“आदेशों को ठेंगा दिखाते ग्रंथपाल – जिला शिक्षा अधिकारी और संचालनालय के निर्देश बेअसर… नवकिरण अकादमी एवं लाइब्रेरी बंद होने की कगार पर!”
Mahasamund/जिला शिक्षा अधिकारी और लोक शिक्षण संचालनालय रायपुर के आदेशों की अवहेलना करते हुए महासमुन्द जिले के तीन ग्रंथपाल खुलेआम नियमों को ठेंगा दिखा रहे हैं। आदेश स्पष्ट है कि उन्हें तत्काल प्रभाव से शासकीय जिला ग्रंथालय, मिनी स्टेडियम परिसर, महासमुन्द में कार्यभार ग्रहण करना है, परंतु स्थिति यह है कि महीनों बीत जाने के बाद भी न तो आदेश का पालन हुआ और न ही ग्रंथालय का संचालन व्यवस्थित हो पाया। यही कारण है कि अब जिले की नवकिरण अकादमी एवं लाइब्रेरी के अस्तित्व के संकट में पहुंच चुकी है और बंद होने की कगार पर खड़ी दिखाई दे रही है।
आदेश जारी, मगर जिम्मेदारी से भागे ग्रंथपाल!
15 जुलाई 2025 को जिला शिक्षा अधिकारी महासमुन्द द्वारा जारी संस्मरण पत्र (कमॉक 3502/ शास. जि. ग्रंथा./2025-26) में स्पष्ट उल्लेख किया गया कि संतोष कुमार यादव (शा.उ.मा.विद्या. भोरिंग), दीपक कुमार शर्मा (शा.उ.मा.विद्या. शेर) और रोहित कुमार ठाकुर (शा.उ.मा.विद्या. खम्हरिया) को निर्देशित किया गया है कि वे तत्काल कार्यभार से मुक्त होकर जिला ग्रंथालय में पदस्थापना ग्रहण करें। आदेश की जड़ में 11 जून 2024 और 24 मई 2024 को जारी लोक शिक्षण संचालनालय और जिला शिक्षा अधिकारी के पत्र भी शामिल हैं, जिन्हें इन ग्रंथपालों ने न केवल दरकिनार किया, बल्कि महीनों तक अनसुना करते रहे।
नवकिरण अकादमी का उजाला मद्धम!
जिले की प्रतिष्ठित नवकिरण अकादमी, जो पुस्तकों, अध्ययन और शोध के लिए विद्यार्थियों तथा युवाओं का मुख्य केंद्र रही है, अब वीरानी की ओर बढ़ रही है। अकादमी एवं लाइब्रेरी के संचालन की पूरी जिम्मेदारी फिलहाल सिर्फ एक संलग्न शिक्षको के कंधों पर है। वहां भी बच्चों की हालत गंभीर दिख रही है दलदली स्कूल के बच्चों का भविष्य खतरे पर दिख रहा है अगर यश चक्रधारी को भारमुक्त नहीं किया गया।रही बात नवकिरण अकादमी की तो हालात यह हैं कि पुस्तकालय की देखरेख, पंजीयन कार्यवाही, पुस्तक वितरण और संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण कार्य या तो रुक गए हैं या औपचारिकता में बदल गए हैं।
स्थानीय विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं ने रोष व्यक्त करते हुए कहा –
“सरकारी आदेशों को जब सरकारी कर्मचारी ही गंभीरता से नहीं लेंगे, तो आम नागरिक कैसे विश्वास करेंगे? हम जैसे छात्र पुस्तकालय पर निर्भर रहते हैं, लेकिन अब यहां तालेबंदी जैसे हालात हैं।”
लिखित चेतावनी भी बेअसर!
