March 13, 2026 4:12 pm

“जंगल सफारी” में मंगल नहीं… दंगल!वन विभाग का नया प्रयोग – पेड़ बचाओ बाद में, पहले राजनीति जमाओ!

“जंगल सफारी” में मंगल नहीं… दंगल!वन विभाग का नया प्रयोग – पेड़ बचाओ बाद में, पहले राजनीति जमाओ!

“प्रधान वन संरक्षक ने खोल दिया राजनीति रिसॉर्ट – आओ बहस करो, खाना खाओ, विश्राम कर के जाओ!”

Raipur/छत्तीसगढ़ के जंगलों में इन दिनों एक अजीब सी हलचल है। पर यह हलचल बाघों की दहाड़, हिरणों की दौड़ या बंदरों की उछल-कूद से नहीं है। जंगल विभाग एक नया वृक्षा रोपण किया जा रहा है “कर्मचारी राजनीतिक वृक्षा रोपण”। रायपुर के जंगल सफारी का एक सरकारी कार्यालय अचानक राजनीति का अखाड़ा बन गया है।जंगल सफारी रायपुर के परिसर के अंदर अब वन कर्मचारियों का नवीन कर्मचारी भवन का कार्यालय बना दिया गया है।

बताया जा रहा है कि यह अनोखा प्रयोग छत्तीसगढ़ के प्रधान वन संरक्षक और वन बल प्रमुख श्रीनिवास राव के कार्यकाल में हुआ है। सूत्र बताते हैं कि जंगलों की रक्षा के लिए बने कार्यालय में अब बहस, बयानबाजी, रणनीति और राजनीतिक शतरंज की चालें चली जाएंगी। यानी अब जंगल सफारी कार्यालय में जानवरों की सुरक्षा की फाईलें कम और वन कर्मचारी संघ संगठन की आवाज ज्यादा सुनाई दे सकती है।

जंगल सफारी परिसर में ‘राजनीतिक सफारी’!

रायपुर डिवीजन के जंगल सफारी कार्यालय परिसर में वन विभाग का एक कार्यालय है, जो अब कथित रूप से विभाग के वन कर्मचारियों के लिए राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन गया है। खबर है कि इस कार्यालय में बैठकर अब शासकीय योजनाओं का क्रियान्वयन कम और राजनीतिक समीकरण ज्यादा बनाए जाएंगे।

स्थानीय कर्मचारियों के बीच इस फैसले को लेकर चर्चा का माहौल गर्म है। कोई मजाक में कह रहा है—
“अब जंगल की सुरक्षा फाइलों में होगी और राजनीति जंगल सफारी के कार्यालय में।”

कुछ कर्मचारियों का कहना है कि यह जगह इतनी सुविधाजनक बना दी गई है कि यहां आने वाला व्यक्ति आराम से बैठ सकता है, बहस कर सकता है, भोजन कर सकता है और चाहें तो झपकी भी ले सकता है।

यानी एक तरह से यह ‘वन विभाग के कर्मचारी का राजनीतिक विश्राम गृह’ बन चुका है।

शेर भी हैरान, हिरण भी परेशान!

जंगल सफारी के जानवरों तक को शायद यह समझ नहीं आ रहा होगा कि आखिर यह क्या हो रहा है। एक कर्मचारी ने हंसते हुए कहा—

“अगर यही हाल रहा तो जल्द ही जंगल सफारी का नाम बदलकर ‘राजनीतिक सफारी पार्क’ रखना पड़ेगा।”

कर्मचारियों के अनुसार पहले जंगल सफारी कार्यालय का उद्देश्य वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता का केंद्र था, लेकिन अब यहां राजनीतिक रणनीति का नया अध्याय शुरू होता दिखाई दे रहा है।

कार्यालय या राजनीतिक कैंप?

सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस परिसर में रुकने-खाने और आराम करने की भी व्यवस्था की गई है। यानी यहां आने वाला व्यक्ति सिर्फ चर्चा ही नहीं करेगा बल्कि आराम से “राजनीतिक तपस्या” भी कर सकेगा।एक कर्मचारी ने मजाक में कहा—

“अब जंगल सफारी कार्यालय परिसर में योगा कैंप नहीं, राजनीतिक कैंप लगेंगे।”

दूसरे कर्मचारी ने कहा—

“अगर सभी विभागों ने ऐसा ही किया तो सरकारी कार्यालयों में काम कम और राजनीति ज्यादा होगी।”

सवालों के घेरे में प्रधान वन संरक्षक की कार्यशैली!

