March 1, 2026 7:13 pm

तीर्थ के नाम पर तीर्थ-तमाशा!”मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना में ‘घोषणा-पत्र महायज्ञ’, फर्जी बीपीएल का प्रसाद और शपथ-पत्र की जय-जयकार!

तीर्थ के नाम पर तीर्थ-तमाशा!”मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना में ‘घोषणा-पत्र महायज्ञ’, फर्जी बीपीएल का प्रसाद और शपथ-पत्र की जय-जयकार!

Mahasamund/छत्तीसगढ़ की जिस मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना को बुज़ुर्गों की आस्था, लाठी और लाचारी का सहारा माना जाता था, वही योजना अब महासमुंद में हास्य-व्यंग्य का महाकुंभ बनती नजर आ रही है। यहां तीर्थ कम और तमाशा ज़्यादा दिखा—जहां शपथ-पत्र ने सत्य का गला पकड़ा, बीपीएल ने अमीरी की मूंछों पर ताव दिया, और पात्रता ने खुद को फाइलों में ढूंढते-ढूंढते थककर चाय पी ली।

मामला है एक कथित शासकीय शिक्षिका पर लगे गंभीर आरोपों का, जिन्होंने कथित तौर पर “मैं शासकीय सेवक नहीं हूं” का ऐसा आध्यात्मिक उच्चारण किया कि सरकारी कागज़ भी मंत्रमुग्ध हो गए। नतीजा—तीर्थ दर्शन की रेल चली, रिश्तेदारों की बोगियां जुड़ीं और योजना की पवित्रता प्लेटफॉर्म पर चाय पीती रह गई।

“पात्रता बोले—मुझे क्यों छोड़ा?”

मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना का उद्देश्य सीधा-सादा है—आर्थिक रूप से कमजोर, वरिष्ठ नागरिकों को तीर्थ यात्रा का अवसर। नियम भी उतने ही सीधे—शासकीय सेवक बाहर, अपात्र बाहर, फर्जी बाहर। लेकिन महासमुंद की इस कथा में नियमों ने खुद से पूछा—“हम किस काउंटर पर सत्यापन कराएं?”

आरोप है कि शासकीय उच्च माध्यमिक शाला बेमचा में पदस्थ श्रीमती किरण पटेल व्याख्याता (एल.बी.) ने कथित तौर पर झूठे शपथ-पत्र, फर्जी बीपीएल और तथ्यों को छुपाने की त्रिवेणी बहाकर न केवल स्वयं बल्कि परिजनों सहित तीर्थ यात्रा का पुण्य अर्जित कर लिया। इस दौरान पात्रता नियम ऐसे गायब हुए जैसे परीक्षा के दिन पेन।

RTI का टॉर्च, अंधेरे में चमकता सच!

छत्तीसगढ़ नागरिक कल्याण समिति के सदस्य एवं पूर्व पार्षद पंकज साहू ने इस कथित फर्जीवाड़े पर सूचना के अधिकार (RTI) की टॉर्च जलाई तो कागज़ों में ऐसा उजाला हुआ कि फाइलें भी आंखें मलने लगीं। आवेदन-पत्र, घोषणा-पत्र और यात्रा सूची—सबने एक-दूसरे की ओर देखा और बोले—“हमें तो सही भर दिया गया था!”

RTI से मिले दस्तावेजों के आधार पर पंकज साहू ने मुख्य सचिव, स्कूल शिक्षा विभाग, लोक शिक्षण संचालनालय, कलेक्टर महासमुंद और जिला शिक्षा अधिकारी तक शिकायत की। मांग साफ—निलंबन, विभागीय जांच, सेवा से बर्खास्तगी और एफआईआर। यानी “तीर्थ दर्शन के बाद अब कानून दर्शन!”

“घोषणा-पत्र बोले—मैं झूठ नहीं, विकल्प हूं!”

कथित आरोपों की सबसे हास्यप्रद लेकिन गंभीर कड़ी है घोषणा-पत्र। आरोप है कि शपथ-पत्र के बिंदु क्रमांक 5 में “मैं शासकीय सेवक नहीं हूं” लिख दिया गया, जबकि वास्तविकता में शासकीय सेवा जारी थी। इस पर कागज़ों ने कहा—“हमने तो वही लिखा जो बोला गया!”

