September 7, 2026 11:06 pm

महासमुंद के खाद्य विभाग में प्राइवेट‘प्रोग्रामर राज’:कुर्सी सरकारी, नियंत्रण निजी हाथों में?

महासमुंद के खाद्य विभाग में प्राइवेट‘प्रोग्रामर राज’:कुर्सी सरकारी, नियंत्रण निजी हाथों में?

पीडीएस व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल—तीन प्रोग्रामरों की भूमिका और नियुक्ति की जांच की मांग!

महासमुंद/ जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस व्यवस्था को लेकर एक ऐसा सवाल उठ खड़ा हुआ है, जिसने खाद्य विभाग की कार्यप्रणाली पर ही गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। आरोप है कि खाद्य विभाग की महत्वपूर्ण तकनीकी व्यवस्था में कार्यरत निजी कंपनियों के प्रोग्रामरों की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है और स्थिति ऐसी बन गई है कि विभागीय कामकाज में इनकी कथित दखलंदाजी को लेकर सवाल उठने लगे हैं। मामला केवल कंप्यूटर चलाने तक सीमित है या इसके पीछे कोई बड़ा खेल चल रहा है—अब इसकी निष्पक्ष जांच की मांग जोर पकड़ रही है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या खाद्य विभाग जैसे संवेदनशील विभाग की पीडीएस व्यवस्था में तकनीकी कर्मचारियों को इतनी महत्वपूर्ण भूमिका दी जा सकती है कि आम नागरिक द्वारा जानकारी मांगने पर भी विभागीय अधिकारियों के बजाय उन्हीं कर्मचारियों का हवाला सामने आने लगे?

जानकारी के अनुसार महासमुंद जिले में तीन प्रोग्रामरों निशांत शर्मा, स्वाती शर्मा और आकाश वर्मा की पदस्थापना जिला मुख्यालय महासमुंद में बताई जा रही है। आरोप लगाया जा रहा है कि इनकी भूमिका केवल तकनीकी सहायता तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि विभागीय कामकाज में इनके प्रभाव को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं।

आकाश वर्मा पर ‘अधिकारी बनने’ का आरोप!

सबसे अधिक चर्चा जिला प्रोग्रामर आकाश वर्मा को लेकर है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि वे स्वयं को विभागीय अधिकारी की तरह प्रस्तुत करते हैं और जिले की राशन दुकानों के संचालकों से उनकी कथित नजदीकियां हैं।हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है, लेकिन यदि ऐसा है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि किसी निजी कंपनी के कर्मचारी को राशन दुकानों और पीडीएस व्यवस्था में इतना प्रभाव कैसे प्राप्त हुआ?

आरोप तो यहां तक लगाए जा रहे हैं कि जानकारी मांगने पर सीधे जवाब देने के बजाय ‘उच्च अधिकारियों से बात करें’ कहकर मामला टाल दिया जाता है। यदि विभागीय रिकॉर्ड और पीडीएस से जुड़ी जानकारी सरकारी व्यवस्था के तहत उपलब्ध है,तो फिर उसके लिए आम नागरिकों को बार-बार अधिकारियों के दरवाजे तक क्यों जाना पड़े? और तो और विभागीय बाबुओं को भी उनसे अनुमति लेना पड़ रहा है लोकहित की जानकारी दिलाने के लिए अब विभाग का दुर्भाग्य कहाँ जाएं या नियमित कर्मचारियों के अधिकारों का हनन।

तीन प्रोग्रामर जिला मुख्यालय में, लेकिन सवाल अनेक!

शिकायत में यह भी सवाल उठाया गया है कि जब तीनों प्रोग्रामरों की पदस्थापना महासमुंद मुख्यालय में है, तो क्या वे नियमित रूप से मुख्यालय पर उपस्थित रहते हैं? आरोप है कि इनमें से दो प्रोग्रामर रायपुर से आना-जाना करते हैं। यदि यह तथ्य सही है तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनकी उपस्थिति, कार्य अवधि, यात्रा और जिम्मेदारियों का रिकॉर्ड क्या कहता है।

सरकारी व्यवस्था में जिस कर्मचारी की जिस स्थान पर पदस्थापना होती है, वहां उसकी उपलब्धता और कार्य निष्पादन महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में यदि मुख्यालय पर तैनात कर्मचारी नियमित रूप से बाहर से आ-जा रहे हैं तो उनकी उपस्थिति की जांच क्यों न हो?क्या तीनों प्रोग्रामर जिला मुख्यालय के लिए पदस्थ किए गए है या अलग अलग विकास खण्डों में इनकी पद स्थापना की गई है।अगर ऐसा है तो सरायपाली बसना,पिथौरा विकास खण्डों के हितग्राही अपनी समस्या कैसे हल करते होंगे जब तीनों प्रोग्रामर जिला मुख्यालय में खूंटा गाढ़ के बैठे है। सूत्रों से मिली- जानकारी से पता चला है कि इन प्रोग्रामरों से विकासखंड खाद्य अधिकारी बहुत नाराज है उन अधिकारियों के कामों में बाधा डालने का काम किया जा रहा है प्रोग्रामर उनके कार्यों को नहीं करते है।उनको ब्लॉक के कामों को छोड़कर जिला मुख्यालय आना पड़ता है।

कुर्सियां तोड़ने’ तक सीमित है काम?

शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि जिले की खाद्य व्यवस्था प्रभावित हो रही है और प्रोग्रामरों की कार्यशैली को लेकर लगातार असंतोष है। यहां तक कहा गया है कि विभागीय कार्यालयों में बैठकर केवल कंप्यूटर और कुर्सियों तक सीमित रहने से ग्रामीण क्षेत्रों की वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है।

हालांकि यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि तकनीकी प्रोग्रामरों की वास्तविक जिम्मेदारियां क्या हैं और उन्हें विभाग द्वारा कौन-कौन से अधिकार दिए गए हैं। यदि उनके अधिकार केवल तकनीकी सहायता तक सीमित हैं, तो फिर विभागीय निर्णयों में उनकी कथित भूमिका की जांच आवश्यक हो जाती है।

नियुक्ति से लेकर कौशल परीक्षा तक हो जांच!

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण मांग प्रोग्रामरों की नियुक्ति प्रक्रिया और शैक्षणिक एवं तकनीकी दस्तावेजों की सूक्ष्म जांच की उठाई गई है।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि तीनों प्रोग्रामरों की नियुक्ति किस प्रक्रिया के तहत हुई, चयन के लिए कौन-कौन से मापदंड निर्धारित थे, कंप्यूटर संबंधी कौशल परीक्षा कैसे हुई और उनके द्वारा प्रस्तुत प्रमाण-पत्रों का सत्यापन किस स्तर पर किया गया—इन सभी बिंदुओं की जांच होनी चाहिए।

यदि दस्तावेज पूरी तरह सही हैं और नियुक्ति निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार हुई है तो जांच के बाद स्थिति स्वतः स्पष्ट हो जाएगी। लेकिन यदि कहीं कोई अनियमितता मिलती है तो जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जानी चाहिए।

सवाल सिर्फ खाद्य विभाग का नहीं!

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि जिले के अन्य विभागों में कार्यरत प्रोग्रामरों की स्थिति भी इसी प्रकार है। यदि ऐसा है तो मामला केवल तीन कर्मचारियों तक सीमित नहीं रह जाता। तब सवाल उठता है कि जिले के विभिन्न विभागों में निजी कंपनियों के तकनीकी कर्मचारियों की नियुक्ति, अधिकार, उपस्थिति और कार्यप्रणाली की निगरानी आखिर कौन कर रहा है?

यही वजह है कि मांग की जा रही है कि महासमुंद जिले में कार्यरत सभी प्रोग्रामरों की नियुक्ति प्रक्रिया, अनुबंध, योग्यता, कंप्यूटर कौशल परीक्षा, दस्तावेज सत्यापन, उपस्थिति और वास्तविक कार्यदायित्व की स्वतंत्र जांच** कराई जाए।

पीडीएस पर उठे सवालों का जवाब कौन देगा?

सार्वजनिक वितरण प्रणाली सीधे गरीब और जरूरतमंद परिवारों से जुड़ी व्यवस्था है। राशन दुकान से मिलने वाला चावल किसी अधिकारी या कर्मचारी की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि पात्र हितग्राहियों का अधिकार है। इसलिए पीडीएस से संबंधित किसी भी प्रकार की अनियमितता के आरोपों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

यदि चावल में किसी प्रकार की गड़बड़ी, रिकॉर्ड में हेराफेरी, वितरण में अनियमितता या तकनीकी प्रणाली के दुरुपयोग का आरोप लगाया जा रहा है तो उसकी जांच डिजिटल रिकॉर्ड, स्टॉक रजिस्टर, वितरण आंकड़े, दुकानवार विवरण और संबंधित लॉग के आधार पर की जा सकती है।

अब गेंद जिला प्रशासन और खाद्य विभाग के उच्च अधिकारियों के पाले में है। उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि प्रोग्रामरों की वास्तविक भूमिका क्या है और क्या उन्हें विभागीय निर्णयों अथवा पीडीएस संचालन से संबंधित कोई अतिरिक्त अधिकार प्राप्त हैं।

जांच हुई तो खुलेगा ‘प्रोग्रामर राज’ का राज!

फिलहाल आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन शिकायत में उठाए गए सवालों को नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है।

जरूरत है एक ऐसी निष्पक्ष, दस्तावेज आधारित और समयबद्ध जांच की, जिसमें न केवल प्रोग्रामरों की कार्यप्रणाली बल्कि उनकी नियुक्ति प्रक्रिया और तकनीकी योग्यता तक की जांच हो।

अगर सब कुछ नियमों के अनुसार मिला तो आरोपों पर विराम लगेगा और यदि कहीं नियमों का उल्लंघन मिला तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई का रास्ता खुलेगा।

अब सवाल यही है—महासमुंद की पीडीएस व्यवस्था सरकारी अधिकारियों के नियंत्रण में चल रही है या तकनीकी कर्मचारियों के प्रभाव में?

इस सवाल का जवाब किसी बयान से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और सरकारी रिकॉर्ड से ही मिल सकता है।

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