“कहां है मेरा लाल…?” सिर-धड़ से अलग हुए मासूम की मां की चीखों से कांप उठा अस्पताल!
लखनऊ–आगरा एक्सप्रेसवे का दिल दहला देने वाला हादसा—एक ही परिवार से उठी तीन अर्थियां, टूट गया कई घरों का सहारा!
लखनऊ/सोमवार रात लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे पर हुए भीषण सड़क हादसे ने न सिर्फ तीन जिंदगियां निगल लीं, बल्कि कई परिवारों को ऐसा घाव दे दिया जिसे समय भी शायद ही कभी भर पाए। 5 साल के मासूम अनुराग का सिर सिर धड़ से अलग हो गया, उसकी मां गुड्डी देवी का पैर कट गया—और जब बुधवार दोपहर उन्हें होश आया तो उनके होंठों पर सिर्फ एक ही सवाल था—
“बस एक बार… मेरा लाल दिखा दो… कहां है मेरा बेटा?”
अस्पताल के बेड पर पड़े-पड़े, दवाई की गंध और मशीनों की बीप के बीच गुड्डी देवी की कराहें पूरे वार्ड को हिला दे रही थीं। हर बार नर्स उनका हाथ थामने की कोशिश करती, लेकिन उनका टूटता हुआ शब्दों में बस यही निकलता—“कृपया… एक बार मेरा बच्चा… मेरा अनुराग…”डॉक्टरों ने उन्हें सच बताना उचित नहीं समझा। पति अजय बेटी को लेकर उनके पास पहुंचे, मगर बेटे की गैर-मौजूदगी गुड्डी देवी को अंदर से चीर रही थी। जैसे ही उन्होंने पूछा—“अजय… अनुराग कहां है?”—अजय का गला भर आया। वह फोन आने का बहाना बनाकर बाहर चले गए… क्योंकि उनकी हिम्मत नहीं थी कि उस मां को बता सकें कि उसका लाल अब इस दुनिया में नहीं है।
पोस्टमार्टम हाउस में पसरा मातम—रोते-बिलखते पहुंचे परिजन!
बुधवार दोपहर कानपुर के बिल्हौर के अरौल क्षेत्र स्थित पोस्टमार्टम हाउस का दृश्य देखकर कोई भी पत्थर-दिल व्यक्ति पिघल जाता। इधर-उधर चीखें गूंज रहीं थीं, आंखों में गुस्सा, दर्द और अविश्वास तैर रहा था। परिवार वाले अपने प्रियजनों की लाशें लेने पहुंचे और वहां का माहौल श्मशान-सी शांति और मातम में बदल गया।
तीन बहनों के इकलौते भाई शशि गिरी (26) की लाश जब स्ट्रेचर पर आई तो घरवालों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। मां ऊषा की करुण चीत्कार ने आस-पास का माहौल हल्का नहीं होने दिया। घर में शशि की शादी की तैयारियां चल रही थीं, परिवार खुशियों के सपने बुन रहा था। पर किस्मत ने उन सपनों को कफन में लपेटकर घरवालों को सौंप दिया।
शशि की बहनें दहाड़ें मारकर रोती रहीं—“भैया… हम सबको छोड़कर क्यों चला गया?”
“मेरे बेटे का सब कुछ उजड़ गया…”—अनुराग के दादा की टूटती आवाज!
जब चार साल के अनुराग का शव नजीराबाद कब्रिस्तान में दफनाने ले जाया गया, तो उसके दादा शौकी चौधरी अपने पैरों पर खड़े नहीं रह सके। पोते के निर्जीव शरीर को देखकर वह बेसुध होकर गिर पड़े। होश आने पर कांपती आवाज में बस इतना कहा—
“मेरे बेटे का सब कुछ उजड़ गया… सब खत्म हो गया…”उनकी यह टूटती आवाज सुनकर आस-पास हर कोई रो पड़ा। यह वह चीख थी जो किसी भी व्यक्ति के दिल को झकझोर कर रख दे।

लखनऊ–आगरा एक्सप्रेसवे बना मौत का रास्ता!
सोमवार रात हुए हादसे में जिन तीन लोगों की मौत हुई—
•नसीम आलम (30),
•शशि गिरी (26),
•अनुराग (5),
उनके परिवारों की दुनिया पल भर में उजड़ गई। हादसे का मंजर इतना भयावह था कि बचावकर्मियों के भी हाथ कांप गए।
शशि का अधूरा सपना—सऊदी अरब जाने से पहले ही मौत ने छीन ली जिंदगी!
शशि गिरी गुवाहाटी की एक पेपर मिल में सुपरवाइजर थे। पिता की मौत के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं पर थी। मां और तीन बहनों का सहारा सिर्फ वही थे।सऊदी अरब में नौकरी के लिए उनका चयन हो चुका था। मेडिकल टेस्ट करवाने वह गुवाहाटी से निकले, मेडिकल पूरा हुआ और वह खुशी-खुशी घर लौट रहे थे। पर रास्ते में मौत उनसे टकरा गई और सारे सपने बिखर गए।
परिवार उसका शव लेकर बिहार स्थित अपने गांव के लिए रवाना हुआ। घर में मातम पसरा है, आंगन में चूल्हा नहीं जला—और वह घर जो शादी की तैयारियों से चमकने वाला था, अब सन्नाटे में डूब गया।
मां की चीखें… पिता का टूटना… और मासूम की मौन विदाई!
अनुराग का अंतिम सफर नजीराबाद कब्रिस्तान में पूरा हुआ। छोटा-सा शरीर, सफेद कपड़ों में लिपटा…
उसकी छोटी-छोटी चप्पलें और खिलौने घर के एक कोने में वैसे ही पड़े हैं—जैसे वह अभी दौड़कर आएगा और मां की गोद में चढ़ जाएगा।लेकिन अब वह सिर्फ तस्वीरों में मुस्कुरा रहा है।
अस्पताल में मां का दर्द—“कहां है मेरा बेटा…?”
वार्ड में लौटते डॉक्टर-नर्सें एक-दूसरे की ओर देख रहे थे। कोई नहीं जानता था कि वह मां यह सच जानने के बाद कैसे संभलेगी। वह बार-बार अपने कटे हुए पैर की तरफ देखती, फिर आसमान की ओर—जैसे भगवान से पूछ रही हो कि आखिर उसने उसका कौन-सा कसूर निकाला।
गुड्डी देवी की यह यंत्रणा, यह प्रश्न, यह पुकार—“कहां है मेरा लाल?”
सिर्फ एक मां का नहीं, बल्कि उस पूरे हादसे का दर्द है, जिसने कई घरों को हमेशा के लिए खामोश कर दिया।यह हादसा एक बार फिर सवाल खड़ा करता है—
क्या हमारी सड़कों पर जिंदगी की कीमत इतनी सस्ती हो चुकी है कि घर से निकले लोग यह भरोसा लेकर नहीं जा सकते कि वे सही-सलामत लौट आएंगे?
इस हादसे ने सिर्फ तीन नहीं, दर्जनों जिंदगियां तोड़ दीं। और इन रोती मांओं-बहनों की चीखें हमेशा याद दिलाती रहेंगी—किसी का एक पल का लापरवाही किसी और की पूरी जिंदगी उजाड़ देती है।













