“भगत की ढाल बने भगवान:सचिव के आदेश की उड़ रही धज्जियाँ, गरियाबंद में सहायक आयुक्त का प्रभार अटका”!
Gariyaband/छत्तीसगढ़ की नौकरशाही इन दिनों गरियाबंद जिले में सवालों के घेरे में है। सचिवालय से स्पष्ट आदेश निकल जाने के बाद भी आदिम जाति कल्याण विभाग के सहायक आयुक्त पद का प्रभार लोकेश्वर पटेल को नहीं सौंपा जा रहा है। यह मामला अब गरियाबंद जिले की प्रशासनिक साख पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है।
आदेश जारी, फिर भी अनुपालन अधर में!
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, आदिम जाति कल्याण विभाग के अपर कलेक्टर एवं प्रभारी सहायक आयुक्त रहे नवीन भगत का स्थानांतरण हो चुका है। मंत्रालय से उनके भारमुक्त होने के आदेश जारी किए गए हैं और उस पद का प्रभार परियोजना प्रशासक लोकेश्वर पटेल को सौंपने का निर्देश भी दिया गया है। लेकिन हैरत की बात यह है कि आज तक वह आदेश कलेक्टर कार्यालय से लागू नहीं कराया गया।
यहां तक कि, जिला कलेक्टर गरियाबंद ने स्वयं सचिवालय के आदेश का पालन कराने में चुप्पी साध रखी है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर एक स्थानांतरित अधिकारी को क्यों प्रभार से मुक्त नहीं किया जा रहा?
तीन साल से “कुंडी” लगाकर बैठे भगत!
दरअसल, सहायक आयुक्त का यह पद वर्षों से विवादों में रहा है। पहले यहां पर प्रतिनियुक्ति में आए अधिकारी राजेंद्र सिंह तैनात थे। लेकिन उनकी जगह लगातार दबाव और खींचतान के बीच यह पद नवीन भगत के हाथों में ही रहा।आखिरकार उनका स्थानांतरण हो गया और वह जिले से चले गए।
करीब 3 साल से यह पद “अस्थायी” रूप से अपर कलेक्टर भगत के पास ही बना हुआ है। अब जबकि उनका स्थानांतरण हो चुका है, तब भी वह पद का मोह छोड़ने को तैयार नहीं दिख रहे।
परियोजनाओं में करोड़ों के घोटाले का आरोप!
सूत्र बताते हैं कि इस पूरे खेल की जड़ करोड़ों रुपये की परियोजनाओं और छात्रावासों से जुड़ी फाइलों में दबी हुई है। आरोप है कि सहायक आयुक्त रहते हुए नवीन भगत ने कई योजनाओं में केवल कागजों पर काम दिखाया।
•छात्रावासों की मरम्मत और निर्माण के लिए स्वीकृत रकम फर्जी बिलों के माध्यम से निकाली गई।
•ठेकेदारों को भुगतान कर दिया गया लेकिन जमीन पर काम अधूरा या न के बराबर है।
•कई परियोजनाओं में कागजी आंकड़े और वास्तविकता धरातल में भारी अंतर पाया गया।
इन आरोपों के चलते अब स्थानीय लोगों और कर्मचारियों में यह चर्चा तेज हो गई है कि कहीं यही कारण तो नहीं कि नवीन भगत पद छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
कलेक्ट्रेट में डाटा एंट्री ऑपरेटर भर्ती में भी बड़ा खेल?
मामला यहीं तक सीमित नहीं है। सूत्रों से खबर है कि गरियाबंद कलेक्ट्रेट में जिले में डाटा एंट्री ऑपरेटर 02 पद भर्ती प्रक्रिया की भी घोषणा हुई थी। विज्ञापन जारी किया गया था और आवेदकों से संपर्क साधा गया।सूत्रों द्वारा पता चला है कि नवीन भगत पर आरोप हैं कि भर्ती के नाम पर लाखों रुपये का लेन-देन हुआ।
बाद में आधिकारिक तौर पर भर्ती रद्द कर दी गई। तत्कालीन कलेक्टर द्वारा रोक लगाई गई थी लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि गुपचुप तरीके से “चयन” भी कर लिया गया। यानी, जनता के सामने एक भर्ती निरस्त और पर्दे के पीछे “मिलीजुली” नियुक्ति!
