March 2, 2026 1:42 am

बारूद से विश्वास तक” : पूना मारगेम के पुनर्जीवन से थर्राया माओवादी नेटवर्क, 15 सशस्त्र कैडर ने थामा तिरंगा!

बारूद से विश्वास तक” : पूना मारगेम के पुनर्जीवन से थर्राया माओवादी नेटवर्क, 15 सशस्त्र कैडर ने थामा तिरंगा!

महासमुंद/कार्यालय पुलिस अधीक्षक महासमुंद से जारी ऐतिहासिक प्रेस विज्ञप्ति ने नक्सल मोर्चे पर एक बड़ा भूचाल ला दिया है। “पूना मारगेम – पुनर्वास से पुनर्जीवन” अभियान के तहत 15 सशस्त्र माओवादियों ने हिंसा का मार्ग त्यागते हुए संविधान और तिरंगे का दामन थाम लिया। जिन हाथों में कभी एके-47 की नली गरजती थी, उन्हीं हाथों में आज भारतीय संविधान की प्रति और लाल गुलाब नजर आया।

यह आत्मसमर्पण सिर्फ 15 व्यक्तियों का नहीं, बल्कि ओडिशा स्टेट कमेटी के पश्चिमी सब जोन के पूर्ण पतन का संकेत है।

 73 लाख का इनाम, 14 अत्याधुनिक हथियार और एक युग का अंत!

समर्पण करने वाले 15 नक्सलियों पर कुल 73 लाख रुपये का इनाम घोषित था। इनमें—

01 स्टेट कमेटी मेंबर (SCM) – 25 लाख,

• 02 डिविजनल कमेटी मेंबर (DCM) – 8-8 लाख,

• 05 एरिया कमेटी मेंबर (ACM) – 5-5 लाख,

• 07 पार्टी मेंबर (PM) – 1-1 लाख,

इनके पास से कुल 14 अत्याधुनिक हथियार बरामद हुए—

• 03 एके-47,

• 02 एसएलआर,

• 02 इंसास,

• 04 .303 रायफल,

• 03 12 बोर,

इन हथियारों के साथ आत्मसमर्पण ने साफ कर दिया कि जंगलों में सक्रिय बरगढ़-बलांगीर-महासमुंद डिवीजनल कमेटी अब इतिहास बन चुकी है।

सबसे बड़ा चेहरा – विकास उर्फ सुदर्शन उर्फ जंगू उर्फ राजन्ना!

इस आत्मसमर्पण का सबसे चर्चित नाम है विकास उर्फ सुदर्शन उर्फ जंगू उर्फ बाबन्ना उर्फ राजन्ना उर्फ मुप्पीड़ी साम्बाईह (57 वर्ष)।तेलंगाना के वारंगल जिले का यह मूल निवासी 1985 से संगठन में सक्रिय था। तेलंगाना स्टेट जोनल कमेटी से लेकर DKSZC के दक्षिणी सब जोन का सचिव और गढ़चिरौली डिवीजन प्रभारी तक का लंबा सफर तय करने वाला यह चेहरा ओडिशा स्टेट कमेटी के निर्माणकर्ताओं में से एक था।

उसके हाथ में मौजूद एके-47 और 25 लाख का इनाम आज आत्मसमर्पण के साथ समाप्त हो गया।

9 महिलाएं, 6 पुरुष – हिंसा से शांति की ओर!

आत्मसमर्पण करने वालों में 9 महिलाएं और 6 पुरुष शामिल हैं। इनमें कई ऐसे सदस्य थे जो केंद्रीय कमेटी सदस्य चलपति के गार्ड के रूप में कार्यरत रहे थे। गरियाबंद के कुल्हाड़ीघाट ऑपरेशन के बाद ये सदस्य बीबीएम डिवीजन में स्थानांतरित हुए थे।

रीना, मीना, दीपना, राधिका जैसी युवा महिला कैडर, जिनकी उम्र 19 से 22 वर्ष के बीच है, अब बंदूक नहीं बल्कि विकास की राह चुन रही हैं।

 रक्षित केंद्र पर तिरंगा और संविधान की सौगात!

