September 8, 2026 4:34 pm

आरटीआई की जानकारी पर खाद्य विभाग में ‘फाइल-फाइल’ का खेल:गंधेश्वर श्री महादेव ट्रस्ट मंदिर की भूमि पर बोनस राशि मामले की जांच रिपोर्ट बनी रहस्य!

आरटीआई की जानकारी पर खाद्य विभाग में ‘फाइल-फाइल’ का खेल:गंधेश्वर श्री महादेव ट्रस्ट मंदिर की भूमि पर बोनस राशि मामले की जांच रिपोर्ट बनी रहस्य!

जनसूचना अधिकारी ने जानकारी खाद्य विभाग को भेजी, फिर भी शाखा प्रभारी मनीष गुप्ता की टेबल पर क्यों अटकी जानकारी?

महासमुंद।जिले में खाद्य विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर सवालों का तूफान खड़ा हो गया है। मामला इस बार किसी राशन दुकान, धान खरीदी केंद्र या खाद्यान्न वितरण का नहीं, बल्कि गंधेश्वर श्री महादेव ट्रस्ट मंदिर की भूमि पर बोनस राशि हड़पने के कथित मामले में की गई जांच के प्रतिवेदन की सत्यापित प्रति से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई इस महत्वपूर्ण जानकारी को लेकर अब विभाग की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं।

आरोप है कि आरटीआई आवेदक द्वारा मांगी गई जानकारी विधिवत प्रक्रिया के तहत संबंधित जनसूचना अधिकारी द्वारा खाद्य विभाग को अंतरित कर दी गई थी। यानी जिस कार्यालय के पास संबंधित दस्तावेज और जानकारी उपलब्ध होने की बात सामने आ रही है, वहां सूचना पहुंच चुकी थी। लेकिन इसके बाद कहानी ऐसी शुरू हुई, मानो फाइल ने सरकारी दफ्तर में प्रवेश करते ही ‘लापता होने’ का संकल्प ले लिया हो!

बताया जा रहा है कि खाद्य विभाग के शाखा प्रभारी बाबू मनीष गुप्ता के स्तर पर जानकारी आज दिवस तक अपीलार्थी को उपलब्ध नहीं कराई गई है। अब सवाल यह है कि जब सूचना विभाग के पास पहुंच चुकी थी, तो आखिर वह किस टेबल, किस फाइल और किस आदेश की प्रतीक्षा में अटकी हुई है?

जांच प्रतिवेदन आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों?

यह कोई सामान्य सूचना नहीं है। मामला कथित रूप से गंधेश्वर श्री महादेव ट्रस्ट मंदिर सिरपुर की भूमि और उससे जुड़ी बोनस राशि के कथित दुरुपयोग/हड़पने के आरोपों में की गई जांच से संबंधित है। आरटीआई में मांगी गई जानकारी में इसी जांच प्रतिवेदन की सत्यापित प्रति महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में बताई जा रही है।

ऐसे में यदि किसी नागरिक ने विधिवत आरटीआई के माध्यम से जांच प्रतिवेदन की प्रमाणित प्रति मांगी है और संबंधित कार्यालय को आवेदन अंतरित भी कर दिया गया है, तो फिर सूचना उपलब्ध कराने में अनावश्यक देरी क्यों?

यही सवाल अब पूरे मामले का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है।

फाइल पहुंची, लेकिन जानकारी नहीं पहुंची!’

सरकारी कार्यालयों में अक्सर कहा जाता है कि हर काम नियम और प्रक्रिया के तहत होता है। लेकिन यहां सवाल यह उठ रहा है कि प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी जानकारी उपलब्ध क्यों नहीं हो रही?

आरटीआई कानून का मूल उद्देश्य ही यही है कि शासन-प्रशासन के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो। यदि किसी जांच से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध हैं और उनके संबंध में सूचना मांगी गई है, तो कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उसका परीक्षण कर उचित निर्णय लिया जाना चाहिए।

लेकिन आरोप है कि यहां मामला ‘आज नहीं तो कल’ की सरकारी शैली में उलझता दिखाई दे रहा है।

आवेदक का कहना है कि जानकारी के लिए उसे लगातार विभागीय स्तर पर चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या एक साधारण आरटीआई सूचना के लिए आवेदक को बार-बार कार्यालय के दरवाजे खटखटाने पड़ेंगे?

