March 1, 2026 2:44 pm

स्वास्थ्य विभाग में नियमों की खुलेआम हत्या! फर्जी हस्ताक्षर, कूट रचित आदेश और करोड़ों के घोटाले,,

“स्वास्थ्य विभाग में नियमों की खुलेआम हत्या! फर्जी हस्ताक्षर, कूट रचित आदेश और करोड़ों के घोटाले—CMHO बिलासपुर के संरक्षण में बेलगाम अफसरशाही?”

Bilaspur/छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग में शासन के नियम-कायदों की जो तस्वीर सामने आ रही है, वह न सिर्फ चौंकाने वाली है बल्कि प्रशासनिक ईमानदारी पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। आरोप है कि बिलासपुर जिले में स्वास्थ्य विभाग के भीतर नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और यह सब कुछ मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) बिलासपुर के संरक्षण में फल-फूल रहा है। विभाग के ही एक अधिकारी, डॉ. हंसराज, पर लगातार ऐसे कृत्य करने के आरोप लग रहे हैं जो सीधे-सीधे शासन के आदेशों और सिविल सेवा आचरण नियमों का उल्लंघन बताए जा रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार, डॉ. हंसराज, जो वर्तमान में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गनियारी में प्रभारी चिकित्सक हैं, अपने पद के अनुरूप दायित्वों के निर्वहन में पहले भी असफल माने जाते रहे हैं। आरोप है कि खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान भी उनके विरुद्ध फर्जी हस्ताक्षर किए जाने की शिकायतें जिला स्तर पर दर्ज कराई गई थीं। चौंकाने वाली बात यह है कि उस समय भी ठोस कार्रवाई के बजाय मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और आज तक वह जांच लंबित बताई जाती है।

फर्जी पद-सील और हस्ताक्षर से जारी आदेश!

मामला यहीं नहीं थमता। ताजा आरोपों के अनुसार, डॉ. हंसराज द्वारा डॉ. उमेश कुमार साहू, खंड चिकित्सा अधिकारी, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तखतपुर (जिला बिलासपुर) के नाम और पद-सील का दुरुपयोग करते हुए चिकित्सकों के प्रशिक्षण से संबंधित आदेश जारी किए गए। हैरानी की बात यह है कि यह आदेश बाकायदा कार्यालय के जावक क्रमांक के साथ प्रसारित भी किया गया, जिससे इसकी प्रामाणिकता पर प्रथम दृष्टया किसी को संदेह न हो।

यदि आरोप सही हैं, तो यह न केवल प्रशासनिक अनुशासन का मज़ाक है बल्कि एक संगठित तरीके से दस्तावेजों की कूट रचना (Forgery) का गंभीर मामला बनता है। जानकारों का कहना है कि इस प्रकार का कृत्य शासन को गुमराह करने के साथ-साथ पूरे स्वास्थ्य तंत्र की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाता है।

शासन के आदेशों की सीधी अवहेलना!

बताया जा रहा है कि डॉ. हंसराज द्वारा किया गया यह कृत्य मध्यप्रदेश/छत्तीसगढ़ शासन सामान्य प्रशासन विभाग के आदेश क्रमांक एफ-11/18/98/9/एक, दिनांक 03/02/1999 तथा सिविल सेवा आचरण नियम 1965 के नियम 12(क) का स्पष्ट उल्लंघन है। नियमों के अनुसार, कोई भी अधिकारी अपने से वरिष्ठ या समकक्ष अधिकारी की पद-सील और हस्ताक्षर का उपयोग नहीं कर सकता, न ही ऐसे आदेश जारी कर सकता है जिनका उसे वैधानिक अधिकार न हो।

कूट रचित पत्रों की फैक्ट्री?

सूत्रों का यह भी आरोप है कि यह फर्जी एवं कूट रचित पत्र CHC में पदस्थ प्रभा पटेल, ब्लॉक डाटा मैनेजर (संविदा, NHM) द्वारा तैयार किया गया, जिसमें उनके द्वारा प्रथमाक्षर (इनिशियल) भी किया गया है। इससे पहले भी कथित तौर पर खंड चिकित्सा अधिकारी के फर्जी हस्ताक्षर कर 30 से 35 पत्र जारी किए जा चुके हैं, जिनकी जांच CMHO कार्यालय में लंबित बताई जाती है।

घोटालों की परतें और संरक्षण का आरोप!

स्वास्थ्य विभाग से जुड़े जानकारों का दावा है कि यह कोई एक-दो मामलों की कहानी नहीं है। सभी विकासखंडों के CHC और PHC में संचालित जीवनदीप समितियों (JDS) में अवैध रूप से अध्यक्ष/सचिव बनकर करोड़ों रुपये के घोटाले किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। स्थानीय निधि संपरीक्षा, छत्तीसगढ़ द्वारा किए गए ऑडिट में संबंधित अधिकारियों से वसूली कर JDS खातों में जमा कराने और उनके विरुद्ध विभागीय जांच के स्पष्ट निर्देश दिए गए थे।

लेकिन आरोप है कि CMHO बिलासपुर द्वारा ऐसे BMO एवं अन्य अधिकारियों को संरक्षण देते हुए न तो आज तक वसूली कराई गई और न ही किसी ठोस विभागीय जांच को अंजाम तक पहुंचाया गया। कार्रवाई तो दूर, गंभीर आरोपों के बावजूद संबंधित अधिकारियों को उनके पद से हटाया तक नहीं गया।

प्रशासनिक चुप्पी पर सवाल!

सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब बार-बार शिकायतें, ऑडिट रिपोर्ट और शासन के निर्देश मौजूद हैं, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? क्या स्वास्थ्य विभाग के भीतर एक ऐसा अदृश्य कवच तैयार हो चुका है, जिसके चलते नियमों को ताक पर रखकर कुछ अधिकारी बेखौफ काम कर रहे हैं?

जनहित और शासन से मांग!

यह पूरा मामला अब केवल विभागीय अनियमितता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जनहित से सीधे जुड़ गया है। आम जनता और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों की मांग है कि पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय, निष्पक्ष जांच कराई जाए, लंबित मामलों को तत्काल खोला जाए और यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए—चाहे वे किसी भी पद पर क्यों न हों।

क्योंकि यदि शासन के नियमों की हत्या इसी तरह होती रही, तो सवाल सिर्फ अधिकारियों की जवाबदेही का नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की साख का होगा।

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