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August 29, 2025 5:20 pm

महासमुंद में रेत माफियाओं का खुला खेल – कलेक्टर के आदेश की उड़ रही धज्जियां, माइनिंग विभाग की चुप्पी पर उठे सवाल!”

“महासमुंद में रेत माफियाओं का खुला खेल – कलेक्टर के आदेश की उड़ रही धज्जियां, माइनिंग विभाग की चुप्पी पर उठे सवाल!”

Mahasamund/रेत का कारोबार प्रदेश की राजनीति और प्रशासन में हमेशा से गरम मुद्दा रहा है, लेकिन महासमुंद जिले के बिरकोनी ग्राम से जो तस्वीर सामने आ रही है, वह न सिर्फ हैरान करने वाली है बल्कि प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गहरे सवाल खड़े कर रही है।

ग्राम बिरकोनी स्थित रेती भंडारण केंद्र पर जिला कलेक्टर द्वारा तय मापदंडों की खुली धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। हालात यह हैं कि यहां से धड़ल्ले से हाईवा गाड़ियों में रेत लोड कर राजधानी की ओर रवाना की जा रही है। रॉयल्टी पर्ची 16 चक्का हाईवा में 24 घन मीटर रेत दर्ज होती है, जबकि मौके पर वही गाड़ियां 24 घन मीटर से ज्यादा मतलब ओवरलोड रेती ट्रांसपोर्टर भरकर ले जा रहे है।

कलेक्टर के आदेश के बाद भी जारी ओवरलोडिंग!

जिला कलेक्टर ने साफ निर्देश जारी किए थे कि किसी भी परिस्थिति में ओवरलोडिंग नहीं होगी। लेकिन इन आदेशों को मानने के बजाय रेत कारोबारी और ट्रांसपोर्टर खुलेआम कानून को चुनौती दे रहे हैं। सवाल उठता है कि आखिर इतनी बड़ी गड़बड़ी के बाद भी जिला खनिज विभाग की आंखों में यह सब क्यों नहीं चुभता?

माइनिंग विभाग पर मिलीभगत के आरोप!

जिले में तैनात माइनिंग इंस्पेक्टर देवेंद्र साहू पर लोगों की उंगली उठ रही है। आम नागरिकों और छोटे ट्रांसपोर्टरों का आरोप है कि साहू बड़े-बड़े ट्रांसपोर्टरों को संरक्षण देते हैं। यही वजह है कि छोटे ट्रांसपोर्टरों के खिलाफ कार्यवाही कर के खानापूर्ति की कार्रवाई होती है, जबकि असली गड़बड़ी करने वाले बेखौफ कारोबार कर रहे हैं।

सूत्रों का कहना है कि जब इस मामले में माइनिंग अधिकारी को लगातार फोन कर जानकारी लेने की कोशिश की गई, तो उन्होंने कॉल रिसीव करना ही उचित नहीं समझा। यह चुप्पी खुद कई सवाल खड़े करती है। आखिर एक जिम्मेदार अधिकारी बड़े ट्रांसपोर्टरों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं करते? क्या यह केवल लापरवाही है या फिर कोई गहरी मिलीभगत?

राजधानी की ओर दौड़ती ओवरलोड गाड़ियां!

बिरकोनी से रोजाना दर्जनों हाईवा रेती से लदी राजधानी की ओर निकल रही हैं। गाड़ियों पर लदा माल इतना ज्यादा होता है कि सड़कों पर चलते समय संतुलन बिगड़ने का खतरा बना रहता है। सड़क हादसों की संभावनाएं बढ़ रही हैं, वहीं सरकार को करोड़ों रुपये की राजस्व हानि भी हो रही है।

रॉयल्टी पर्ची पर दर्ज संख्या और वास्तविक लोड के बीच इतना बड़ा अंतर यह साबित करने के लिए काफी है कि पूरा खेल सिर्फ कागजों पर नियमों को निभाने का है। जमीनी स्तर पर सब कुछ रेत माफियाओं के इशारे पर चल रहा है।

स्थानीय जनता में आक्रोश!
ग्राम बिरकोनी और आसपास के ग्रामीण बताते हैं कि ट्रकों और हाईवा का लगातार आना-जाना उनके लिए मुसीबत बन गया है। सड़कों की हालत खराब हो चुकी है। रात-बेरात भारी वाहनों की आवाजाही से दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है। बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर लोग चिंतित हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि अगर प्रशासन सचमुच नियम लागू करना चाहता है तो बड़े माफियाओं पर कार्रवाई करनी होगी। केवल छोटे ट्रांसपोर्टरों को पकड़कर अखबारों में फोटो छपवाने से समस्या का समाधान नहीं होगा।

खुलेआम हो रहा सरकारी आदेशों का अपमान!

प्रदेश सरकार समय-समय पर आदेश जारी करती है कि रेत का खनन और परिवहन नियमों के अनुसार ही होगा। मगर बिरकोनी का सच यह बताने के लिए काफी है कि जमीनी स्तर पर माइनिंग अधिकारी और रेत माफियाओं की मिलीभगत से सब कुछ नियमों के खिलाफ चल रहा है।

सरकारी आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए हैं, जबकि धरातल पर उनका कोई असर नजर नहीं आ रहा। इससे प्रशासनिक विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं।

क्या होगी कार्रवाई?
अब देखने वाली बात यह होगी कि जिला प्रशासन इस गंभीर मामले पर क्या कदम उठाता है। क्या बड़े रेत कारोबारियों पर नकेल कसी जाएगी या फिर यह मुद्दा भी छोटे ट्रांसपोर्टरों को बलि का बकरा बनाकर दबा दिया जाएगा?

जिला कलेक्टर ने जो निर्देश जारी किए हैं, उन पर अमल कराना माइनिंग विभाग की जिम्मेदारी है। मगर अगर विभाग के अधिकारी ही संरक्षण देने लगें, तो फिर आम जनता किससे न्याय की उम्मीद करे?

बिरकोनी ग्रामीणों की मांग – पारदर्शी जांच!
ग्रामीण संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र जांच कराई जाए। बड़े-बड़े ट्रांसपोर्टरों और भंडारण केंद्रों पर कार्रवाई की जाए। केवल खानापूर्ति वाली कार्रवाई से जनता का विश्वास नहीं जीता जा सकता।

महासमुंद जिले के बिरकोनी ग्राम से उठ रही यह रेत घोटाले की गूंज केवल एक गांव या एक जिले तक सीमित नहीं है। यह प्रदेश भर में फैले उस अव्यवस्थित खनन तंत्र की तस्वीर है, जिसमें नियम-कानून और सरकारी आदेशों की कोई अहमियत नहीं रह गई है।

अब यह प्रशासन पर निर्भर है कि वह रेत माफियाओं के इस काले कारोबार पर अंकुश लगाकर जनता को राहत दे या फिर चुप्पी साधकर मिलीभगत के आरोपों को और मजबूत करे।

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