“भर्ती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार का जिन्न बोतल से बाहर! राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन गरियाबंद की संविदा भर्ती पर गंभीर आरोप, नियमों की खुलेआम धज्जियाँ—योग्य बाहर, अपात्र अंदर!”
Gariyaband /राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) गरियाबंद में जारी संविदा भर्ती प्रक्रिया अब एक भारी भ्रष्टाचार कांड के रूप में सामने आ रही है। जिस भर्ती से जिले के बेरोजगार युवाओं को उम्मीद थी, वही भर्ती अब सौदेबाज़ी, पैसे की लेन-देन और नियमों की हत्या का प्रतीक बनती दिख रही है। कलेक्टर गरियाबंद को सौंपी गई एक विस्तृत शिकायत ने भर्ती प्रक्रिया की परत-दर-परत पोल खोल दी है और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिकायत के अनुसार, संविदा भर्ती के लिए जारी विज्ञापन में स्पष्ट नियम लिखे गए थे, लेकिन विज्ञापन की शर्तें सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह गईं, ज़मीन पर उनका कोई पालन नहीं हुआ। नियमों को ताक पर रखकर अपात्र अभ्यर्थियों को पैसे लेकर पात्र बनाया गया, जबकि योग्य और अधिक प्रतिशत वाले अभ्यर्थियों को जानबूझकर बाहर कर दिया गया।
नियम किताबों में, सौदे मेज़ पर!
विज्ञापन की कंडिका क्रमांक 7 में साफ लिखा गया था कि आवेदन पत्र में फोटो और प्रमाण पत्र स्व-प्रमाणित (Self Attested) होना अनिवार्य है, अन्यथा आवेदन निरस्त किया जाएगा। लेकिन शिकायत में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि जिन अभ्यर्थियों के फोटो और प्रमाण पत्रों में हस्ताक्षर तक नहीं थे, उन्हें भी पात्र घोषित कर दिया गया। दावा-आपत्ति के दौरान ऐसे दर्जनों आवेदन नियम विरुद्ध तरीके से पात्र बना दिए गए।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि हर अपात्र अभ्यर्थी से 15 से 20 हजार रुपये लेकर पात्र किया गया। पैसा लेने के प्रत्यक्ष प्रमाण भले सामने न हों, लेकिन शिकायतकर्ता का कहना है कि डर के माहौल में कोई खुलकर सामने नहीं आ रहा, फिर भी यह सवाल सबसे बड़ा है कि—
• जब नियम स्पष्ट थे, तो इतने अपात्र एक साथ पात्र कैसे हो गए?
• और कैसे आधे से ज्यादा ऐसे लोग मेरिट लिस्ट में आ गए, जिनका प्रतिशत कम था?
अनारक्षित में जाति प्रमाण पत्र? हँसी भी शर्मिंदा!
भर्ती प्रक्रिया की सबसे हैरान करने वाली गलती यह सामने आई कि अनारक्षित (General) पदों में जाति प्रमाण पत्र न लगाने पर अभ्यर्थियों को अपात्र कर दिया गया। यह न केवल नियमों की अज्ञानता दर्शाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि इन पदों पर पहले से ‘सेटिंग’ की जा चुकी थी।
यदि चयन समिति को यह भी ज्ञान नहीं कि अनारक्षित वर्ग में जाति प्रमाण पत्र अनिवार्य नहीं होता, तो फिर उनकी योग्यता और निष्पक्षता दोनों पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है।
मेरिट का मर्डर: कम प्रतिशत वाले ऊपर, ज़्यादा प्रतिशत वाले बाहर!
शिकायत में फार्मासिस्ट, एमपीडब्ल्यू, सीएचओ, स्टाफ नर्स जैसे पदों पर मेरिट की खुली हत्या के आरोप लगाए गए हैं।
•फार्मासिस्ट पद पर 36% अंक वाले अभ्यर्थी को पैसे लेकर मेरिट लिस्ट में दूसरे स्थान पर रखा गया,
•जबकि उससे अधिक प्रतिशत वाले योग्य अभ्यर्थियों को सूची से बाहर कर दिया गया।
सीएचओ पद पर भी यही खेल खेला गया—
•अनुसूचित जनजाति वर्ग में 52% अंक वाले अभ्यर्थी को बाहर,
•और 49% अंक वाले को मेरिट में शामिल कर लिया गया।
यह सब देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि मेरिट अब योग्यता नहीं, बल्कि लेन-देन से तय हो रही है।
कोविड अंक भी बने सौदे का हथियार!