प्रधान वन संरक्षक श्रीनिवास राव की कार्यशैली पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि उनके कार्यकाल में कई फैसले ऐसे हुए हैं जिन पर चर्चा और विवाद दोनों हुए।

कुछ लोगों का कहना है कि अगर उनके पूरे कार्यकाल के दौरान चल-अचल संपत्ति की जांच हो जाए तो कई रहस्य सामने आ सकते हैं। हालांकि यह सिर्फ आरोप और चर्चाएं हैं, जिनकी आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।

फिर भी वन विभाग के परिसर अंदर और बाहर इस फैसले को लेकर हास्य और हैरानी दोनों का माहौल है।

दूसरे विभाग भी करेंगे कॉपी?

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि अगर हर विभाग ने इसी तरह की व्यवस्था कर दी तो क्या होगा?कल्पना कीजिए—

•शिक्षा विभाग में “राजनीतिक कक्षा”

•स्वास्थ्य विभाग में “बहस वार्ड”

•और राजस्व विभाग में “रणनीति सम्मेलन”

एक वरिष्ठ कर्मचारी ने मजाक में कहा—

“अगर यही ट्रेंड चला तो सरकारी दफ्तरों में काम करने वालों से ज्यादा राजनीतिक रणनीतिकार मिलेंगे।”

मंत्री जी की दूरदृष्टी नजर कब पड़ेगी?

अब सबकी नजरें छत्तीसगढ़ के वन मंत्री केदार कश्यप पर टिक गई हैं। लोग यह जानना चाहते हैं कि क्या मंत्री जी इस मामले का संज्ञान लेंगे या फिर यह राजनीतिक प्रयोग ऐसे ही चलता रहेगा।

•क्या बनाएं गये नवीन कार्यालय में जो स्वीकृति दी गई है वह नियमानुसार है या प्रधान वन संरक्षक श्रीनिवास का स्वयं की स्वीकृति है?

•क्या श्रीनिवास राव प्रधान वन संरक्षक वन विभाग को राजनीति अखाड़ा बनवाना चाहते है तो जंगलों की रक्षा कौन करेगा?

•क्या इस मामले में वनमंत्री संज्ञान लेते हुए प्रधान वन राक्षक श्रीनिवास राव की ऊपर दंडात्मक कार्यवाही करेंगे या मामल ठंडे बस्ते में चला जायेगा?

कुछ लोग कह रहे हैं कि अगर मंत्री जी अचानक निरीक्षण पर पहुंच गए तो उन्हें शायद शेर-चीतों की फाईलों से पहले राजनीतिक भाषण सुनने को मिल जाए। और क्या वे इस फैसले का संज्ञान लेंगे और पूछेंगे कि
“भाई, जंगल बचाने के लिए विभाग बनाया गया है या राजनीतिक प्रशिक्षण केंद्र खोलने के लिए?

जंगल की नई कहानी!

जंगलों की दुनिया हमेशा रहस्यमयी रही है, लेकिन छत्तीसगढ़ के इस जंगल सफारी में अब एक नई कहानी लिखी जा रही है। यहां पेड़ों की छांव में अब सिर्फ पक्षियों की चहचहाहट नहीं बल्कि राजनीतिक चर्चाओं की गूंज भी सुनाई दे सकती है।

एक कर्मचारी ने अंत में मुस्कुराते हुए कहा—

“जंगल में पहले शेर राजा होता था, अब लगता है नेता राजा बनने की तैयारी कर रहे हैं।”

जंगल सफारी का यह नया अध्याय लोगों के लिए मनोरंजन का विषय बन गया है। कोई इसे प्रशासनिक प्रयोग बता रहा है, तो कोई इसे राजनीति का जंगल संस्करण कह रहा है।
अब जंगल सफारी कार्यालय रायपुर में जंगल बचाओ नहीं, बल्कि “राजनीति जमाओ” अभियान!

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