DHS में टेबलेट चोरी कांड: एक आरोपी जेल में, कई चेहरे बेनकाब होने से पहले ही ढंके!
क्या आशित बेक ही गुनहगार, या स्टोर प्रभारी लक्ष्मीकांत तिवारी की भूमिका शामिल है विभाग बनेगा अदृश्य कवच?
Raipur/छत्तीसगढ़ राज्य के स्वास्थ्य विभाग के संचालनालय (DHS) में सामने आया टेबलेट चोरी कांड अब केवल एक चोरी की घटना नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरा मामला सिस्टम की कार्यशैली, अफसरशाही की जवाबदेही और कथित संरक्षण की परतें खोलने लगा है। इस सनसनीखेज प्रकरण का खुलासा सबसे पहले हमारे द्वारा किया गया था, जिसके बाद विभाग में हड़कंप मच गया।सूत्रों के हवाले खबर का असर इतना गहरा रहा कि DHS के संचालक संजीव झा ने मामले को अपने संज्ञान में लेते हुए त्वरित कार्रवाई करते हुएं एफ.आई.आर.दर्ज कराते हुऐं आरोपी आशित बेक को सेंट्रल जेल रायपुर भेज दिया गया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती…बल्कि यहीं से असली सवाल शुरू होते हैं।
•लेकिन सवाल यह है—क्या कहानी यहीं खत्म हो जाती है?
•या फिर यह सिर्फ एक अध्याय है, जिसकी आड़ में असली किरदार अब भी सुरक्षित बैठे हैं?
एक गिरफ्तारी, सौ सवाल!
•आज पूरा स्वास्थ्य विभाग यह पूछ रहा है—क्या आशित बेक ही इस टेबलेट चोरी कांड का इकलौता दोषी है?
•या फिर यह एक सुनियोजित खेल है, जिसमें एक छोटे कर्मचारी को आगे कर दिया गया और बड़े चेहरे अब भी सिस्टम की आड़ में सुरक्षित हैं?
एक गिरफ्तारी, कई अनुत्तरित प्रश्न!
आशित बेक की गिरफ्तारी के बाद विभाग ने भले ही राहत की सांस ली हो, लेकिन विभागीय गलियारों और स्वास्थ्य महकमे में यह सवाल अब गूंजने लगा है कि क्या आशित बेक अकेला ही इस पूरे खेल का सूत्रधार था? या फिर वह सिर्फ एक मोहरा था, जिसे आगे कर दिया गया और असली खिलाड़ी आज भी फाइलों, कुर्सियों और प्रभाव के पीछे छिपे हैं?
सूत्रों की मानें तो इस पूरे कांड का केन्द्रीय पात्र कोई और नहीं बल्कि DHS के प्रभारी स्टोर अधिकारी लक्ष्मीकांत तिवारी बताए जा रहे हैं। सवाल यह है कि-
• जिस स्टोर से टेबलेट गायब हुए,उस स्टोर का प्रभारी अधिकारी आज भी बेदाग कैसे?
• जिस कर्मचारी (आशित बेक) को जेल भेजा गया, वह किसके निर्देश में काम करता था?
धृतराष्ट्र बना विभाग?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि विभागीय गलियारों में यह चर्चा ज़ोर पकड़ रही है।
•क्या लक्ष्मीकांत तिवारी को जानबूझकर बचाया जा रहा है?
•क्या स्वास्थ्य विभाग इस मामले में धृतराष्ट्र की भूमिका निभा रहा है—जिसे सब कुछ दिखाई दे रहा है, फिर भी वह आंखें मूंदे बैठा है?
•सूत्र बताते हैं किलक्ष्मीकांत तिवारी पिछले दो वर्षों से नियमित रूप से दोपहर 2 बजे कार्यालय पहुंचते हैं।अब सवाल यह उठता है कि—
•क्या इतना बड़ा और संवेदनशील विभाग “2 बजे आने” वाले अधिकारी के भरोसे चल रहा है?
•क्या DHS में खरीदी-बिक्री, स्टॉक और करोड़ों की सामग्री की जिम्मेदारी इतनी हल्के में दी जा सकती है?