बाबू की टेबल बनी ‘सूचना की सीमा रेखा’?

सबसे तीखा सवाल शाखा प्रभारी मनीष गुप्ता की भूमिका को लेकर उठाया जा रहा है। आरोप है कि संबंधित जानकारी उनके स्तर पर लंबित है और अब तक अपीलार्थी को उपलब्ध नहीं कराई गई।

ऐसे में व्यंग्यात्मक सवाल यह भी उठने लगा है कि क्या खाद्य विभाग में किसी आरटीआई आवेदन की अंतिम मंजिल जनसूचना अधिकारी का कार्यालय नहीं, बल्कि शाखा प्रभारी की टेबल बन गई है?

यदि दस्तावेज विभाग में उपलब्ध हैं, तो उन्हें नियमों के अनुसार उपलब्ध कराने में आखिर बाधा क्या है? यदि दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, तो इसकी स्पष्ट जानकारी आवेदक को क्यों नहीं दी जा रही? और यदि सूचना देने से कोई कानूनी कारणों से इनकार किया जाना है, तो क्या उसका विधिवत कारण बताया गया है?

इन सवालों का जवाब विभागीय अधिकारियों को देना चाहिए।

उच्च अधिकारी आखिर कब लेंगे संज्ञान?

मामला अब केवल एक आरटीआई आवेदक को सूचना मिलने या न मिलने तक सीमित नहीं रह गया है। यह सवाल खाद्य विभाग की जवाबदेही और पारदर्शिता से भी जुड़ गया है।

आवेदक का आरोप है कि संबंधित अधिकारी द्वारा मामले का संज्ञान लेकर कार्रवाई करने के बजाय विभागीय स्तर पर संबंधित कर्मचारी को संरक्षण दिया जा रहा है। हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

यदि वास्तव में कोई अधिकारी या कर्मचारी आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी को अनावश्यक रूप से रोक रहा है, तो यह गंभीर प्रशासनिक विषय है। ऐसे मामलों में वरिष्ठ अधिकारियों को स्वयं संज्ञान लेकर यह पता करना चाहिए कि आवेदन कब प्राप्त हुआ, किस शाखा को भेजा गया, संबंधित फाइल किसके पास है और सूचना देने में विलंब का वास्तविक कारण क्या है।

कुर्सियां तोड़ने’ के आरोपों से गरमाया माहौल!

इसी बीच विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर आवेदक की नाराजगी भी सामने आ रही है। आरोप लगाया जा रहा है कि खाद्य विभाग में अधिकारी-कर्मचारी काम से ज्यादा कुर्सियां तोड़ने में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं,जबकि आम नागरिक अपने अधिकार की जानकारी के लिए कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर है।

हालांकि यह आरोप विभागीय रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों के पक्ष के साथ जांच का विषय है, लेकिन इतना जरूर है कि यदि आरटीआई आवेदन समय पर निराकृत नहीं होते हैं तो इससे विभाग की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब सवालों के घेरे में पूरा विभाग!

गंधेश्वर श्री महादेव ट्रस्ट मंदिर की भूमि से जुड़े कथित बोनस राशि मामले की जांच रिपोर्ट की सत्यापित प्रति आखिर कहां है? वह किस अधिकारी के पास है? आवेदन कब विभाग को प्राप्त हुआ? शाखा प्रभारी के पास फाइल कब पहुंची? अब तक सूचना क्यों नहीं दी गई? और यदि सूचना नहीं दी जा सकती, तो उसका कानूनी आधार क्या है?

इन सवालों के जवाब अब जरूरी हो गए हैं।

क्योंकि मामला सिर्फ एक कागज की प्रति का नहीं है। मामला उस व्यवस्था की विश्वसनीयता का है, जहां नागरिक अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए शासन से जानकारी मांगता है।

अब निगाहें खाद्य विभाग के उच्च अधिकारियों पर हैं—क्या वे इस पूरे मामले की फाइल खोलेंगे, देरी का कारण तलाशेंगे और जिम्मेदारी तय करेंगे? या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों की उसी लंबी कतार में खड़ा रहेगा, जहां हर सवाल का जवाब बस यही होता है—“फाइल चल रही है…”

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—जांच प्रतिवेदन आखिर कब सामने आएगा और आरटीआई आवेदक को मांगी गई सत्यापित प्रति कब मिलेगी?

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