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August 29, 2025 5:22 pm

“सुकमा की रक्तरंजित रात: नक्सलियों ने घर से खींचकर अस्थायी शिक्षक की हत्या की, छह महीने पहले भाई को भी बनाया था निशाना”

“सुकमा की रक्तरंजित रात: नक्सलियों ने घर से खींचकर अस्थायी शिक्षक की हत्या की, छह महीने पहले भाई को भी बनाया था निशाना”

Baster/छत्तीसगढ़ का सुकमा ज़िला एक बार फिर खून से रंग गया। बुधवार की शाम सात बजे, जंगलों की खामोशी को गोलियों और चीखों ने चीर दिया। सुकमा के सिलगेर गांव में नक्सलियों ने एक अस्थायी शिक्षक – लक्ष्मण बरसे – को उसके ही घर से घसीटकर बाहर निकाला और मौत के घाट उतार दिया। महज़ तीन किलोमीटर दूर पुलिस कैंप खामोश तमाशबीन बना रहा और गांव के लोग दहशत में पथराई आंखों से यह विभत्स दृश्य देखते रह गए।

शिक्षादूत बना शिकार, खून से रंगी किताबें!
राज्य में अस्थायी शिक्षकों को “शिक्षादूत” कहा जाता है। इन्हीं शिक्षादूतों पर नक्सलियों का शक सबसे ज्यादा है। उन्हें लगता है कि ये ग्रामीण समाज और पुलिस के बीच पुल का काम करते हैं और जानकारी लीक करते हैं। लक्ष्मण बरसे भी ऐसा ही एक शिक्षादूत था। बीते दस–बारह सालों से वह बच्चों को पढ़ा रहा था, लेकिन बुधवार की शाम उसका नाम मौत की लिस्ट में दर्ज हो चुका था।

सूत्रों के माने तो गांव के एक चश्मदीद ने बताया – “करीब कुछ हथियारबंद नक्सली आए। उन्होंने लक्ष्मण को घर से बाहर घसीटा। लाठियों और कुल्हाड़ियों से बेरहमी से पीटा। उसकी पत्नी चीखी-चिल्लाई, रोकने की कोशिश की, लेकिन उसे बाल पकड़कर दूर धकेल दिया गया। मौत से पहले न तो कोई जन अदालत लगी, न कोई चेतावनी दी गई।”

छह महीने पहले भाई की भी हत्या!
यह पहली बार नहीं था जब बरसे परिवार को नक्सली आतंक ने छुआ हो। महज़ छह महीने पहले, लक्ष्मण के भाई को भी माओवादी शक के आधार पर मौत के घाट उतार चुके थे। गांववालों का कहना है कि लक्ष्मण को अंदेशा था कि अगला नंबर उसी का होगा। हाल ही में उसने एक परिचित से कहा था – “नक्सली अब शिक्षकों को निशाना बना रहे हैं, मुझे डर है कि वे मुझे भी नहीं छोड़ेंगे।”उसकी आशंका बुधवार को भयावह सच बन गई।

पीछे छूट गई टूटी ज़िंदगी !
लक्ष्मण अपनी पत्नी और दो मासूम बच्चों को छोड़ गया है। एक बच्चा मात्र छह महीने का और दूसरा तीन साल का। जिस घर में बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, वहां अब सिर्फ मातम और रोने की आवाज़ है। पत्नी बेसुध होकर बार-बार यही कहती रही – “हमारा क्या कसूर था? हमने सिर्फ पढ़ाया है, किताबें बांटी हैं… पुलिस की मुखबिरी का इल्ज़ाम क्यों?”