•सबूत सामने, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं?
स्वास्थ्य विभाग के भीतर ही यह चर्चा आम है कि आशित बेक, जो आज जेल की हवा खा रहा है,वह लक्ष्मीकांत तिवारी और संचालक के निज सहायक अमित साहू का सबसे नजदीकी कर्मचारी था।
तो फिर स्वाभाविक प्रश्न उठता है—
•अगर आशित बेक दोषी है, तो उसके अधिकारी कैसे पाक-साफ?
•क्या यह वही पुराना सरकारी फार्मूला है—“छोटा पकड़ा जाएगा, बड़ा बच जाएगा”?
•राजनीतिक संरक्षण या अफसरशाही का कवच?
अब सवाल और भी गंभीर हो जाता है।सूत्रों के हवाले से यह चर्चा तेज़ है कि—
•क्या लक्ष्मीकांत तिवारी को कोई राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है?
•या फिर DHS के संचालक के ‘पहरेदार’ माने जाने वाले निज सहायक अमित साहू उन्हें बचाने में जुटे हैं?
विभाग के अंदरखाने यह भी कहा जा रहा है कि बिना ऊपरी संरक्षण के इतने बड़े मामले में कोई अधिकारी यूं ही सुरक्षित नहीं रह सकता।
संचालक संजीव झा की कार्रवाई आधी या पूरी?
यह कहना गलत नहीं होगा कि DHS संचालक संजीव झा ने आशित बेक के मामले में त्वरित कार्रवाई कर यह दिखा दिया कि वे मामले को हल्के में नहीं ले रहे ,लेकिन अब उनकी कार्रवाई कसौटी पर है। क्योंकि—
•अगर जांच सिर्फ आशित बेक तक सीमित रहती है, तो यह कार्रवाई अधूरी मानी जाएगी।
•अगर स्टोर प्रभारी और उससे जुड़े अधिकारी जांच के दायरे में नहीं आते, तो सवाल उठना लाज़मी है।
क्या आशित बेक बना बलि का बकरा? स्वास्थ्य विभाग में यह सवाल गूंज रहा है—
•क्या आशित बेक को बलि का बकरा बना दिया गया?
•क्या असली साजिशकर्ता आज भी फाइलों और कुर्सियों के पीछे सुरक्षित बैठे हैं?
इतिहास गवाह है कि बड़े घोटालों में अक्सर एक नाम जेल जाता है,और कई नाम सिस्टम की दीवारों में दबा दिए जाते हैं।
अब निगाहें जांच पर!अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
•विभाग के उच्च अधिकारी लक्ष्मीकांत तिवारी पर अपनी दृष्टि कब डालेंगे?
•क्या उनके कार्यालय आने-जाने की जांच होगी?
•उनके कार्यकाल की खरीदी-बिक्री और स्टॉक का ऑडिट होगा?
•या फिर मामला यहीं ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
वही अमित साहू की भूमिका पर इस पूरे घटनाक्रम में संचालक के निज सहायक अमित साहू की भूमिका को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं।उनकी भूमिका क्या है?वे किसे बचा रहे हैं और क्यों?और अमित साहू की क्या-क्या भूमिका है!
DHS के संचालक के निज सहायक अमित साहू से संबंधित इन तमाम सवालों के जवाब हम अगले एपिसोड में प्रमुखता से आपके सामने लाएंगे!
“वही धर्मेंद्र गंवाई डिप्टी डायरेक्टर संचालनालय के 150 पेजों के जांच के साथ CMHO गौरेला पेंड्रा मरवाही कार्यालय के 10 बंडलों का क्या राज है, उसको भी हम प्रमुखता से हम सामने लाएंगे?”
फिलहाल इतना तय है—DHS का यह टेबलेट चोरी कांड अब सिर्फ चोरी का मामला नहीं रहा,बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही, राजनीतिक संरक्षण और सिस्टम की ईमानदारी की अग्निपरीक्षा बन चुका है।













