September 17, 2026 11:22 pm

“कौवाझर विकलांग विधवा के खिलाफ ग्राम पंचायत का फरमान: सरपंच ने बंद करवा दिया ‘हुक्का-पानी’, मजदूर पर जुर्माना – गांव में डर का माहौल!”

“कौवाझर विकलांग विधवा के खिलाफ ग्राम पंचायत का फरमान: सरपंच ने बंद करवा दिया ‘हुक्का-पानी’, मजदूर पर जुर्माना – गांव में डर का माहौल!”

Mahasamund /गांव कौंवाझर की गलियों में इन दिनों एक विचित्र ‘फरमान’ चर्चा का विषय बना हुआ है — जहां सरपंच और उनके दबंगों ने एक विधवा विकलांग और उसके विकलांग बेटे का ‘हुक्का-पानी’ बंद करवा दिया है। न केवल इतना, बल्कि किसी भी ग्रामीण या मजदूर को उसके घर काम करने जाने पर 10,000 रुपये जुर्माने का आदेश सुनाया गया है। यह घटना न केवल ग्राम पंचायत व्यवस्था पर सवाल उठाती है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाली है।

गांव की रहने वाली निर्मला बाई चंद्राकर, पति स्व. चोवालाल चंद्राकर, वार्ड नं. 02, विकलांग महिला हैं। वह अपने विकलांग पुत्र तोषण कुमार के साथ तालाब किनारे के एक पुराने मकान में रह रही हैं। लेकिन अब वही तालाब, जो उनके परिवार की जीवनरेखा था, विवाद का केंद्र बन गया है।

तालाब बना ‘तनाव का ताल’ — तीन महीनों से सूख गया नल का भरोसा!

निर्मला बाई बताती हैं कि तीन महीनों से उनके वार्ड के सार्वजनिक बोरवेल की मोटर सरपंच गेंदराम जांगड़े द्वारा निकाल ली गई है। नतीजतन, उन्हें तालाब के दूषित पानी से निस्तारी करनी पड़ रही है।
“मैं विकलांग हूं, बेटा भी विकलांग है… दिनभर एक बाल्टी पानी के लिए संघर्ष करना पड़ता है,” निर्मला बाई की आंखें नम हो उठती हैं। कई बार शिकायतें दीं, पर किसी ने नहीं सुनीं। “गांव के लोग कहते हैं — ‘सरपंच का आदेश है, पानी नहीं देना।’”

तालाब, जो कभी जीवन का प्रतीक था, अब उसी परिवार के लिए पीड़ा का पर्याय बन गया है।

भूमि और तालाब का विवाद — जब अपनापन बना अभिशाप!
कौंवाझर का तालाब सदियों पुराना है। गांव के लोग इसे अपनी ‘धरोहर’ मानते हैं। लेकिन इसी धरोहर की जमीन अब विवादों में है।निर्मला बाई और उनके पुत्र के नाम पर क्रमशः खसरा नंबर 267/1 (0.064 हेक्टेयर) और खसरा नंबर 262 (0.41 हेक्टेयर) की जमीन दर्ज है। यह तालाब के पार (रोड) पर स्थित है — यानी, वही रास्ता जिससे गांव का आवागमन होता है।

तालाब की मुख्य जमीन खसरा नंबर 264/1 (3.05 हेक्टेयर) उनके भाई दम्मन लाल के नाम पर है, जिनका मानसिक संतुलन ठीक नहीं है। उन्होंने अपने जीवनकाल में ही निर्मला बाई के पति को ‘मुख्तियारनामा’ देकर देखरेख का अधिकार सौंपा था। पति के निधन के बाद अब निर्मला बाई खुद देखरेख कर रही हैं।

“पहले तो सब ठीक था,” वह कहती हैं, “पर जबसे मैंने तालाब और रास्ते की सफाई शुरू की, सरपंच और कुछ लोग कहने लगे कि यह जमीन ‘शासकीय’ होनी चाहिए। बस, यहीं से दुश्मनी शुरू हो गई।”

‘ग्राम स्वराज’ योजना में दी थी जमीन — पर अब वही बन गई साजिश की जड़!

