October 28, 2026 7:29 pm

गरियाबंद वनमंडल में फर्जी बिल-बाउचर का कथित महाघोटाला:मशीनों से काम, भुगतान के बाउचर परिवार,रिश्तेदारों और परिचित के नाम?

जंगल की हरियाली के पीछे सरकारी खजाने पर सेंधमारी का गंभीर आरोप! रेंजर से लेकर कंप्यूटर ऑपरेटर तक की भूमिका पर उठे सवाल, करोड़ों के आहरण की कहानी का अगला अंक जल्द!

गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद वन मंडल में कथित फर्जी बिल-बाउचर और संदिग्ध भुगतान को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि जिन कार्यों को मशीनों के माध्यम से कराया गया, उनके भुगतान से जुड़े बाउचर विभागीय कर्मचारियों के परिवारजनों, रिश्तेदारों और परिचितों के नाम पर तैयार किए गए। इतना ही नहीं, कुछ मामलों में बिजली विभाग में दैनिक श्रमिक के रूप में कार्य करने वाले व्यक्तियों के नाम पर भी बाउचर भरकर राशि आहरित किए जाने की बात सामने आई है। यदि इन आरोपों की पुष्टि दस्तावेजी जांच में होती है, तो यह मामला सरकारी धन के उपयोग, भुगतान प्रक्रिया की पारदर्शिता और विभागीय निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।

राजस्थानियो की मशीनों से काम, कागजों में मजदूरों की फौज!

इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू कथित तौर पर कार्य निष्पादन और भुगतान के दस्तावेजों के बीच अंतर है। सवाल यह है कि यदि कार्य राजस्थानियों की मशीनों से कार्य कराया गया , तो भुगतान के लिए तैयार किए गए बाउचर किन व्यक्तियों के नाम पर बनाए गए? क्या संबंधित व्यक्तियों ने वास्तव में काम किया था? क्या उनके नाम पर जारी भुगतान का पूरा हिसाब उपलब्ध है? और क्या कार्यस्थल पर किए गए काम तथा सरकारी अभिलेखों में दर्ज विवरण का मिलान किया गया?

इन सवालों के जवाब संबंधित मस्टर रोल, मजदूरी भुगतान पंजी, बिल-बाउचर, कार्यादेश, माप पुस्तिका और भुगतान संबंधी अभिलेखों की निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकते हैं।

आरोप है कि विभाग में पदस्थ कुछ कर्मचारियों के परिवारजनों और परिचितों के नाम पर बाउचर तैयार किए गए। यदि ऐसा हुआ है, तो यह जांचना जरूरी होगा कि संबंधित लोगों ने वास्तव में कार्य किया था या उनके नाम का उपयोग केवल भुगतान की प्रक्रिया पूरी करने के लिए किया गया। केवल रिश्तेदारी के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन यदि बिना काम किए भुगतान हुआ है, तो उसकी जवाबदेही तय करना आवश्यक है।

रेंजर, डिप्टी रेंजर, बीट गार्ड और कंप्यूटर ऑपरेटर की भूमिका पर सवाल!

कथित अनियमितताओं के इस मामले में रेंजर, डिप्टी रेंजर, बीट गार्ड से लेकर कंप्यूटर ऑपरेटर तक की भूमिका को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, इन पदों पर कार्यरत सभी व्यक्तियों की संलिप्तता प्रामाणिको के आधार पर प्रमाणित मानी जा रही। प्रत्येक अधिकारी और कर्मचारी की भूमिका अभिलेखों, स्वीकृतियों, सत्यापन और भुगतान प्रक्रिया के आधार पर अलग-अलग जांची जानी चाहिए।

यदि किसी कार्य का भुगतान करने से पहले संबंधित अधिकारी द्वारा सत्यापन आवश्यक था,तो यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि सत्यापन किसने किया, किस आधार पर किया और क्या वास्तविक कार्य की स्थिति का निरीक्षण किया गया था।

