August 10, 2026 6:28 pm

छत्तीसगढ़  धान के कटोरे में फिर गूंजा किसान सम्मान का नगाड़ा!विष्णु सरकार ने बढ़ाया अन्नदाता का मान—₹3100 के भरोसे से खेतों में लौटी उम्मीद, हरेली ने दी खुशहाली की दस्तक!

 छत्तीसगढ़  धान के कटोरे में फिर गूंजा किसान सम्मान का नगाड़ा!विष्णु सरकार ने बढ़ाया अन्नदाता का मान—₹3100 के भरोसे से खेतों में लौटी उम्मीद, हरेली ने दी खुशहाली की दस्तक!

रायपुर/छत्तीसगढ़ की धरती पर जब सावन की बूंदें गिरती हैं, खेतों में हरियाली की चादर बिछती है और गांव की गलियों में गेड़ी की “रच-रच” आवाज गूंजती है, तब सिर्फ एक त्योहार नहीं आता—आता है किसान के श्रम, संस्कृति और आत्मसम्मान का पर्व—हरेली तिहार।

हरेली केवल छत्तीसगढ़ का पहला त्यौहार नहीं, बल्कि यह उस किसान की पहचान है जिसके पसीने से प्रदेश की अर्थव्यवस्था की नींव मजबूत होती है। इसी किसान के सम्मान और आर्थिक मजबूती को लेकर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार किसानों के हित में लिए गए नीतिगत फैसलों को अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत कर रही है।

सरकार का दावा है कि पिछले ढाई वर्षों में खेती-किसानी को नया संबल देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। बीते खरीफ विपणन वर्ष में किसानों से समर्थन मूल्य पर 141.05 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी की गई। वहीं पंजीकृत किसानों से प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान की खरीदी 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से किए जाने को सरकार किसान हितैषी निर्णय के रूप में रेखांकित कर रही है।

धान खरीदी के आंकड़ों से लेकर बोनस तक—किसान के खाते में पहुंची राहत!

छत्तीसगढ़ को देशभर में “धान का कटोरा” कहा जाता है। यहां खेती केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि करोड़ों ग्रामीण परिवारों की जीवनरेखा है। यही वजह है कि धान की कीमत, समर्थन मूल्य और सरकारी खरीदी का सीधा असर गांव की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

प्रदेश सरकार के अनुसार, किसानों के आर्थिक हितों को मजबूत करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए रमन सरकार के पिछले दो वर्षों के बकाया धान बोनस के रूप में 3716.38 करोड़ रुपये किसानों के खातों में अंतरित किए गए।

सरकार का तर्क है कि जब किसान के हाथ में पैसा आता है तो उसका असर केवल खेत तक सीमित नहीं रहता। किसान खाद-बीज खरीदता है, कृषि उपकरण लेता है, मजदूरों को भुगतान करता है और गांव की दुकानों से जरूरत का सामान खरीदता है। यानी किसान की जेब में पहुंचा पैसा ग्रामीण बाजार की रफ्तार को भी बढ़ाता है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का मानना है कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है और जब किसान खुशहाल होगा, तभी प्रदेश का व्यापार और उद्योग भी आगे बढ़ेगा। यही सोच खेती-किसानी को प्रदेश की आर्थिक मजबूती से जोड़ती है।

हरेली: जब किसान औजारों में देखता है अपना भविष्य!

हरेली के दिन गांव की सुबह ही कुछ अलग होती है। सूरज निकलने से पहले ही किसान परिवारों में तैयारियां शुरू हो जाती हैं। तालाब और पनघट पर किसान, बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे अपने पशुधन को नहलाते हैं।

बैल, गाय और बछड़ों को स्नान कराने के बाद कृषि उपकरणों की बारी आती है। हल यानी नांगर, कुदाली, फावड़ा, गैंती और खेती में इस्तेमाल होने वाले अन्य औजारों को साफ किया जाता है। घर के आंगन में मुरूम बिछाकर कृषि उपकरणों को पूजा के लिए सजाया जाता है।

फिर होती है उस मेहनत की पूजा, जिसने पूरे वर्ष परिवार का पेट पालना है।

धूप-दीप जलता है। नारियल चढ़ाया जाता है। घरों में माताएं गुड़ का चीला बनाती हैं और कृषि औजारों को भोग लगाया जाता है। अपने आराध्य देवी-देवताओं की पूजा के साथ गांव की गुड़ी में ठाकुरदेव की आराधना की जाती है।

यह दृश्य बताता है कि छत्तीसगढ़ में किसान के लिए खेती केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि जीवन और संस्कृति का हिस्सा है।

गेड़ी के बिना अधूरी है हरेली की कहानी!