“सुपर कलेक्टर” की संज्ञा!
जिला प्रशासन में यह चर्चा अब खुलेआम है कि नवीन भगत “सुपर कलेक्टर” बन बैठे हैं। जिले के वास्तविक कलेक्टर की अपेक्षा उनके दफ्तर में ज्यादा भीड़ नजर आती है। लोग सीधे उन्हीं के पास जाते हैं, मानो जिले का पूरा तंत्र उन्हीं के इशारे पर चल रहा हो।
यह स्थिति शासन और प्रशासन दोनों के लिए असहज है। सवाल उठ रहे हैं कि यदि सचिव का आदेश भी लागू नहीं होता, तो आखिर जिले में कानून का राज कहां है?
जिला कलेक्टर की चुप्पी संदेहास्पद!
सबसे बड़ी गुत्थी जिला कलेक्टर की भूमिका को लेकर है। सचिवालय से आदेश स्पष्ट हैं—नवीन भगत को सहायक आयुक्त पद से मुक्त किया जाए और प्रभार लोकेश्वर पटेल को दिया जाए। लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ।
•क्या जिला कलेक्टर स्वयं किसी दबाव में हैं?
•या फिर, कहीं ऐसा तो नहीं कि पूरी व्यवस्था ही भगत के इर्द-गिर्द घूम रही है? यह चुप्पी संदेह को और गहरा करती है।
भगत की संपत्ति की जांच की मांग!
स्थानीय स्तर पर यह मांग उठ रही है कि नवीन भगत की चल-अचल संपत्ति की गहन जांच होनी चाहिए। पिछले कुछ वर्षों में उनकी जीवनशैली और संपत्ति में हुए इजाफे पर भी लोग सवाल उठा रहे हैं।
जनता का कहना है कि यदि उन पर लगाए जा रहे आरोप सही पाए जाते हैं तो यह छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक छवि के लिए बेहद गंभीर धक्का होगा।
क्या होगी कार्रवाई?
•अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सचिवालय अपने आदेश की अवहेलना सहन करेगा?
•क्या कलेक्टर पर जवाबदेही तय होगी?
• क्या करोड़ों के संभावित घोटाले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपी जाएगी?
फिलहाल, गरियाबंद जिले का यह मामला नौकरशाही के लिए एक “टेस्ट केस” बन गया है। अगर सरकार और सचिवालय यहां चुप्पी साधते हैं तो यह संदेश जाएगा कि आदेश और नियम केवल कागजों पर सीमित हैं, जबकि असली ताकत “सुपर अधिकारियों” के हाथों में है।
नवीन भगत का सहायक आयुक्त पद पर बने रहना सिर्फ एक प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की शासन व्यवस्था के लिए चुनौती है। यह सिर्फ पद का मोह नहीं, बल्कि उन योजनाओं और घोटालों से जुड़ा सवाल भी है जिनकी परतें धीरे-धीरे खुल रही हैं। कुछ दिनों पहले गरियाबंद जिला के देवभोग विकासखंड के पत्रकारों द्वारा नवीन भगत के खिलाफ हड़ताल किया गया था जिसमें इनको हटाने के लिए ज्ञापन सौंपा गया था।
यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला पूरे प्रदेश की साख को हिला सकता है। जनता अब पूछ रही है—“क्या सचिव के आदेश सिर्फ दिखावे के लिए हैं? क्या गरियाबंद में शासन का राज खत्म और ‘भगत राज’ शुरू हो गया है?”
इस समाचार के बाद एक बड़े मामले अपने पार्ट 02 में हम आयेंगे भ्रष्टाचार की परते खोली खोलेंगे।