कंप्यूटर ऑपरेटर की भूमिका भी जांच के दायरे में आ रही क्योंकि कंप्यूटर ऑपरेटर द्वारा अपनी माता जी और अपने परिचित के नाम बाउचर भरकर आरोप अपने रेंजर और डिप्टी रेंजर के ऊपर लगाया जा रहा है  अब प्रश्न यह उठ रहा है कि यदि उसके माध्यम से भुगतान संबंधी प्रविष्टियां, बाउचर या अन्य दस्तावेज तैयार अथवा अपलोड किए गए है तो क्या वास्तव में उच्च अधिकारी के संज्ञान हुआ है या दोनों की संलिप्तता है लेकिन दस्तावेज तैयार करने और भुगतान स्वीकृत करने की जिम्मेदारियां उच्च अधिकारी है बिना देखे या देखकर भी अनदेखी किया गया है इस मामले की जांच में दस्तावेजों को संलग्न सचिव वन से लेकर कर प्रधान कार्यालय अरण्ड भवन से कराई जायेगी।

सबसे बड़ा सवाल यही है—यदि भुगतान के दस्तावेजों में वास्तविक कार्य से अलग विवरण दर्ज किए गए, तो उन्हें जांचने और स्वीकृत करने वाले अधिकारियों ने क्या प्रक्रिया अपनाई? क्या उनके द्वारा भी बिना कार्य स्थल पर गए बाउचर सत्यापन कर दिया गया ?

तत्कालीन डिप्टी रेंजर से सत्यापन के नियमों की अनदेखी का आरोप!

मामले का एक अन्य गंभीर पहलू कुछ प्रकरणों में तत्कालीन पदस्थ डिप्टी रेंजर से सत्यापन कराने की निर्धारित प्रक्रिया को कथित तौर पर दरकिनार किए जाने से संबंधित है। आरोप है कि आवश्यक सत्यापन प्रक्रिया पूरी किए बिना ही करोड़ों रुपये की राशि का आहरण किया गया।

यदि किसी भुगतान के लिए संबंधित अधिकारी का सत्यापन अनिवार्य था, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि सत्यापन के बिना भुगतान किस आधार पर स्वीकृत हुआ। क्या किसी अन्य अधिकारी ने सत्यापन किया था? क्या सक्षम अधिकारी से अनुमति ली गई थी? क्या संबंधित फाइलों में आवश्यक दस्तावेज मौजूद हैं? और क्या भुगतान से पहले कार्य की वास्तविक स्थिति का परीक्षण किया गया?

इन प्रश्नों का उत्तर विभागीय फाइलों, भुगतान स्वीकृति आदेशों, माप पुस्तिकाओं और संबंधित अधिकारियों के हस्ताक्षरों की जांच से मिल सकता है।

यदि सत्यापन की अनिवार्य प्रक्रिया को जानबूझकर दरकिनार किया गया और इसके परिणामस्वरूप सरकारी धन का अनुचित आहरण हुआ, तो यह केवल प्रक्रियागत लापरवाही का मामला नहीं रहेगा। ऐसी स्थिति में जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका और संभावित वित्तीय नुकसान की जांच जरूरी होगी।

हमारा द्वारा तत्कालीन डिप्टी रेंजर द्वारा पूछने पर बताया गया कि कार्य मेरे कार्यकाल का है जो वास्तविक कार्य है मैं उसी कार्य के बाउचर में हस्ताक्षर करता लेकिन मेरे रिटायर्डमेंट के बाद यह फर्जी बाउचर भरा गया है बाउचरो में जो हस्ताक्षर किये गये है वह मेरे नहीं है किसी बाउचरो में मेरे फर्जी हस्ताक्षर कियें है।

बिजली विभाग के दैनिक श्रमिक के नाम पर बाउचर—जांच का नया सिरा!

