75 दिनों तक आस्था का महापर्व, मुरिया दरबार में लोकतंत्र की अनोखी झलक; माओवाद से मुक्त बस्तर में विकास की नई इबारत लिखने का मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने किया ऐलान!
मांझियों का मानदेय ₹2,000 से बढ़कर ₹5,000 और चालकी का ₹1,500 से ₹3,500 हुआ—जनजातीय परंपराओं के सम्मान की दिशा में सरकार का बड़ा कदम!
जगदलपुर। बस्तर की पावन धरती पर आस्था, परंपरा, जनजातीय संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों का ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिला, जिसने विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा की विशिष्ट पहचान को एक बार फिर राष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित किया। मां दंतेश्वरी की पवित्र भूमि पर आयोजित ऐतिहासिक उत्सव में राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु शामिल हुईं। उन्होंने बस्तर की सदियों पुरानी परंपराओं, सामूहिक सहभागिता और जनजातीय विरासत की सराहना करते हुए बस्तर दशहरा को सामाजिक समरसता, सामूहिक आस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों का जीवंत प्रतीक बताया।
लगभग 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की एकजुटता, सांस्कृतिक निरंतरता और सामूहिक जिम्मेदारी का अनूठा उदाहरण है। यहां रथ निर्माण से लेकर रथ खींचने, पूजा-अर्चना और विभिन्न पारंपरिक अनुष्ठानों तक अलग-अलग समुदाय अपनी निर्धारित भूमिका निभाते हैं। यही सामूहिक सहभागिता इस उत्सव को देश के अन्य पर्वों से विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।
राष्ट्रपति के आगमन से उत्सव की गरिमा बढ़ी, वहीं मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने माओवाद से मुक्त बस्तर में नवनिर्माण, विकास और जनजातीय समाज के आर्थिक सशक्तिकरण का संकल्प दोहराया।
मुरिया दरबार में लोकतंत्र की जड़ों का दर्शन!
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर दशहरा के अंतर्गत आयोजित होने वाले मुरिया दरबार को जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक परंपराओं का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि इस परंपरा में समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि एक साथ बैठकर जनसमस्याओं, आवश्यकताओं और सामाजिक विषयों पर विचार-विमर्श करते हैं। सामूहिक संवाद से समाधान तलाशने की यह परंपरा भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करती है।
बस्तर की विशेषता यही है कि यहां सामाजिक निर्णयों में सहभागिता और परस्पर सम्मान को महत्व दिया जाता है। गांवों, समुदायों और पारंपरिक प्रतिनिधियों की भूमिका इस उत्सव को केवल आस्था का आयोजन नहीं रहने देती, बल्कि इसे सामाजिक संवाद का सशक्त मंच बनाती है।राष्ट्रपति ने कहा कि बस्तर पंडुम जैसे आयोजन जनजातीय युवाओं को अपनी संस्कृति, रीति-रिवाजों और परंपराओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने जनजातीय समाज की प्रतिभाओं को उचित अवसर, संसाधन और प्रोत्साहन उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया।
जनजातीय युवाओं की प्रतिभा को मिलेगा नया मंच!
राष्ट्रपति ने बस्तर ओलंपिक में जनजातीय युवाओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी की सराहना करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि उचित प्रशिक्षण और अवसर मिलने पर बस्तर के युवा राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय खेल मंचों पर भी अपनी पहचान बना सकते हैं।उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज में अपार प्रतिभा और संभावनाएं मौजूद हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इन प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का अवसर मिले और उनकी क्षमता को उचित दिशा प्रदान की जाए।
बस्तर की सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख करते हुए राष्ट्रपति ने दंडकारण्य से जुड़ी धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्मृतियों को भी रेखांकित किया। भगवान श्रीराम के वनवास और माता शबरी की भक्ति से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्होंने नैतिकता, मर्यादा, सेवा और मानवीय मूल्यों को जीवन में अपनाने का संदेश दिया।
जंगल, पहाड़ और प्रकृति की रक्षा का आह्वान!
राष्ट्रपति ने जनजातीय समाज की प्रकृति पूजा की परंपरा को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि पेड़-पौधों, जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सम्मान जनजातीय जीवन दर्शन का अभिन्न हिस्सा है। प्रकृति मानव जीवन को जल, भोजन, औषधियां और स्वच्छ वायु प्रदान करती है, इसलिए उसका संरक्षण केवल परंपरा नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी भी है।उन्होंने नागरिकों से अधिकाधिक पौधरोपण करने, वनों की रक्षा करने और प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करने का आह्वान किया। साथ ही उन्होंने कहा कि जनजातीय उद्यमियों को वित्तीय सुविधाओं और बाजार से जोड़ने के प्रयास समावेशी विकास को गति दे सकते हैं।
राष्ट्रपति ने विश्वास जताया कि जनजातीय समाज की सक्रिय भागीदारी से वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।
मुख्यमंत्री का ऐलान—माओवाद से मुक्त बस्तर में अब विकास की नई इबारत!
