March 1, 2026 2:45 pm

कृषि विभाग में भ्रष्टाचार की फसल! एक अधिकारी, दस साल, करोड़ों के सवाल—क्या महासमुंद में ‘तिलस्मी संरक्षण’ के आगे बेबस है सिस्टम?”

कृषि विभाग में भ्रष्टाचार की फसल! एक अधिकारी, दस साल, करोड़ों के सवाल—क्या महासमुंद में ‘तिलस्मी संरक्षण’ के आगे बेबस है सिस्टम?”

Mahasamund/महासमुंद जिले के कृषि विभाग से जुड़ा एक गंभीर और चौंकाने वाला मामला इन दिनों प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा रहा है। आरोप है कि जितेन्द्र पटेल, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी, जिनकी मूल पदस्थापना कार्यालय वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी पिथौरा में है, वे पिछले करीब 10 वर्षों से नियमों को ताक पर रखकर उप संचालक कृषि, महासमुंद कार्यालय में संलग्न रहकर एक ही शाखा का लगातार प्रभार संभालते आ रहे हैं। सवाल यह नहीं कि कोई अधिकारी काम कर रहा है—सवाल यह है कि एक ही शाखा में दशकभर का ठहराव आखिर किसके इशारे पर? और क्यों?

महासमुंद के कांग्रेस पार्टी के पूर्व विधायक एवं संसदीय सचिव विनोद सेवन लाल चंद्राकर ने लिखित में दिनांक 15/04/2025 को शिकायत किया गया है शिकायत के मुताबिक, इसी लंबे कार्यकाल के दौरान राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, स्वाइल हेल्थ कार्ड, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा—दलहन/तिलहन, धान के बदले दलहन/तिलहन/मक्का, द्विफसली क्षेत्र विस्तार, जैविक खेती मिशन, परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) जैसी कई महत्त्वाकांक्षी योजनाओं के क्रियान्वयन में भारी आर्थिक अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। आरोप इतने गंभीर हैं कि यदि निष्पक्ष जांच हो, तो विभागीय साख से लेकर किसानों के भरोसे तक पर गहरा असर पड़ सकता है।

किसानों से दुर्व्यवहार—शिकायतें आम, कार्रवाई शून्य!

किसानों का कहना है कि योजनाओं से जुड़ी जानकारी, प्रशिक्षण और लाभ वितरण के दौरान दुर्व्यवहार अब “आम बात” हो चुकी है। कई किसानों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि शिकायत करने पर उन्हें डराया-धमकाया जाता है या फाइलें अटक जाती हैं। सवाल उठता है—क्या योजनाएँ किसानों के लिए हैं या कुछ चुनिंदा अफसरों के लिए?

मिलकर खेल?—तीन नाम, एक कहानी!

शिकायत में यह भी आरोप है कि जितेन्द्र पटेल ने गंगाप्रसाद शरणागत, प्रभारी वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी बागबाहरा, तथा आत्मा योजना के ऑपरेटर (बागबाहरा) के साथ मिलकर योजनाओं के क्रियान्वयन में संगठित तरीके से आर्थिक हेरफेर किया। खासतौर पर जैविक खेती और परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत किसानों के प्रशिक्षण में फर्जी बिल बनाकर राशि आहरण का आरोप लगाया गया है। यदि यह सच है, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं—कृषि सुधार के नाम पर किसानों के हक पर डाका है।

PKVY में ‘मानदेय’ से वसूली—स्क्रीनशॉट तक का दावा!

सबसे सनसनीखेज आरोप परंपरागत कृषि विकास योजना से जुड़ा है। नियमों के अनुसार चयनित एल.आर.पी. (Local Resource Person) को एक क्लस्टर के लिए 50,000 रुपये वार्षिक मानदेय दिया जाता है। आरोप है कि भुगतान के बाद एल.आर.पी. से रकम वापस वसूली जाती है—कभी ऑनलाइन, कभी नकद, तो कभी चेक के जरिए। शिकायत में ऑनलाइन वसूली के स्क्रीनशॉट संलग्न होने का दावा भी किया गया है।
यदि जांच में यह पुष्ट हुआ, तो यह भ्रष्टाचार का क्लासिक मॉडल कहलाएगा—पहले भुगतान, फिर दबाव बनाकर वसूली।

बैंक खातों और संपत्ति की जांच—क्यों जरूरी?

शिकायतकर्ता का कहना है कि पिछले 10 वर्षों में अर्जित संपत्ति और बैंक खातों की गहन जांच विभाग और किसानों—दोनों के हित में है। सवाल सीधा है—अगर आय वैध है, तो जांच से डर क्यों?
तीन वर्षों के लेन-देन, प्रशिक्षण मद, घटकों के भुगतान, बिल-व्हाउचर—सबकी फॉरेंसिक ऑडिट होनी चाहिए। तभी दूध का दूध और पानी का पानी होगा।

स्थानांतरण के बाद भी संलग्नीकरण—‘तिलस्मी जादू’ या संरक्षण?

मामले में एक और पेचीदा मोड़ तब आया, जब बताया गया कि जिले से स्थानांतरण के बाद भी जितेन्द्र पटेल को फिर से महासमुंद जिला कार्यालय में संलग्न कर लिया गया। यह संलग्नीकरण उप संचालक फागूराम कश्यप कृषि विभाग महासमुंद द्वारा किए जाने का आरोप है।यहीं से सवालों की बौछार शुरू होती है—

•क्या कोई ‘तिलस्मी जादू’ है?

•क्या बार-बार संलग्नीकरण किसी खास रिश्ते या दबाव का नतीजा है?

•क्या विभागीय नियम केवल कागजों के लिए हैं?

पहले भी शिकायत—पर कार्रवाई शून्य!

शिकायत में यह भी उल्लेख है कि पूर्व विधायक एवं संसदीय सचिव के पत्र के माध्यम से भी जितेन्द्र पटेल के खिलाफ शिकायत की गई थी। लेकिन आज दिनांक तक न तो ठोस कार्रवाई हुई, न ही खातों की जांच।
यह चुप्पी कई सवाल खड़े करती है—

क्या जिला प्रशासन किसी को बचाने में लगा है?

•या फिर सिस्टम की सुस्ती ने भ्रष्टाचार को खाद-पानी दे दिया है?

प्रशासन के सामने कसौटी अब गेंद कलेक्टर, जिला महासमुंद के पाले में है। मांग साफ है—

पिछले 3 वर्षों की विस्तृत जांच,

•10 वर्षों की संपत्ति और बैंक खातों की जांच,

•तत्काल संलग्नीकरण समाप्त,

•विधिसम्मत कार्रवाई,

•और जांच की प्रगति से शिकायतकर्ता को अवगत कराना,

यह केवल एक अधिकारी की जांच नहीं, बल्कि प्रशासनिक ईमानदारी की परीक्षा है। यदि कार्रवाई होती है, तो संदेश जाएगा कि किसानों के हक पर कोई समझौता नहीं। यदि नहीं होती—तो यह चुप्पी भी एक बयान होगी।

महासमुंद के इस कथित घोटाले ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है—योजनाएँ कागजों में चमकेंगी या खेतों में?

किसान आज भी बारिश, बाजार और लागत से जूझ रहा है। ऐसे में अगर योजनाओं की रकम फर्जी बिलों और वसूली में बह जाए, तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं—कृषि व्यवस्था पर चोट है।

अब देखना यह है कि जिला प्रशासन पारदर्शिता का हल चलाता है या आरोपों की फाइलें धूल खाती रहती हैं।महासमुंद जवाब चाहता है—और जवाबदेही भी।

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