कथित मामले में बिजली विभाग में दैनिक श्रमिक के रूप में कार्य करने वाले व्यक्तियों के नाम पर बाउचर तैयार कर राशि आहरित किए जाने का आरोप भी सामने आया है। यह पहलू जांच की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।

सबसे पहले यह पता लगाना होगा कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में वन मंडल के कार्यों में लगाए गए थे या नहीं। यदि वे किसी दूसरे विभाग में कार्यरत थे, तो वन विभाग के कार्यों के लिए उनके नाम पर भुगतान किस आधार पर किया गया? क्या उनकी उपस्थिति दर्ज है? क्या उन्होंने संबंधित स्थल पर कार्य किया था? क्या भुगतान की राशि उनके बैंक खाते में गई या किसी अन्य व्यक्ति ने उसका लाभ उठाया?

इन सवालों का उत्तर संबंधित विभागों के सेवा अभिलेखों, उपस्थिति पंजी, भुगतान विवरण और बैंक संबंधी वैधानिक जांच से प्राप्त किया जा सकता है। बिना प्रमाण के किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए इन तथ्यों का सत्यापन आवश्यक है।

करोड़ों रुपये के आहरण का दावा, दस्तावेजों से खुलेगी पूरी कहानी!

इस मामले को लेकर यह दावा किया जा रहा है कि कुछ प्रकरणों में करोड़ों रुपये की राशि का आहरण संदिग्ध परिस्थितियों में हुआ। हालांकि, कुल राशि, संबंधित कार्यों की संख्या, भुगतान पाने वालों के नाम और सरकारी खजाने को हुए वास्तविक नुकसान का अंतिम निर्धारण दस्तावेजों की जांच के बाद ही किया जा सकता है।

इसलिए आवश्यक है कि वन मंडल के संबंधित अधिकारियों द्वारा सभी संदिग्ध भुगतान प्रकरणों की सूची तैयार की जाए। कार्यादेश से लेकर अंतिम भुगतान तक की पूरी प्रक्रिया का परीक्षण हो। जिन व्यक्तियों के नाम पर बाउचर तैयार हुए, उनसे संबंधित कार्य और भुगतान का सत्यापन किया जाए। साथ ही, जिन अधिकारियों ने बिलों की जांच, कार्य का सत्यापन और भुगतान की स्वीकृति दी, उनकी भूमिका भी स्पष्ट की जाए।

यदि किसी स्तर पर फर्जी दस्तावेज, गलत प्रविष्टियां या नियमविरुद्ध भुगतान पाए जाते हैं, तो नियमानुसार विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

अगले अंक में प्रकाशित होंगे दस्तावेज—अब जवाबदेही की बारी!

इस प्रकरण को लेकर संबंधित दस्तावेज अगले अंक में प्रकाशित किए जाने की बात कही गई है। ऐसे में अब निगाहें उन अभिलेखों पर टिकी हैं, जिनसे कथित अनियमितताओं की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

दस्तावेजों के प्रकाशन के साथ यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित बिल किस कार्य के लिए बनाए गए, भुगतान किसके नाम पर हुआ, सत्यापन किसने किया और स्वीकृति किस अधिकारी ने दी। यदि दस्तावेज किसी अनियमितता की पुष्टि करते हैं, तो उन्हें संबंधित विभाग और सक्षम जांच एजेंसी के समक्ष प्रस्तुत कर निष्पक्ष जांच की मांग की जा सकती है।

वन विभाग जैसे महत्वपूर्ण महकमे में सरकारी धन का उपयोग जंगलों के संरक्षण, वन विकास, श्रमिकों के भुगतान और जनहित से जुड़े कार्यों के लिए किया जाता है। इसलिए इन निधियों के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य है।

अब इस मामले को लेकर विभागीय स्तर से लेकर आर्थिक अन्वेषण ब्यूरो शिकायत और जांच प्रामणिको के साथ कराया जाएगा।

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