वेतनवृद्धि की जंग: रायपुर से महासमुंद तक छाई काली लहर!”काली पट्टी से शुरु हुआ सन्नाटा… अब हड़ताल की दस्तक!
Raipur/प्रदेश में जिला सहकारी बैंक कर्मचारियों की पाँच वर्षों की पीड़ा फूटी सहकारिता व्यवस्था के इतिहास में बुधवार का दिन एक नए संघर्ष की पटकथा लेकर आया। जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक रायपुर के सैकड़ों कर्मचारी, वर्षों से लंबित वेतनवृद्धि की मांग को लेकर, आखिरकार मैदान में उतर आए। एक सधी लेकिन ज्वलंत शुरुआत — हाथों में काली पट्टियाँ, चेहरों पर खामोश नाराजगी, और दिलों में निष्पक्ष न्याय की उम्मीद। यही दृश्य रहा रायपुर से लेकर महासमुंद, धमतरी,बलौदाबाजार-भाटापारा, गरियाबंद औरसारंगढ़-बिलाईगढ़ तक।सटीक आंकड़ों में देखें तो कुल 73 शाखाओं और मुख्यालय के लगभग 750 कर्मचारी एक साथ इस विरोध में शामिल हुए। यह केवल वेतन का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की लड़ाई है, ऐसा कहना है बैंक कर्मचारी संघ रायपुर के पदाधिकारियों का। उन्होंने बताया कि वर्ष 2021 से स्थगित वार्षिक वेतनवृद्धि अब कर्मचारियों के गले की फांस बन चुकी है। उच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्णय आदेश के बावजूद — न बैंक प्रबंधन ने कदम उठाया, न सहकारिता पंजीयक ने आदेश लागू किए।
संघर्ष की जड़ें और तकरार की तहें !
जानकारी के अनुसार जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक रायपुर के सेवायुक्तों को हर वर्ष 1अप्रैल से वार्षिक वेतनवृद्धि दी जाती थी। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही थी, तब तक जब तक वर्ष 2021 नहीं आया। उस वर्ष पवननाथ कमेटी की सिफारिशों का हवाला देते हुए सहकारिता विभाग ने रायपुर बैंक के लिए एक अलग आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया कि बैंक के कर्मचारियों की वेतनवृद्धि अब रोक दी जाएगी। यही वह क्षण था जब असंतोष की चिंगारी सुलगी और धीरे-धीरे इसने आंदोलन का रूप ले लिया।कर्मचारी संघ का आरोप है कि यह आदेश न केवल पक्षपातपूर्ण है बल्कि प्रदेश के अन्य जिला सहकारी बैंकों और अपेक्स बैंक के लिए बने नियमों से एकदम भिन्न भी है। कर्मचारी इसे अपने मूलभूत अधिकारों पर कुठाराघात मानते हैं। संघ ने कई बार शासन-प्रशासन से मुलाकातें कीं, ज्ञापन सौंपे, बैठकों में बात रखने की कोशिश की लेकिन हर प्रयास निरर्थक रहा। अब जब अदालत का स्पष्ट आदेश भी लागू नहीं किया गया, तो कर्मचारियों का सब्र जवाब दे गया।
काली पट्टी से शुरु हुई नई कहानी!
29 अक्टूबर को जब सारा प्रदेश रोजमर्रा की भागदौड़ में डूबा था, उसी वक्त बैंक शाखाओं के भीतर एक अलग ही दृश्य था। हर कर्मचारी ने काली पट्टी बांध रखी थी। काली पट्टी — मौन क्रांति का प्रतीक बन गई थी। नारे नहीं, हंगामा नहीं, पर हर चेहरे से साफ झलकता था कि वे अब पीछे हटने वाले नहीं हैं। यह आंदोलन का पहला चरण था, लेकिन इसकी गूंज पूरे जिले में सुनाई दे रही है।कर्मचारियों ने कहा कि यदि 5 नवंबर तक उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो 6 नवंबर को वे एक दिवसीय सामूहिक अवकाश पर चले जाएंगे। वह दिन बैंकिंग सेवाओं के लिए पूर्णतः ठहराव का दिन होगा। और यदि तब भी समाधान नहीं हुआ तो 12 नवंबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल की शुरुआत होगी। इस स्थिति में न केवल बैंक शाखाएँ बल्कि सभी एटीएम भी बंद रहेंगे।
सहकारिता बैंक सेवाओं पर भारी असर!