निर्मला बाई का दावा है कि पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की “ग्राम स्वराज” योजना के दौरान उन्होंने अपनी तालाब किनारे की जमीन गांव को रोड के लिए देने का निर्णय लिया था। इसके बदले में उन्होंने पास की ‘घास भूमि’ मांग की थी, लेकिन कुछ प्रभावशाली ग्रामीणों ने इस पर रोक लगा दी।अब वही जमीन पंचायत की बैठक में “शासकीय भूमि” घोषित करने की कोशिश की जा रही है — जबकि वह आज भी निजी नाम पर दर्ज है।

गुप्त पंचायत और दबंगों की बैठक — बिना बुलाए सुना ‘फरमान’!

14 अक्टूबर को कलेक्टर जनदर्शन में आवेदन दिया गया और 16 अक्टूबर को ‘उक्त नवभारत’ समाचार पत्र में भूमि संबंधी विवाद प्रकाशित हुआ। इसके बाद कोतवाल के माध्यम से पूरे गांव में मीटिंग का ऐलान किया गया।

निर्मला बाई बताती हैं —
“मैं विकलांग हूं, चल नहीं सकती। इसलिए मीटिंग में नहीं जा पाई। अगले दिन ड्राइवर ने बताया कि मीटिंग में फैसला हुआ — ‘निर्मला बाई का हुक्का पानी बंद! जो भी उसके घर काम करेगा, उस पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगेगा!’”

इतना ही नहीं — जिन्होंने बैठक में विरोध किया, उनके खिलाफ 50,000 रुपये का दंड तय किया गया। सरपंच के ‘सिपाहियों’ को आदेश दिया गया कि जो मजदूर काम करने जाए, उसकी सूचना सरपंच को दे तो उसे 500 रुपये इनाम मिलेगा।

“यह कैसा न्याय है?” वह सवाल करती हैं —
“गांव में अब कोई मुझसे बात नहीं करता, कोई मेरे घर नहीं आता। जैसे मैं अपराधी हूं!”

“हुक्का-पानी बंद” — एक पुरानी सजा, नए दौर का उत्पीड़न!

गांवों में ‘’हुक्का-पानी बंद करना कभी सामाजिक बहिष्कार का प्रतीक हुआ करता था। पर 2025 में किसी विकलांग महिला पर ऐसा फरमान लागू होना मानवता पर प्रश्नचिन्ह है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि गांव का माहौल तनावपूर्ण है। कोई खुलकर बोलने को तैयार नहीं, क्योंकि “सरपंच से टकराना” खुद पर आफत बुलाने जैसा माना जा रहा है।वही कमल नारायण वैष्णव और उसकी पत्नी लता वैष्णव जो दोनों विकलांग है उसी वार्ड में रहते है बोर का मोटर निकलने से उनको जैसे तैसे तालाब का पानी लाकर उबालकर पीने को मजबूर है।

निर्मला बाई की गुहार कलेक्टर दरबार में – “अब आप ही हमारी सुनवाई करें!”

निर्मला बाई ने महासमुंद कलेक्टर को पत्र लिखकर सरपंच गेंदराम जांगड़े और उनके साथियों पर कार्रवाई की मांग की है। पत्र में उन्होंने स्पष्ट उल्लेख किया है कि —

“यदि मेरे या मेरे परिवार को कोई हानि होती है, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी सरपंच एवं सहयोगियों की होगी।”

निर्मला बाई की मांग है —
1.सरपंच द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न पर कठोर प्रशासनिक कार्रवाई हो।
2. गांव में शांति बहाल कर, सार्वजनिक बोरवेल की मोटर तुरंत लगाई जाए।
3. विकलांग व्यक्ति होने के नाते, उनके परिवार को सुरक्षा और सहयोग प्रदान किया जाए।

जब सत्ता संवेदना को कुचल दे...

महासमुंद जिले का यह मामला प्रशासनिक निष्क्रियता और ग्राम स्तर की सत्ता के दुरुपयोग की एक भयावह तस्वीर पेश करता है।एक विकलांग विधवा, जो कभी अपने पति के साथ तालाब की देखरेख करती थी, आज उसी तालाब से वंचित कर दी गई है।

गांव में सूरज डूबने से पहले ही उसके घर के आसपास सन्नाटा छा जाता है। हवा में अब ‘पानी की किल्लत’ से ज्यादा ‘डर की गंध’ तैरती है।

क्या प्रशासन उसकी पुकार सुनेगा?
क्या “ग्राम स्वराज” की भावना इस भय और बहिष्कार से ऊपर उठ पाएगी?कौंवाझर की मिट्टी अब जवाब मांग रही है — आखिर इंसानियत कब लौटेगी?

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