March 1, 2026 6:04 pm

माँ शाकंभरी के आदर्शों पर चलना ही सच्ची श्रद्धा : केशव नायकराम चंद्राकर !

प्रकृति, अन्न और जीवन की अधिष्ठात्री माँ शाकंभरी के चरणों में नतमस्तक कस्तुरबोड—श्रद्धा, आस्था और सामाजिक एकता का विराट संगम”!

माँ शाकंभरी के आदर्शों पर चलना ही सच्ची श्रद्धा : केशव नायकराम चंद्राकर !

Bagbahara/खल्लारी विधानसभा क्षेत्र खल्लारी क्षेत्र के ग्राम कस्तुरबोड में उस समय आस्था, उल्लास और भक्ति का अनुपम दृश्य देखने को मिला, जब मरार पटेल समाज द्वारा समाज की आराध्य देवी माँ शाकंभरी के पावन शाकंभरी महोत्सव का भव्य एवं गरिमामय आयोजन किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार, शंखनाद और दीप प्रज्वलन के साथ जैसे ही माँ शाकंभरी की विधिवत पूजा-अर्चना प्रारंभ हुई, पूरा ग्राम भक्तिरस में डूब गया। चारों ओर “जय माँ शाकंभरी” के जयघोष गूंज उठे और वातावरण श्रद्धा से सराबोर हो गया।

माँ शाकंभरी—जो प्रकृति, अन्न और जीवन की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं—के इस महोत्सव में बड़ी संख्या में ग्रामीणजन, समाज के पदाधिकारी, माताएं-बहनें और जनप्रतिनिधि उमड़े। यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना का सशक्त संदेश बनकर उभरा।

इस पावन अवसर पर जनपद पंचायत बागबाहरा के अध्यक्ष केशव नायकराम चंद्राकर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने माँ शाकंभरी की पूजा-अर्चना कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया। पूजा उपरांत अपने प्रेरणादायी संबोधन में केशव नायकराम चंद्राकर ने कहा कि “माँ शाकंभरी केवल देवी नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव समाज के लिए प्रकृति, करुणा और जीवन-संतुलन का जीवंत दर्शन हैं।”

उन्होंने कहा कि माँ शाकंभरी का स्वरूप हमें यह सिखाता है कि अन्न का सम्मान, जल का संरक्षण, वन और पर्यावरण की रक्षा ही सच्ची भक्ति है। आज जब दुनिया भौतिकता की दौड़ में प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर रही है, तब माँ शाकंभरी का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। “प्रकृति बचेगी तो जीवन बचेगा, और जीवन बचेगा तो समाज समृद्ध होगा,”—यह संदेश माँ शाकंभरी हमें हर क्षण स्मरण कराती हैं।

केशव नायकराम चंद्राकर ने मरार पटेल समाज की भूमिका की विशेष सराहना करते हुए कहा कि यह समाज सदियों से कृषि, शाक उत्पादन और परिश्रम को अपने जीवन का आधार मानते हुए माँ शाकंभरी के आदर्शों को व्यवहार में उतारता आया है। उन्होंने कहा कि मरार पटेल समाज ने यह सिद्ध किया है कि परंपरा और विकास साथ-साथ चल सकते हैं। आज आवश्यकता है कि हम अपने बच्चों को प्रकृति से जोड़ें, संस्कारों से जोड़ें और सामाजिक एकता को और मजबूत करें।

उन्होंने आगे कहा कि ऐसे धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। “जब समाज एकजुट होकर अपनी परंपराओं को सहेजता है, तब विकास की राह स्वतः प्रशस्त हो जाती है,”—यह बात उन्होंने विशेष जोर देकर कही। साथ ही उन्होंने सभी से आह्वान किया कि माँ शाकंभरी की कृपा से प्रेरणा लेकर क्षेत्र के समग्र विकास, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सद्भाव के लिए मिलकर कार्य करें।

महोत्सव के दौरान ग्राम कस्तुरबोड पूरी तरह भक्तिमय रंग में रंगा नजर आया। पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाएं, श्रद्धा से भरे ग्रामीण और समाज के वरिष्ठजन—सभी के चेहरों पर आस्था और गर्व की झलक स्पष्ट दिखाई दे रही थी। पूजा-अर्चना के पश्चात प्रसाद वितरण एवं सामूहिक सहभागिता ने आयोजन को और भी भावनात्मक बना दिया।

इस अवसर पर ग्राम प्रमुख सरपंच तुलाराम पनुरिया, डेमन राज पनुरिया, पूर्व सरपंच रामजीलाल सिन्हा, रिंकू चेतन चंद्राकर, चूड़ामणि साहू, दुर्योधन पटेल, भेखराम पटेल, नील सिंह, कृष्ण पनुरिया, डुमेस पटेल, गिरीश पनुरिया सहित जनपद एवं ग्राम स्तर के अनेक जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। साथ ही मरार पटेल समाज के पदाधिकारी, सदस्यगण और बड़ी संख्या में माताएं-बहनें भी महोत्सव की शोभा बढ़ाती रहीं।

समूचा शाकंभरी महोत्सव शांतिपूर्ण, अनुशासित और गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि समाज को यह संदेश भी दे गया कि माँ शाकंभरी के आदर्श—प्रकृति प्रेम, अन्न सम्मान और सामाजिक एकता—ही सच्ची श्रद्धा का मार्ग हैं।

कस्तुरबोड में आयोजित यह शाकंभरी महोत्सव निश्चित रूप से आने वाली पीढ़ियों के लिए संस्कार, संस्कृति और समरसता की प्रेरक मिसाल बनकर याद किया जाएगा।

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