भर्ती प्रक्रिया में कोविड-19 अनुभव के नाम पर मिलने वाले 10 अतिरिक्त अंकों में भी भारी गड़बड़ी सामने आई है। कई ऐसे अभ्यर्थियों को कोविड अनुभव के अंक दे दिए गए, जिनके पास इसका कोई प्रमाण पत्र ही नहीं था। इससे स्पष्ट है कि अंक भी अब दस्तावेज़ों से नहीं, बल्कि “पहुँच” से मिल रहे हैं।
योग्य अभ्यर्थियों से मांगे पैसे, नहीं दिए तो कर दिया अपात्र!
शिकायत में यह भी आरोप है कि कई अभ्यर्थियों ने सभी आवश्यक दस्तावेज सही ढंग से जमा किए, फिर भी उन्हें जानबूझकर अपात्र घोषित कर दिया गया। जब उन्होंने दावा-आपत्ति की, तब भी उन्हें पात्र नहीं किया गया, क्योंकि उन्होंने रिश्वत देने से इनकार कर दिया था। यह सीधे-सीधे बेरोजगार युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ है।
जल्दबाज़ी में परीक्षा, ताकि सच्चाई दब जाए!
शिकायतकर्ता का आरोप है कि जब यह भ्रष्टाचार सामने आने लगा, तो 27 तारीख को आनन-फानन में नोटिस जारी कर 2 फरवरी से परीक्षा लेने का निर्णय कर लिया गया, ताकि किसी को शिकायत या जांच का मौका न मिले। यह जल्दबाज़ी खुद इस बात का संकेत है कि कुछ न कुछ छिपाने की कोशिश की जा रही है।
जिला प्रबंधक, स्थापना सहायक और मौन सीएमएचओ पर सवाल!
पूरे मामले में आरोप सीधे तौर पर जिला पदस्थ जिला प्रबंधक और एनएचएम के स्थापना सहायक पर लगाए गए हैं। शिकायत में यह भी कहा गया है कि सीएमएचओ को सब पता होने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की जा रही, जिससे उनकी भूमिका भी संदेह के घेरे में आ गई है।
40–50 अपात्र पात्र! यह इत्तेफाक नहीं, सुनियोजित खेल है!
शिकायत के अनुसार लगभग 40 से 50 अपात्र अभ्यर्थियों को पैसे लेकर पात्र बनाया गया, और आज वही सभी मेरिट लिस्ट में जगह बनाए बैठे हैं।
इतनी सारी “गलतियाँ” महज़ इत्तेफाक नहीं हो सकतीं—यह सुनियोजित, सोची-समझी और पैसे के दम पर की गई भर्ती प्रक्रिया की तस्वीर पेश करती हैं।
कलेक्टर से की गई कड़ी मांगें!
शिकायतकर्ता राहुल साहू (जल विहार कॉलोनी, रायपुर) ने समस्त आवेदनकर्ताओं की ओर से कलेक्टर गरियाबंद से मांग की है कि—
•इस पूरी भर्ती प्रक्रिया को तत्काल निरस्त किया जाए, या
•गंभीर भ्रष्टाचार को देखते हुए भर्ती पर तुरंत रोक लगाई जाए।
•भर्ती समिति को भंग कर सभी जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई की जाए।
•अधिक प्रतिशत वाले योग्य अभ्यर्थियों को मेरिट में शामिल किया जाए।
•नियम विरुद्ध पात्र बनाए गए अभ्यर्थियों को फिर से अपात्र घोषित किया जाए।
•पैसा लेकर नियम तोड़ने वाले जिला प्रबंधक और स्थापना सहायक को तत्काल हटाया जाए।
बेरोजगार युवाओं की आख़िरी उम्मीद!
शिकायत के अंत में कहा गया है कि लगभग 100–150 पेज के सबूत उपलब्ध हैं, लेकिन संसाधनों के अभाव में केवल महत्वपूर्ण दस्तावेज ही लगाए जा सके हैं। यह मामला सिर्फ एक भर्ती का नहीं, बल्कि हज़ारों बेरोजगार युवाओं के भविष्य, विश्वास और हक़ का सवाल है।
अब निगाहें कलेक्टर गरियाबंद पर टिकी हैं—
• क्या इस भ्रष्टाचार के जिन्न को फिर बोतल में बंद किया जाएगा?
• या फिर सच्चाई सामने लाकर दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी?
जवाब जो भी हो, लेकिन इतना तय है कि यह मामला अब दबने वाला नहीं है।
“वही मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी गरियाबंद से इस विषय में फोन के माध्यम से जानकारी चाही गई और उनके पूछा भी गया कि पात्र होने के बाद पेपर देने आने वाले अभ्यार्थियों को अपात्र कैसे कर दिया जा रहा है उनके द्वारा जवाब दिया गया कि हम अभ्यार्थी ज्यादा होने पर 1:5 में भर्ती कर रहे है “
लेकिन सवाल यह है कि 1:5 में भर्ती हो रहा है या 1:10 पर हो रहा है अब मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी गरियाबंद सही या भर्ती नियमावली।












