“स्वास्थ्य विभाग में रीलों का राज, फाइलों का वनवास! संचालनालय में कुर्सियां स्थायी, कर्मचारी अस्थायी—कार्य आबंटन या ‘कुर्सी बचाओ महाअभियान’?”
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22 जुलाई के कार्य आबंटन आदेश पर उठे सवाल—’बड़ी मछलियां’ वहीं सुरक्षित, ‘छोटी मछलियों’ का तबादला; कार्यालय में काम कम, मोबाइल ज्यादा उपयोग होने के आरोप।
नया रायपुर/ छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य संचालनालय से जारी दिनाँक 22 जुलाई 2026 के कार्य आबंटन आदेश ने कर्मचारियों के बीच नई चर्चा छेड़ दी है। आलोचकों का आरोप है कि यह आदेश कार्यकुशलता बढ़ाने के बजाय केवल औपचारिक फेरबदल साबित हो रहा है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि जिन कर्मचारियों ने वर्षों से एक ही शाखा में काम किया है, उनमें से कई को यथावत रखा गया, जबकि अपेक्षाकृत अन्य कर्मचारियों के कार्यों में बदलाव किया गया। यदि ये आरोप सही हैं, तो सवाल उठता है कि क्या कार्य आबंटन वास्तव में प्रशासनिक सुधार है या केवल कागजी अभ्यास?
कार्यालय के गलियारों में इस आदेश को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं सुनाई दे रही हैं। कोई इसे “कुर्सी संरक्षण योजना” कह रहा है तो कोई “जहां बैठे हो, वहीं जमे रहो अभियान”। ऐसा लगता है मानो कुछ कुर्सियों और कुछ कर्मचारियों के बीच ऐसा अटूट रिश्ता बन गया है कि दोनों को अलग करने के लिए शायद विशेष अधिनियम बनाना पड़े।
शासन के नियमों के अनुसार समय-समय पर कर्मचारियों का कार्य परिवर्तन किया जाना चाहिए ताकि पारदर्शिता बनी रहे, कार्य का अनुभव बढ़े और किसी एक शाखा पर अत्यधिक निर्भरता न बने। लेकिन आरोप यह है कि कुछ कर्मचारी वर्षों से एक ही शाखा में कार्यरत हैं और उनके कार्यक्षेत्र में बदलाव नहीं किया गया।
चर्चा में जिन नामों का उल्लेख किया जा रहा है, उनमें से सबसे पहले जो नाम है ,,,,
1- अमित साहू के लगभग 13 वर्ष यह वही अमित साहू है जो मिनी संचालक अपने आप को गेट के खड़े होकर बोलते है इनकी मर्जी होगी तो आप संचालक से मिल सकते है अगर इनकी मर्जी नहीं तो आप अंदर नहीं जा सकते है यह 13 वर्षों से एक ही जगह पर पदस्थ इनकी जैक सीधा मंत्रालय में है इनके खिलाफ कोई जानकारी मांगी जाए तो आपकी चप्पल घिस जायेगी जानकारी प्राप्त करने के लिए।
2- दुर्गाशंकर शुक्ला के स्थापना शाखा में लगभग (25 वर्ष),
3- लक्ष्मीकांत तिवारी के लगभग 8 वर्ष,
4- महेश सिदार और निखिल देशपांडे के लगभग (10-10 वर्ष),
5- मनीष गायकवाड़ के लगभग 10 वर्ष,
5- माधुरी वर्मा के लगभग 12 वर्ष,
6- एगेश्वर कोर्राम और शांति भूआर्य के लगभग (6-6)वर्ष तथा प्रिया सोनी के लगभग 12 वर्ष तक संबंधित शाखाओं में कार्यरत रहने के आरोप लगाए जा रहे हैं।
इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इन्हीं को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
अब जरा इस पूरे घटनाक्रम का हास्य पक्ष भी देखिए। ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ कुर्सियां इतनी भावुक हो चुकी हैं कि कर्मचारी के उठने की कल्पना से ही उनका संतुलन बिगड़ जाएगा। शायद फाइलें भी सोचती होंगी—”हम भी यहीं रहेंगे, हमारे बाबू भी यहीं रहेंगे।”
सबसे दिलचस्प चर्चा तो उस दिन की बताई जा रही है जब एक व्यक्ति प्रथम अपील का आवेदन लेकर संचालनालय पहुंचा। उसका दावा है कि जिन कर्मचारियों से काम की उम्मीद थी, उनमें से कई मोबाइल फोन पर व्यस्त दिखाई दिए। ऐसा दृश्य देखकर उसने व्यंग्य में कहा—”लगता है शासन वेतन फाइल निपटाने का नहीं, रील देखने का दे रही है।” यह व्यक्तिगत अनुभव और आरोप है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि मै स्वयं करता हूं, यदि ऐसी स्थिति वास्तव में है तो यह किसी भी सरकारी कार्यालय की कार्य संस्कृति पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
अब लगता है शायद फाइल आगे बढ़ाने से पहले शायद मोबाइल की बैटरी चार्ज होना ज्यादा जरूरी है।”फाइल इंतजार कर सकती है, लेकिन नई रील नहीं! अब तो संचालनालय में कार्यालय का नया आदर्श वाक्य होना चाहिए—’पहले रील, फिर डील, उसके बाद फाइल।'”
हालांकि यह भी सच है कि किसी भी विभाग के सभी कर्मचारियों पर एक जैसा आरोप लगाना उचित नहीं होगा। अनेक कर्मचारी पूरी निष्ठा से अपने दायित्व निभाते हैं। यदि कहीं कार्य संस्कृति या कार्य आबंटन में असंतुलन है, तो उसका समाधान तथ्यों और प्रशासनिक समीक्षा के आधार पर होना चाहिए।
आलोचकों की मांग है कि 22 जुलाई 2026 का कार्य आबंटन आदेश पुनः समीक्षा के लिए लिया जाए और यदि वास्तव में कोई कर्मचारी वर्षों से एक ही शाखा में कार्यरत है, तो शासन की नीति के अनुरूप पारदर्शी तरीके से सभी कर्मचारियों का कार्य परिवर्तन किया जाए। उनका कहना है कि इससे न केवल कार्यकुशलता बढ़ेगी बल्कि किसी एक शाखा में लंबे समय तक बने रहने से उत्पन्न होने वाली संभावित अनियमितताओं की आशंकाएं भी कम होंगी।
फिलहाल संचालनालय के गलियारों में सबसे लोकप्रिय व्यंग्य यही सुनाई दे रहा है—”यहां ट्रांसफर फाइलों का होता है, कुर्सियों का नहीं। कुर्सी वही, बाबू वही, शाखा वही… बस आदेश नया!”
अब देखना होगा कि इन आरोपों और मांगों पर विभाग क्या प्रतिक्रिया देता है। यदि विभाग स्पष्ट नीति के साथ कार्य आबंटन की समीक्षा करता है तो विवाद शांत हो सकता है। वहीं यदि स्थिति यथावत रहती है, तो यह मामला कर्मचारियों और प्रशासन के बीच बहस का विषय बना रह सकता है। आखिर सरकारी दफ्तरों में फाइलें ज्यादा दौड़ेंगी या मोबाइल पर रीलें—इसका जवाब आने वाला समय ही देगा।












