“माँ की चीख, अस्पताल में हड़कंप… कमोड में मिला नवजात! टूटे हुए टॉयलेट से निकलती जिंदगी की कराह”
Ambikapur/मेडिकल कॉलेज अस्पताल के मातृ शिशु विंग (एमसीएच) में शनिवार की सुबह एक ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने नर्सों से लेकर डॉक्टरों तक सभी को हैरान कर दिया। एक महिला जिसने कुछ ही समय पहले प्रसव पीड़ा की शिकायत के साथ अस्पताल में भर्ती कराया गया था, अचानक घबराकर बोल उठी— “मेरे पेट में बच्चा अब हलचल नहीं कर रहा है!” और इसके बाद जो हुआ, वह किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं था।
वार्ड में मौजूद नर्सें पहले तो यह सुनकर चौंकीं, लेकिन जब तत्काल जांच की गई, तो जो सच सामने आया उसने पूरे अस्पताल स्टाफ के पैरों तले जमीन खींच ली। महिला का प्रसव हो चुका था—पर बच्चा कहीं दिख नहीं रहा था। एक तरफ स्तब्ध महिला, दूसरी तरफ हड़कंप में दौड़ती नर्सें… पूरा अस्पताल मानो सांसें रोककर इंतजार कर रहा था कि आखिर नवजात कहां गया?
शौचालय का दरवाज़ा खुला… और सामने दिखी भयावह सच्चाई!
नर्सों ने महिला से पूछा कि वह आखिरी बार कहां गई थी। कांपते हुए स्वर में उसने कहा—“मैं अभी थोड़ी देर पहले शौचालय गई थी…”
इतना सुनते ही वार्ड का माहौल तनावपूर्ण हो गया। नर्सों और महिला के परिजन ने भागकर वार्ड के शौचालय का दरवाज़ा खोला। अंदर का दृश्य रोंगटे खड़े कर देने वाला था। कमोड के भीतर कुछ फंसा दिख रहा था—रंग हल्का-सा नीला, शरीर छोटा… जैसे कोई अनकही पीड़ा के साथ संघर्ष कर रहा हो।
किसी ने आवाज दी—“कमोड में बच्चा है… बच्चा फंसा हुआ है!”और इसके साथ ही पूरे अस्पताल में अफरा-तफरी मच गई।
कमोड को तोड़ा गया… और बाहर आया जिंदगी का नन्हा ज्योति!
नर्सों ने तुरंत सफाई सुपरवाइजर आशीष को सूचना दी। चंद मिनटों में सफाई कर्मचारी औजार लेकर पहुंच गए। समय कम था… बच्चा सांसों के लिए संघर्ष कर रहा था… और सभी की आंखों में सिर्फ एक ही सवाल— क्या यह नवजात बच पाएगा?
कर्मचारियों ने बिना एक पल गंवाए कमोड को तोड़ना शुरू किया। टाइलें उखड़ीं, पाइप टूटे, और मिट्टी-पत्थरों के बीच से आखिरकार वह नवजात बाहर निकाला गया—नीला पड़ा हुआ, लगभग निस्पंद, लेकिन अभी भी जीवन की एक छोटी-सी धड़कन बाकी थी।
किसी ने उसे दोनों हाथों में उठाया—“जल्दी एसएनसीयू ले चलो!”और फिर नर्सें दौड़ पड़ीं।
एसएनसीयू में जारी है संघर्ष—धड़कनें धीमी, पर उम्मीद ज़िंदा!
नवजात को तुरंत विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई (एसएनसीयू) में भर्ती किया गया। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. जेके रेलवानी की टीम ने तुरंत उपचार शुरू किया। बच्चे की हालत अत्यंत गंभीर थी। डॉक्टर ने बताया—
“जब बच्चे को लाया गया था, उसका शरीर पूरी तरह नीला पड़ा था। हार्टबीट बहुत कम थी। लेकिन हम पूरी कोशिश कर रहे हैं।”
एसएनसीयू के मॉनिटर पर लगातार चलती बीप-ब beep की आवाज़ें मानो बच्चे की जिंदगी का संघर्ष गिन रही थीं। डॉक्टर, नर्सें, हर कोई उम्मीद और चिंता के बीच झूल रहा था।
महिला की हालत भी गंभीर, पर सबसे बड़ा सवाल—प्रसव का पता कैसे नहीं चला?
बच्चे की मां रामपति बाई, उम्र 30 वर्ष, सूरजपुर जिले के प्रतापपुर थाना क्षेत्र की रहने वाली है। वह 7 माह की गर्भवती थी और 13 नवंबर को प्रसव पीड़ा बढ़ने पर उसे प्रतापपुर अस्पताल लाया गया, जहां से गंभीर हालत देखकर अंबिकापुर रेफर किया गया था। लेकिन सबसे बड़ा रहस्य यह है कि महिला को प्रसव का एहसास तक नहीं हुआ, और वह शौचालय में ही प्रसव कर बैठी।
चिकित्सक इस स्थिति को “साइलेंट लेबर” की श्रेणी में रख रहे हैं, जिसमें प्रसव पीड़ा बहुत कम होती है और महिला को दर्द का अहसास नहीं होता।
वार्ड में मातम और दहशत—परिजन भी दंग!
महिला के परिजन रोते-बिलखते रहे—“हमारी बेटी को कुछ पता नहीं चला… बच्चा कमोड में कैसे गिर गया?”
अस्पताल स्टाफ भी ऐसी घटना शायद पहली बार देख रहा था। कुछ नर्सें तो सदमे में रो पड़ीं। वार्ड के बाहर मरीजों की भीड़ जमा हो गई।
अस्पताल प्रशासन अलर्ट—जांच शुरू!
इस भयावह घटना के बाद अस्पताल प्रबंधन हरकत में आ गया। कमोड में बच्चा गिरने की घटना को लेकर टीम गठित की गई है। सवाल उठ रहे हैं—
•वार्ड में तैनात स्टाफ क्या कर रहा था?
•महिला की निगरानी सही तरीके से क्यों नहीं हुई?
•प्रसव से पहले कोई लक्षण क्यों नहीं पहचाना गया?
प्रबंधन ने कहा—“यह घटना अत्यंत दुखद है। जांच की जा रही है। बच्चे की जान बचाना हमारी पहली प्राथमिकता है।”
बच्चा जिंदगी की लड़ाई लड़ रहा है—पूरा जिला दुआ कर रहा है!
एसएनसीयू के बाहर बच्चे के परिजन आंखें नम किए बैठे हैं। हर बीतता सेकेंड उनके लिए उम्मीद और दर्द का मिश्रण है। डॉक्टरों ने कहा है कि अगले 24 घंटे बेहद महत्वपूर्ण हैं।
वार्ड में हर तरफ एक ही चर्चा—“जिंदगी आज मौत के मुंह से वापस आई है…”और इस 7 महीने के नवजात की नन्ही धड़कनें पूरे अस्पताल को बता रही हैं कि जीवन कितना नाजुक और अनमोल है।