महासमुंद के रक्षित केंद्र परिसर परसदा में आयोजित आत्मसमर्पण समारोह में पुलिस अधिकारियों ने सभी नक्सलियों को तिरंगा झंडा, भारतीय संविधान की प्रति और लाल गुलाब भेंट कर सम्मानित किया।

इस मौके पर उपस्थित थे—

•अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक नक्सल विरोधी अभियान विवेकानंद सिन्हा,

•पुलिस महानिरीक्षक नारदन रेंज सम्बलपुर ओडिशा हिमांशु लाल,

•पुलिस महानिरीक्षक ग्रामीण जोन रायपुर अमरेश मिश्रा,

•कलेक्टर महासमुंद विनय कुमार लंगेह,

•पुलिस अधीक्षक महासमुंद प्रभात कुमार,

इन अधिकारियों की उपस्थिति ने इस आत्मसमर्पण को ऐतिहासिक स्वरूप दे दिया।

 संवाद, विश्वास और पुनर्वास की नीति का असर!

महासमुंद जिले के सीमावर्ती क्षेत्रों में लंबे समय से आकाशवाणी, बैनर, पोस्टर और पाम्पलेट के माध्यम से आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति का प्रचार किया जा रहा था। शासन की ओर से—

पद अनुरूप इनाम राशि

•हथियार सहित समर्पण पर अतिरिक्त लाभ,

•स्वास्थ्य सुविधा,

•आवास,

•रोजगार की व्यवस्था,

•जैसी योजनाओं का लगातार प्रचार किया गया।

परिवार से वर्षों की दूरी, जंगलों की कठिनाइयाँ और पूर्व में समर्पण कर चुके साथियों का खुशहाल जीवन—इन सबने इन 15 कैडरों को आत्ममंथन के लिए विवश कर दिया।

पश्चिमी सब जोन पूरी तरह समाप्त!

इन 15 माओवादियों के आत्मसमर्पण के साथ ही ओडिशा स्टेट कमेटी का पश्चिमी सब जोन पूर्ण रूप से ध्वस्त हो गया है। एक वर्ष पूर्व तक जहां 2 डिवीजन और 7 एरिया कमेटियाँ सक्रिय थीं, आज वहां सन्नाटा है।छत्तीसगढ़ के रायपुर पुलिस रेंज और ओडिशा के संबलपुर रेंज को पूर्णतः नक्सलमुक्त घोषित किया गया है।

मार्च 2026 तक समूल उन्मूलन का लक्ष्य!

राज्य शासन ने मार्च 2026 तक नक्सलवाद के समूल उन्मूलन का लक्ष्य रखा है। यह आत्मसमर्पण उसी दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।

पुलिस प्रशासन ने बस्तर और ओडिशा के पूर्वी सब जोन में सक्रिय शेष माओवादियों से भी अपील की है कि वे हिंसा त्यागकर संविधान और तिरंगा थामें।

“पूना मारगेम – पुनर्वास से पुनर्जीवन” की ऐतिहासिक गूंज!

यह कार्यक्रम केवल एक पुलिस ऑपरेशन नहीं, बल्कि एक सामाजिक परिवर्तन की कहानी है। यह संदेश है कि बंदूक की आवाज़ से ज्यादा ताकतवर संवाद और विश्वास की शक्ति होती है।

महासमुंद की धरती पर आज बारूद की गंध नहीं, बल्कि शांति और विकास की खुशबू है।
15 हथियार झुके हैं… 15 जिंदगियाँ बदली हैं… और एक पूरा माओवादी ढांचा ध्वस्त हो चुका है।

इतिहास गवाह रहेगा—जब तिरंगे ने बारूद को मात दी।

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