“सरकारी ज़मीन पर ‘दादागिरी का किला’:जल संसाधन विभाग की नाक के नीचे रिटायर्ड पटवारी का अवैध साम्राज्य, प्रशासन बेबस—क्या है अदृश्य राजनीतिक कवच?”
Mahasamund / महासमुंद जिले के बागबाहरा विकासखंड से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था, कानून के राज और सरकारी तंत्र की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जल संसाधन उप संभाग क्रमांक–2, बागबाहरा के कार्यालय की जमीन—जो स्पष्ट रूप से विभागीय स्वामित्व की भूमि है—आज खुलेआम अवैध कब्जे का शिकार बनी हुई है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह कब्जा किसी बाहरी भू-माफिया ने नहीं, बल्कि स्वयं विभाग के रिटायर्ड विभागीय पटवारी नोहरलाल साहू द्वारा किया गया है।
सूत्रों के अनुसार, कार्यालय की जमीन के पीछे नोहरलाल साहू ने पहले अस्थाई प्रोफाइल सेट डब्बा खड़ा किया और फिर धीरे-धीरे उसे अंदर से पक्का निर्माण में तब्दील कर दिया। आज स्थिति यह है कि वहां हर प्रकार की सुख-सुविधाओं से युक्त एक स्थाई अवैध निर्माण खड़ा हो चुका है। बिजली, पानी, रहन-सहन—सब कुछ ऐसे, मानो यह भूमि निजी हो, जबकि कागजों में यह पूरी तरह सरकारी संपत्ति है।
दादागिरी या सत्ता का संरक्षण?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब यह अवैध कब्जा विभाग की “नाक के नीचे” हुआ, तब जल संसाधन विभाग, राजस्व विभाग और नगरपालिका आखिर कर क्या रही थी? क्या किसी को यह दिखा नहीं, या सब कुछ दिखते हुए भी आंखें मूंद ली गईं?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि नोहरलाल साहू की दादागिरी इतनी अधिक है कि कोई भी अधिकारी या कर्मचारी उसके खिलाफ खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। वर्षों से यह अवैध कब्जा जस का ये बना हुआ है, और तो और बिजली कनेक्शन, AC और लगाया गया है बोर भी कर लिया गया है बोर किसकी अनुमति से कराया गया है यह भी सोचने का विषय है लेकिन आज तक न तो कोई प्रभावी कार्रवाई हुई, न ही कब्जा हटाया जा सका।
नगरपालिका की कागजी कार्रवाई—जमीन पर शून्य असर!
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार नगरपालिका बागबाहरा के CMO द्वारा केवल कागजों में नोटिस जारी किए गए हैं। नोटिस देने की औपचारिकता तो निभाई गई, लेकिन ज़मीन पर कार्रवाई शून्य रही। ना बुलडोजर चला, ना निर्माण तोड़ा गया, और ना ही कब्जेदार को हटाया गया।
यही वजह है कि अब आम जनता के बीच यह चर्चा ज़ोर पकड़ रही है कि क्या नगरपालिका बागबाहरा इस अवैध कब्जे को हटाने में असमर्थ है, या फिर किसी दबाव के चलते जानबूझकर मौन साधे हुए है?
राजस्व विभाग और जल संसाधन विभाग की चुप्पी!
जिस जमीन पर कब्जा हुआ, वह जल संसाधन विभाग की है। ऐसे में विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती है कि वे तत्काल एफ.आई.आर. दर्ज कराएं, सीमांकन कराएं और कब्जा हटवाएं। लेकिन यहां तो हालात उलटे हैं—ना कोई ठोस पहल, ना कोई सख्त आदेश।
राजस्व विभाग, जिसकी भूमिका सरकारी जमीन की रक्षा करने की होती है, वह भी इस पूरे मामले में रहस्यमय चुप्पी साधे हुए है।
•क्या विभागीय मिलीभगत है, या फिर डर और दबाव का खेल?
•क्या नोहरलाल साहू को मिला है राजनीतिक अदृश्य कवच?
•सबसे तीखा और संवेदनशील सवाल यही है—क्या नोहरलाल साहू को कोई राजनीतिक अदृश्य कवच प्राप्त है?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सामान्य व्यक्ति यदि एक ईंट भी सरकारी जमीन पर रख दे, तो उसके खिलाफ तुरंत कार्रवाई हो जाती है। लेकिन यहां तो पूरा पक्का निर्माण खड़ा हो गया, फिर भी प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है।
•क्या यह वही छत्तीसगढ़ है, जहां “सुशासन” और “जीरो टॉलरेंस” की बात की जाती है?
•या फिर कानून केवल कमजोरों के लिए है और ताकतवरों के सामने बौना साबित हो जाता है?
जनता में आक्रोश, विश्वास डगमगाया!
इस मामले ने बागबाहरा क्षेत्र में जनता के बीच गहरा आक्रोश पैदा कर दिया है। लोग सवाल कर रहे हैं कि जब सरकारी जमीन ही सुरक्षित नहीं, तो आम आदमी की संपत्ति कैसे सुरक्षित रहेगी? अगर एक रिटायर्ड पटवारी सरकारी जमीन पर कब्जा कर सकता है और प्रशासन उसे हटा नहीं पा रहा, तो यह कानून व्यवस्था पर सीधा तमाचा है।
अब देखते है आगे जिला प्रशासन क्या संज्ञान लेता है?
•अब निगाहें जिला प्रशासन, कलेक्टर और उच्च स्तरीय अधिकारियों पर टिकी हैं। क्या इस मामले में निष्पक्ष जांच होगी?
•क्या अवैध कब्जा हटाया जाएगा?
•क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी?
•या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
बागबाहरा की यह घटना सिर्फ एक अवैध कब्जे की कहानी नहीं, बल्कि यह उस सिस्टम की पोल खोलती है, जहां प्रभाव, पहचान और राजनीतिक संरक्षण कानून से ऊपर नजर आता है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस चुनौती को स्वीकार करता है या फिर यह “दादागिरी का किला” यूं ही सरकारी जमीन पर खड़ा रहता है।
जनता जवाब चाहती है… और जवाब अब टालना आसान नहीं।