हरेली का नाम आते ही सबसे पहले गांव के बच्चों के चेहरे पर मुस्कान तैरती है—क्योंकि गेड़ी के बिना हरेली तिहार जैसे अधूरा ही माना जाता है।

हरेली से कई दिन पहले गांव के बढ़ई के घर गेड़ी बनाने का ऑर्डर पहुंचने लगता था। बच्चों की जिद और अभिभावकों की मेहनत से घर-घर गेड़ी तैयार होती थी।

बांस से बनाई जाने वाली गेड़ी पर चढ़ना बच्चों और युवाओं के लिए केवल खेल नहीं, बल्कि त्योहार का रोमांच होता है। दो लंबे बांसों में बराबर दूरी पर कीलें लगाई जाती हैं। फिर बांस के टुकड़ों से पैर रखने के लिए पउआ तैयार किया जाता है और उसे मजबूती से बांधा जाता है।

जब बच्चे गेड़ी पर कदम रखते हैं तो निकलती है—“रच-रच” की आवाज।

और यही आवाज गांव के वातावरण में हरेली के उल्लास की घोषणा करती है।

आज आधुनिकता के दौर में भले ही मनोरंजन के साधन बदल गए हों, लेकिन ग्रामीण अंचलों में गेड़ी आज भी हरेली की पहचान बनी हुई है।

पशुधन की पूजा, वनौषधियों की परंपरा और गांव की साझी संस्कृति!

हरेली पर्व किसानों और पशुधन के बीच के रिश्ते को भी सामने लाता है। पशुधन को स्वस्थ रखने के लिए औषधीय परंपराओं से जुड़ी मान्यताएं आज भी ग्रामीण समाज में दिखाई देती हैं।

आटे को गूंथकर गोल लोंदी बनाई जाती है और उसे अरंडी या खम्हार के पत्ते में लपेटकर पशुओं को खिलाने की परंपरा है। ग्रामीण मान्यता के अनुसार इससे पशुधन को रोगों से बचाने में मदद मिलती है।

वहीं यादव समाज के लोग वनांचल से कंद-मूल और वनौषधियां लाने की परंपरा निभाते रहे हैं। गांव के सहाड़ादेव अथवा ठाकुरदेव के पास वन से लाई गई जड़ी-बूटियों को उबालकर किसानों को देने की परंपरा रही है। बदले में किसान चावल, दाल आदि देकर इस सामाजिक परंपरा को आगे बढ़ाते रहे हैं।

गांव के पौनी-पसारी वर्ग से जुड़े राऊत, लोहार और बैगा जैसे समुदायों की भी हरेली में अपनी भूमिका रही है। घरों के दरवाजों पर नीम की डाली लगाने से लेकर चौखट में कील लगाने तक की परंपराएं ग्रामीण लोकजीवन का हिस्सा रही हैं।

सरकारी योजनाओं से आर्थिक मजबूती, हरेली से सांस्कृतिक मजबूती!

एक ओर सरकार किसानों की आय और आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए धान खरीदी, बोनस और समर्थन मूल्य जैसे फैसलों को अपनी प्राथमिकता बता रही है, तो दूसरी ओर हरेली जैसा पर्व छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन की उस जड़ से जोड़ता है जहां किसान अपने खेत, औजार, पशुधन और प्रकृति को एक साथ पूजता है।

यही छत्तीसगढ़ की असली तस्वीर है—एक हाथ में खेती का औजार, दूसरे हाथ में परंपरा की मशाल।

सरकार की किसान हितैषी नीतियों और ग्रामीण संस्कृति के संरक्षण के बीच यदि यह संतुलन कायम रहता है, तो हरेली केवल कैलेंडर में दर्ज एक त्योहार नहीं रहेगा, बल्कि यह हर साल प्रदेश के खेतों में नई उम्मीद, गांवों में नया उत्साह और किसानों के मन में नए विश्वास का संदेश लेकर आएगा।

क्योंकि जब खेत हरे होते हैं, तो सिर्फ फसल नहीं मुस्कुराती—पूरा गांव मुस्कुराता है।

और जब अन्नदाता के चेहरे पर संतोष आता है, तो उसकी चमक पूरे छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था और संस्कृति में दिखाई देती है।

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