यदि आंदोलन अपने अगले चरण में पहुंचा, तो इसका असर सीधा किसानों पर पड़ेगा। क्योंकि 15 नवंबर से छत्तीसगढ़ सरकार की सबसे बड़ी महत्वकांक्षी योजना धान खरीदी शुरू होने वाली है जिससे सहकारिता बैंक का सबसे बड़ा योगदान है क्योंकि छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों से ज्यादातर खातेदार सहकारिता बैंक में है जिससे बैंक के माध्यम से संचालित समस्त शासकीय योजनाएँ ठप हो जाएंगी। सबसे अधिक संकट धान खरीदी पर मंडरा रहा है। छत्तीसगढ़ की इस महत्वकांक्षी योजना का संचालन ज्यादातर जिला सहकारी बैंकों के माध्यम से होता है। बैंक कर्मियों का कहना है कि आंदोलन जारी रहा तो धान खरीदी पर सीधा असर पड़ेगा और इसका दुष्परिणाम किसानों को भुगतना पड़ेगा। इस आशंका से शासन भी चिंतित है, परंतु अब तक किसी उच्च अधिकारी ने औपचारिक बातचीत की पहल नहीं की है।
छत्तीसगढ़ के हर जिले में गूंजता असंतोष!
रायपुर, महासमुंद, धमतरी, बलौदाबाजार-भाटापारा, गरियाबंद, सारंगढ़-बिलाईगढ़ तक कर्मचारियों का संदेश एक ही है — “हम न्याय चाहते हैं।” महासमुंद शाखा में कर्मचारियों ने कहा कि जब समान कार्य के लिए अन्य बैंकों में वेतनवृद्धि दी जा रही है, तो रायपुर बैंक के कर्मचारियों से भेदभाव क्यों? वहीं धमतरी जिले में काली पट्टी लगाए हुए कर्मचारियों ने पोस्टर पर लिखा — “हमारी मेहनत की कीमत कब मिलेगी?”यह नारा सोशल मीडिया पर भी ट्रेंड करने लगा है। युवक मंडल और सहकारिता विद्यार्थियों ने इसको समर्थन देते हुए लिखा है कि यह सिर्फ कर्मचारियों की नहीं, बल्कि न्याय की जंग है।
संघ का आरोप और प्रशासन की चुप्पी!
कर्मचारी संघ ने बैंक प्रबंधन और सहकारिता पंजीयक पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि अदालत के आदेशों को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है। पांच वर्षों तक वेतनवृद्धि नहीं देना किसी भी श्रमिक के मनोबल पर गहरा प्रभाव डालता है। दूसरी ओर, बैंक प्रबंधन अभी भी खामोशी साधे बैठा है। कहा जा रहा है कि शासन स्तर पर इस विषय पर विचार चल रहा है, लेकिन कर्मचारियों को केवल “प्रतीक्षा” का जवाब मिल रहा है।
छत्तीसगढ़ में आने वाले दिनों की तस्वीर!
यदि हालात ऐसे ही बने रहे तो आने वाला सप्ताह छत्तीसगढ़ के बैंकिंग सिस्टम के लिए बेहद कठिन हो सकता है। धान खरीदी का सीजन सिर पर है, ग्रामीण ग्राहकों की लंबी कतारें रोजाना बैंक शाखाओं के बाहर लगी होती हैं। ऐसे में यदि शाखाएँ बंद हुईं, तो किसानों को न केवल भुगतान में विलंब का सामना करना पड़ेगा बल्कि मंडियों के संचालन में भी भारी दिक्कतें आएंगी।विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और बैंक प्रबंधन को जल्द समाधान निकालना चाहिए। यदि यह आंदोलन लंबा चला, तो न केवल कर्मचारियों का आर्थिक नुकसान होगा, बल्कि प्रशासनिक प्रणाली पर भी सीधा दबाव बढ़ेगा।
सन्नाटा जो चेतावनी बन गया काली पट्टी!
अब केवल प्रतीक नहीं, बल्कि चेतावनी बन चुकी है। यह बताती है कि खामोशी भी कभी-कभी चीख बन जाती है। वेतनवृद्धि की यह जंग आने वाले दिनों में एक व्यापक मुद्दा बनने की ओर बढ़ रही है। चाहे शासन कितना भी टालमटोल करे, कर्मचारियों की मांगें अब सड़कों से फाइलों तक गूंजने लगी हैं।रायपुर से लेकर हर शाखा तक यह संघर्ष अब सिर्फ वेतन का नहीं, सम्मान का सवाल बन चुका है। और जब सम्मान की बात आती है, तो संघर्ष की आंच कभी ठंडी नहीं पड़ती।