पुलिस मुखबिरी का शक या आतंक का बहाना?
अधिकारियों के अनुसार नक्सलियों को शक था कि लक्ष्मण सिलगेर पुलिस कैंप को जानकारी पहुंचाता है। पर सवाल यह है कि जब पुलिस कैंप तीन किलोमीटर दूर था, तब 20 नक्सली गांव में घुसकर हत्या कर जाते हैं और पुलिस को भनक तक क्यों नहीं लगती?
सच यही है कि शिक्षादूतों पर पुलिस मुखबिरी का ठप्पा नक्सलियों का पुराना हथकंडा है। असल में, ये वही लोग हैं जो गांवों में बच्चों को पढ़ाते हैं, शिक्षा का उजाला फैलाते हैं और नक्सलियों की अंधेरी विचारधारा को चुनौती देते हैं।

खून से सनी शिक्षादूत पहल!
राज्य सरकार ने बस्तर के दुर्गम इलाकों में शिक्षा की रोशनी फैलाने के लिए शिक्षादूत योजना शुरू की थी। 12वीं पास ग्रामीणों को 12,000 रुपये प्रतिमाह पर शिक्षक बनाया गया। लेकिन आज यह पहल खून में डूबी हुई है।

•19 फरवरी को दंतेवाड़ा में एक शिक्षादूत समेत दो लोगों की हत्या।

•14 जुलाई को बीजापुर के फरसेगढ़ इलाके में दो शिक्षादूतों की हत्या।

•सितंबर 2024 में सुकमा के गोंडपल्ली गांव में अर्जुन डोडी नामक शिक्षादूत की गला घोंटकर हत्या।

•और अब, सिलगेर में लक्ष्मण बरसे की निर्मम मौत।

पिछले एक साल में पांच शिक्षादूतों की हत्या हो चुकी है। यह आंकड़ा बताता है कि नक्सलियों के निशाने पर अब सिर्फ सुरक्षा बल ही नहीं, बल्कि समाज की रोशनी भी है।

सवालों के घेरे में सरकार और सुरक्षा तंत्र!
घटना स्थल से महज़ तीन किलोमीटर दूर पुलिस कैंप होने के बावजूद नक्सलियों ने बेखौफ होकर हमला किया। यह सुरक्षा व्यवस्था की नाकामी का सबसे बड़ा सबूत है। आखिर कब तक बस्तर के मासूम शिक्षक और ग्रामीण नक्सली संदेह के नाम पर मारे जाते रहेंगे?
ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा है – “अगर पुलिस और सरकार हमें बचा नहीं सकती तो यह कैंप किस काम का?”

खामोश होती आवाज़ें, डरता समाज!
सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर जैसे जिलों में लोग अब धीरे-धीरे खामोश हो रहे हैं। कोई पुलिस का साथ देने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। शिक्षक, सरपंच, यहां तक कि सामान्य ग्रामीण भी अब डर की छाया में जी रहे हैं। शिक्षादूत, जिन्हें शिक्षा की मशाल कहा गया था, अब मौत की सूची में शामिल हो रहे हैं।

अंतहीन लड़ाई !
लक्ष्मण बरसे की मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है – आखिर इस लड़ाई का अंत कब होगा? सरकार कहती है कि विकास और शिक्षा से नक्सलवाद खत्म होगा, लेकिन जब शिक्षा देने वाला ही मारा जा रहा हो तो बच्चों के भविष्य का क्या होगा?

सुकमा की यह घटना सिर्फ एक शिक्षक की हत्या नहीं है, यह शिक्षा की हत्या है। यह मासूम बच्चों के सपनों की हत्या है। यह उस विश्वास की हत्या है, जो सरकार ने शिक्षादूत योजना के नाम पर गांववालों को दिया था।
लक्ष्मण बरसे की खून से सनी किताबें हमें यही याद दिलाती हैं – जब तक शिक्षा पर कुल्हाड़ी चलेगी, तब तक समाज अंधेरे से बाहर नहीं निकल पाएगा।

सवाल आज भी वही है:
क्या कल कोई और शिक्षादूत किताब थामेगा, या फिर मौत का डर ही गांव के बच्चों की तक़दीर लिखेगा?

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