July 29, 2026 6:08 pm

ढाई साल से न्याय का इंतजार! राज्य सूचना आयोग पर उठे सवाल—क्या फाइलों से तेज चल रही है ‘सेटिंग’ की हवा?”

ढाई साल से न्याय का इंतजार! राज्य सूचना आयोग पर उठे सवाल—क्या फाइलों से तेज चल रही है ‘सेटिंग’ की हवा?”

रायपुर। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को लोकतंत्र की सबसे सशक्त व्यवस्थाओं में से एक माना जाता है। इसका उद्देश्य  यह है कि सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाना और आम नागरिक को सूचना प्राप्त करने का अधिकार देना है। लेकिन जब सूचना पाने के लिए अपील करने वाला व्यक्ति ही वर्षों तक सुनवाई का इंतजार करता रहे, तब व्यवस्था पर सवाल उठना जायज़  है और स्वाभाविक हो जाता है। छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। एक अपीलार्थी का दावा है कि उसकी द्वितीय अपील को करीब ढाई वर्ष बीत चुके हैं, फिर भी उसे प्रभावी सुनवाई नहीं मिल सकी।

अपीलार्थी का आरोप है कि कई जनसूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अधिकारी खुलेआम यह कहते फिरते हैं कि “प्रथम अपील करो या द्वितीय अपील, राज्य सूचना आयोग तक चले जाओ, हमारी पूरी सेटिंग है। सुनवाई तो हम बढ़वा ही देंगे।” यदि इस प्रकार के दावे वास्तव में किए जा रहे हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं बल्कि सूचना के अधिकार कानून की भावना पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना आवश्यक है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वास्तव में राज्य सूचना आयोग की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लग गया है? क्या आयोग में लंबित मामलों का कारण केवल प्रशासनिक बोझ है, या फिर कुछ मामलों में जानबूझकर देरी की जा रही है? यदि कोई अपीलार्थी वर्षों तक केवल तारीख का इंतजार करता रहे और उसे सुनवाई का अवसर भी न मिले, तो न्याय मिलने की उम्मीद कैसे कायम रहेगी?

अपीलार्थी ने विशेष रूप से कटघोरा वनमंडल के केंदई वन परिक्षेत्र से संबंधित अपने प्रकरण का उल्लेख किया है। उसका कहना है कि आयोग की ऑनलाइन सूची में 29 जुलाई 2026 को मामला प्रदर्शित हुआ, लेकिन उसे सुनवाई का कोई नोटिस प्राप्त नहीं हुआ। वह अपने नजदीकी जिला कलेक्टर कार्यालय स्थित एनआईसी शाखा पहुंचा, जहां उसे कथित रूप से यह कहकर वापस लौटा दिया गया कि “जब नोटिस मिलेगा, तब आइए।” ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि यदि नोटिस समय पर नहीं पहुंचे और नागरिक को सुनवाई की जानकारी भी न मिले, तो ऑनलाइन सूची में नाम आने का क्या औचित्य रह जाता है?

अपीलार्थी का आरोप है कि इस प्रक्रिया में उसका समय, श्रम और आर्थिक संसाधन लगातार व्यर्थ हो रहे हैं। ढाई वर्ष तक इंतजार करने के बाद भी यदि सुनवाई का अवसर नहीं मिलता, तो यह केवल एक फाइल लंबित रहने का मामला नहीं बल्कि न्याय तक पहुंच के अधिकार से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।

इस पूरे घटनाक्रम में एक और गंभीर मुद्दा सामने आया है। अपीलार्थी का आरोप है कि जनसूचना अधिकारी, केंदई तथा तत्कालीन प्रथम अपीलीय अधिकारी, कटघोरा द्वारा मामले को दबाने की कोशिश की गई। यह आरोप जांच का विषय है, किंतु यदि ऐसे आरोपों में कोई तथ्य पाया जाता है, तो यह सूचना के अधिकार कानून की मूल भावना के विपरीत होगा। दूसरी ओर यदि आरोप निराधार हैं, तो संबंधित अधिकारियों का पक्ष भी सामने आना चाहिए।

सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि हाल के वर्षों में आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(j) का उपयोग तेजी से बढ़ा है। यह धारा व्यक्तिगत सूचना की गोपनीयता से संबंधित है, लेकिन कई मामलों में आवेदकों का आरोप रहता है कि इस प्रावधान का उपयोग ऐसी सूचनाएं रोकने के लिए भी किया जा रहा है, जिनका सार्वजनिक हित से संबंध हो सकता है। प्रत्येक मामले में यह इस बात पर निर्भर करता है कि मांगी गई सूचना का स्वरूप क्या है और उस पर कानून का सही अनुप्रयोग हुआ या नहीं।

अब निगाहें राज्य सूचना आयोग में हाल ही में नियुक्त अधिकारियों और स्टाफ पर टिकी हैं। आम नागरिकों की अपेक्षा है कि लंबित मामलों की शीघ्र सुनवाई सुनिश्चित की जाए, नोटिस जारी करने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया जाए और यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच कराई जाए। सूचना आयोग का दायित्व केवल आदेश पारित करना नहीं बल्कि नागरिकों के विश्वास को बनाए रखना भी है।

यदि आयोग में वर्षों तक लंबित अपीलें इसी प्रकार बढ़ती रहीं और अपीलार्थियों को समय पर सुनवाई नहीं मिली, तो सूचना का अधिकार अधिनियम का उद्देश्य प्रभावित होगा। लोकतंत्र में पारदर्शिता तभी मजबूत होती है जब सूचना मांगने वाले नागरिक को समय पर न्याय मिले और उसकी अपील का निष्पक्ष निपटारा हो।

अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या राज्य सूचना आयोग इन उठते सवालों का जवाब देगा? क्या लंबित मामलों की समीक्षा कर त्वरित सुनवाई का रोडमैप तैयार किया जाएगा? क्या नोटिस जारी करने की व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी बनाया जाएगा? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या उन आरोपों की जांच होगी जिनमें जनसूचना अधिकारियों और आयोग के कर्मचारियों के बीच कथित “मिलीभगत” या “सेटिंग” की बातें कही जा रही हैं?

इन सभी प्रश्नों का उत्तर समय देगा, लेकिन इतना निश्चित है कि यदि सूचना आयोग पर जनता का विश्वास कमजोर होता है, तो उसका असर केवल एक अपीलार्थी तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे सूचना अधिकार तंत्र की विश्वसनीयता पर पड़ेगा। इसलिए आवश्यक है कि आयोग इन आरोपों और आशंकाओं पर गंभीरता से विचार करे, पारदर्शी प्रक्रिया अपनाए और यह सुनिश्चित करे कि न्याय केवल किया ही न जाए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी दे।

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