बार-बार पहुंचीं तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या एसडीएम को अपने ही ड्राइवर के इस “दबदबे” की खबर नहीं? या फिर सब कुछ “मिलीभगत” का नतीजा है?
कई कर्मचारियों ने नाम न बताने की शर्त पर बताया —
“ड्राइवर की पकड़ बहुत मजबूत है। वह सीधे अफसरों के रिश्तेदारों और राजनीतिक आकाओं से जुड़ा हुआ है। इसलिए कोई कुछ कहने की हिम्मत नहीं करता।”
इसी चुप्पी ने अब पूरे जिले में प्रशासन की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या कहते हैं—लम्बोदर यादव (ड्राइवर):
“मेरे ऊपर लगाए गए सारे आरोप निराधार हैं। मैंने किसी से कोई वसूली नहीं की है।”
रितुराज सिंह बिसेन (एसडीएम, पत्थलगांव):-
“मुझे इस पूरे मामले की जानकारी अभी आपके माध्यम से मिल रही है। ऑफिस आने के बाद मैं जांच कराऊंगा।”
स्थानीय नागरिक (नाम न बताने की शर्त पर):
“एसडीएम साहब को सब पता है। बस बोलने की मनाही है। ड्राइवर का आदेश सबके लिए कानून बन गया है।”
शासन-प्रशासन पर उठते सवाल!
यह कोई छोटा मामला नहीं — यह उस व्यवस्था का आईना है जहां भ्रष्टाचार को पद से नहीं, रसूख से मापा जाने लगा है।
अगर मुख्यमंत्री के गृह जिले में एक ड्राइवर खुलेआम फाइलें चला रहा है, तो बाकी जिलों में स्थिति कैसी होगी, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं।
“जब ड्राइवर बनेगा बाबू और अधिकारी बनेंगे मौन, तब ‘गढ़बो नवा छत्तीसगढ़’ नहीं, ‘बिगाड़बो छत्तीसगढ़’ बन जाएगा!”
जनता की मांग: अब चाहिए सख्त कार्रवाई!
स्थानीय सामाजिक संगठनों और व्यापारियों ने प्रशासन से मांग की है कि—
•तत्काल लम्बोदर यादव को राजस्व कार्यालय से हटाया जाए।
•पूरे मामले की स्वतंत्र जांच जिला स्तर पर कराई जाए।
•दोषी पाए जाने पर सम्बंधित अधिकारियों पर भी विभागीय कार्रवाई हो।
लोगों का कहना है कि जब तक इस “ड्राइवर बाबू” जैसे चेहरों पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक आम जनता का विश्वास शासन पर लौटना नामुमकिन है।
पत्थलगांव का यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की बीमारी का लक्षण है — जहां सत्ता के करीब रहने वाले लोग अफसरों से भी ज्यादा ताकतवर बन बैठे हैं।यह कहानी उस सच्चाई की है जहां “सरकारी कुर्सी” पर कोई अफसर बैठा हो या ड्राइवर — फर्क अब मिट चुका है।
क्योंकि पत्थलगांव में आज एक ही सवाल गूंज रहा है —क्या कानून चलेगा या लम्बोदर यादव का राज?