फर्जी बीपीएल का आरोप भी कम मज़ेदार नहीं—जहां सूची में नाम ऐसे चढ़ा जैसे मंदिर की सीढ़ियां। नियमों ने आवाज़ दी—“भाई, हम यहीं थे!” मगर सुनने वाला कौन?

तीर्थ यात्रा: रिश्तों की एक्सप्रेस!

दिनांक 27 अक्टूबर 2025 से 31 अक्टूबर 2025 के बीच समाज कल्याण विभाग द्वारा प्रयागराज, काशी विश्वनाथ और हनुमान मंदिर की यात्रा कराई गई। सूची में कथित तौर पर शिक्षिका, पति, मौसी और अन्य रिश्तेदार—यानी तीर्थ यात्रा नहीं, पारिवारिक पर्यटन!

जनता पूछ रही है—“अगर यही पैकेज था, तो शादी का कार्ड भी जोड़ देते!” नियमों का जवाब—“हम तो आवेदन के साथ अटैच थे।”

शिक्षक समाज असहज—‘कक्षा में नैतिकता,फाइल में व्यावहारिकता?’

शिक्षक समाज को नैतिकता, अनुशासन और ईमानदारी का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में आरोपों ने शिक्षा जगत में भी खुसर-पुसर बढ़ा दी। “ब्लैकबोर्ड पर सत्य, फाइल में शपथ?”—यह सवाल गलियारों में घूम रहा है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर आरोप सही हैं, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि सत्यापन प्रणाली की भी परीक्षा है—“काउंटर पर किसने आंखें बंद कीं?”

प्रशासन ने लिया संज्ञान—‘मौन व्रत आखिकार टूटा जांच की ट्रेन पटरी पर दौड़ी?’

फिलहाल प्रशासन की ओर से आधिकारिक तौर पर प्रतिक्रिया आई है।मौन व्रत आखिकार टूटा जांच की ट्रेन पटरी पर दौड़ी?’जिसमें समीरचंद प्रधान प्राचार्य सेजेस पटेवा विकास खंड महासमुंद ,करन सिंह सोरी प्राचार्य शा०उ०मा०बा०बिरकोनी विकास खण्ड वा जिला महासमुंद दोनों जांच अधिकारी नियुक्त हुएं।अब देखते है कि जांच अधिकारी कितने खरे उतरते है या तीर्थ दर्शन की ट्रेन छूट जायेगी।

पंकज साहू का कहना है कि यह केवल!

अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि धोखाधड़ी है और IPC की धाराओं के तहत एफआईआर जरूरी है। वरना भविष्य में योजनाएं योग्य नहीं, प्रभावशाली चुनेंगी।

जनता का पंच—“तीर्थ में दर्शन कम, दस्तावेज़ ज़्यादा!”

चाय दुकानों से लेकर सोशल ग्रुप्स तक एक ही पंचलाइन—“तीर्थ में दर्शन कम, दस्तावेज़ ज़्यादा!” लोग मांग कर रहे हैं कि यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो कठोर कार्रवाई हो, ताकि संदेश साफ जाए—“योजना पवित्र है, पर्चा नहीं!”

मिसाल बने या फाइलों में समाधि?

अब सवाल यह नहीं कि मामला क्या है, सवाल यह है कि अंजाम क्या होगा। क्या जांच मिसाल बनेगा, या फाइलों में समाधि ले लेगी?

जनकल्याणकारी योजनाओं का अर्थ तभी है जब लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। यदि झूठे शपथ-पत्रों से पुण्य बटोरने वालों पर सख्ती नहीं हुई, तो आस्था भी RTI में आवेदन कर देगी।

अंतिम शंखनाद!

पूर्व पार्षद पंकज साहू ने आग्रह किया है कि दोष सिद्ध होने पर कठोरतम कार्रवाई हो—निलंबन, बर्खास्तगी, एफआईआर—सब कुछ। ताकि अगली बार कोई यह न कह सके—“शपथ-पत्र में सब संभव है!”

महासमुंद की यह कथा हंसाती भी है, चुभती भी है। हंसी इसलिए कि नियमों को चकमा देने की कलाबाज़ी देखी गई; चुभन इसलिए कि इससे वास्तविक जरूरतमंदों का हक़ कटता है। अब देखना है—तीर्थ दर्शन के बाद कानून दर्शन कब तक होगा ।

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