जिला शिक्षा अधिकारी महासमुन्द ने चेतावनी पत्र में साफ लिखा कि यदि तीन दिनों के भीतर कार्यभार ग्रहण नहीं किया गया, तो संबंधित ग्रंथपालों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाएगी और इसकी जिम्मेदारी स्वयं उनकी होगी। बावजूद इसके, आदेश आज भी कागजों तक सीमित है। क्या ग्रंथपाल आदेशों को हल्के में ले रहे है या बचने का प्रयास कर रहे है।
यही लापरवाही यह दर्शाती है कि सरकारी ग्रंथपालों को न तो शिक्षा विभाग की साख की चिंता है, न ही छात्रों और समाज की उम्मीदों की।
ग्रंथालय बन गया खानापूर्ति का केंद्र!
शासकीय जिला ग्रंथालय, जो कभी अध्ययनशील वातावरण का प्रतीक हुआ करता था, आज खाली कुर्सियों और धूल खाती अलमारियों में तब्दील हो गया है। पुस्तकालय का उद्देश्य जहां विद्यार्थियों और शोधार्थियों को संसाधन उपलब्ध कराना था, वहीं अब केवल औपचारिक ताले-चाबी और रजिस्टर तक सीमित हो गया है।
स्थानीय नागरिकों ने सवाल उठाया –
“जब जिले का मुख्य पुस्तकालय ही ठप पड़ेगा, तो गांव-गांव में शिक्षा का उजियारा कैसे फैलेगा?”
बंद होने की आहट – संकट में अकादमी!
नवकिरण अकादमी एवं लाइब्रेरी, जो छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में मार्गदर्शन देती रही है, अब अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद कर रही है। ग्रंथपालों की अनुपस्थिति से न सिर्फ पुस्तक वितरण की प्रक्रिया थमी है, बल्कि शोध-पुस्तकों और संदर्भ सामग्रियों की सुरक्षा पर भी प्रश्नचिह्न लग गया है।
शिक्षा जगत के जानकारों का कहना है कि यदि यह स्थिति बनी रही, तो कुछ ही समय में अकादमी “कागजी संस्थान” बनकर रह जाएगी।
नवकिरण अकादमी प्रभारी का क्या कहना? मेरे द्वारा लगातार जिला शिक्षा अधिकारी महासमुंद को पत्राचार किया गया है कि जल्द से जल्द उन तीनों ग्रंथपाल को नवकिरण अकादमी में ज्वाइनिंग कराया जाय क्योंकि कि अगर उन तीनों ग्रंथपाल शिक्षक की ज्वाइनिंग नहीं होगी तो नवकिरण अकादमी का भविष्य खतरे में आ जायेगा।
राजनीतिक हलचल!
अगर मामला लंबे समय तक ऐसा ही रहेगा तो मामला राजनीतिक रंग लेना शुरू कर देगा। विपक्ष द्वाराआरोप लगाया जायेगा कि शिक्षा विभाग में ग्रंथपालो द्वारा आदेशों का पालन कराने में प्रशासन पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है।
जनता की मांग – कड़ी कार्यवाही!
छात्र संगठनों और समाजसेवी संस्थाओं ने मांग की है कि आदेशों की अवहेलना करने वाले ग्रंथपालों पर न सिर्फ विभागीय कार्यवाही हो, बल्कि सेवा से निलंबन जैसी कठोर कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में कोई भी कर्मचारी आदेशों को नजरअंदाज करने की जुर्रत न कर सके।
सवालों के घेरे में शिक्षा विभाग!
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब आदेश एक साल पहले ही जारी हो चुका था, तो उसे लागू कराने में विभाग क्यों असफल रहा? क्या यह महज कर्मचारियों की लापरवाही है, या फिर प्रशासन की ढिलाई?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि विभाग ने शुरुआती दिनों में ही सख्ती दिखाई होती, तो आज नवकिरण अकादमी इस स्थिति में न होती।
ग्रंथपालों की उदासीनता, आदेशों की अवहेलना और विभागीय कमजोरी – इन तीनों ने मिलकर नवकिरण अकादमी एवं लाइब्रेरी को संकट के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जिला शिक्षा अधिकारी और लोक शिक्षण संचालनालय वास्तव में कड़ा कदम उठाते हैं या फिर यह मामला भी कागजों में दबकर रह जाएगा।