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का स्वागत एवं अभिनंदन करते हुए कहा कि बस्तर दशहरा यहां की लोक संस्कृति का आईना है। इसकी परंपराएं समतामूलक विचारों, सामूहिक सहभागिता और आपसी विश्वास को प्रदर्शित करती हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर हिंसक माओवाद से मुक्त होकर नवनिर्माण और विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजन इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इनके माध्यम से जनजातीय कला, संस्कृति और प्रतिभाओं को व्यापक पहचान मिल रही है।उन्होंने बताया कि राज्य सरकार दूरस्थ क्षेत्रों तक विकास पहुंचाने के लिए नियद नेल्लानार योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और पीएम-जनमन योजना के माध्यम से काम कर रही है। अंदरूनी बसाहटों को सड़क संपर्क से जोड़ने के साथ परिवहन सुविधाओं के विस्तार के प्रयास भी किए जा रहे हैं।
मुख्यमंत्री के अनुसार, रायपुर से रावघाट तक नई रेल सेवा प्रारंभ की गई है तथा रावघाट-जगदलपुर रेल लाइन पर काम जारी है। रायपुर से विशाखापट्टनम एक्सप्रेसवे का बड़ा हिस्सा बस्तर क्षेत्र से गुजरता है। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए होम-स्टे व्यवस्था और वनोपज संग्राहकों को उचित मूल्य दिलाने के लिए वन धन केंद्रों के माध्यम से प्रयास किए जा रहे हैं।स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी मुख्यमंत्री ने जगदलपुर में सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल, गीदम में मेडिकल कॉलेज तथा ओरछा और जगरगुंडा में एजुकेशन सिटी विकसित करने की दिशा में किए जा रहे कार्यों का उल्लेख किया।
मांझियों और चालकी के मानदेय में बड़ी बढ़ोतरी!
बस्तर दशहरा के अवसर पर जनजातीय समाज की परंपरागत व्यवस्था से जुड़े प्रतिनिधियों के आर्थिक सम्मान को लेकर भी महत्वपूर्ण घोषणा सामने आई।संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने बताया कि राज्य सरकार ने मांझियों का मासिक मानदेय ₹2,000 से बढ़ाकर ₹5,000 तथा चालकी का मानदेय ₹1,500 से बढ़ाकर ₹3,500 किया है। यह वृद्धि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने वाले पारंपरिक प्रतिनिधियों के योगदान के प्रति सम्मान के रूप में प्रस्तुत की गई।मानदेय में इस बढ़ोतरी से परंपरागत जिम्मेदारियों का निर्वहन करने वाले प्रतिनिधियों को आर्थिक सहयोग मिलने की उम्मीद है। बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने में मांझियों, चालकी, पुजारियों, कारीगरों, कलाकारों और ग्रामीण समुदायों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
राज्यपाल ने भी बताया सामाजिक एकता का प्रतीक!
राज्यपाल रमेन डेका ने बस्तर दशहरा और विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि भारत के लोकतांत्रिक मूल्य उसकी सभ्यता और संस्कारों में गहराई से रचे-बसे हैं। उन्होंने बस्तर दशहरा को समाज को साथ लेकर चलने और सामूहिक निर्णय की परंपरा का उदाहरण बताया।उन्होंने कहा कि रथ के लिए लकड़ी जुटाने से लेकर उसके निर्माण और संचालन तक अनेक गांवों तथा समुदायों के लोग अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। राजशाही की समाप्ति के बाद भी यह परंपरा निरंतर जारी रहना बस्तर की सांस्कृतिक जीवंतता को दर्शाता है। मुरिया दरबार यह संदेश देता है कि संवाद के माध्यम से कठिन समस्याओं के समाधान का रास्ता निकाला जा सकता है।
आस्था, संस्कृति और विकास के संगम पर बस्तर!
बस्तर दशहरा की कुटुम्ब जात्रा तथा 27 अक्टूबर को मां दंतेश्वरी और देवी मावली की डोली विदाई जैसे पारंपरिक आयोजन इस उत्सव की विशिष्ट पहचान हैं। राष्ट्रपति ने मां दंतेश्वरी से बस्तरवासियों के उज्ज्वल भविष्य, छत्तीसगढ़ की प्रगति और समग्र विकास की कामना की।इस अवसर पर उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा, वन मंत्री केदार कश्यप, कृषि मंत्री राम विचार नेताम, शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े, बस्तर सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप, कांकेर सांसद भोजराज नाग, जगदलपुर विधायक किरण सिंह देव, विधायक लता उसेंडी सहित अनेक जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे।
बस्तर दशहरा का संदेश स्पष्ट है—परंपराओं की जड़ों को मजबूत रखते हुए विकास की नई राह बनाना, जनजातीय समाज की प्रतिभाओं को अवसर देना और सामाजिक एकता के सूत्र में पूरे समाज को बांधना। राष्ट्रपति की उपस्थिति, राज्यपाल का संदेश, मुख्यमंत्री की विकास योजनाएं और परंपरागत प्रतिनिधियों के मानदेय में वृद्धि ने इस आयोजन को सांस्कृतिक गौरव के साथ विकास और सहभागिता के विमर्श से भी जोड़ दिया।











