प्रदेश में प्रशासनिक तूफान:धान खरीदे के पहले 2058 सहकारी कर्मचारियों ने सामूहिक इस्तीफा सौंपा।
Mahasamund/छत्तीसगढ़ की धरती पर आज ऐसा दृश्य सामने आया जिसने शासन-प्रशासन की पूरी व्यवस्था को झकझोर दिया। सहकारी समिति कर्मचारी संघ रायपुर एवं समर्थन मूल्य धान खरीदी ऑपरेटर संघ के हजारों कर्मचारियों ने एकसाथ सामूहिक इस्तीफा सौंपने का अभूतपूर्व निर्णय लेकर प्रदेश में प्रशासनिक हलचल मचा दी है। इनकी 04 सूत्रीय मांगों की अनदेखी, आंदोलन को कुचलने की कोशिशें और दमनात्मक कार्रवाई ने कर्मचारियों को ऐसा कदम उठाने पर मजबूर कर दिया कि पूरा शासन तंत्र सकते में आ गया।
संघर्ष की चिंगारी जो भड़की ज्वाला बन गई!
कहानी शुरू होती है 15 अक्टूबर 2025 से—जब दोनों संगठनों ने संयुक्त रूप से बैठक कर अपनी लंबित मांगों को लेकर मुख्यमंत्री, मंत्रिमंडल, जिला प्रशासन और समिति प्राधिकृतों को लिखित ज्ञापन दिए। कर्मचारियों ने सरकार को पर्याप्त समय दिया, पर नतीजा—“शून्य”।मांगें पूरी नहीं हुईं तो-
•24 अक्टूबर 2025—जिला मुख्यालयों में विशाल धरना -प्रदर्शन और रैलियां हुईं।
•28 अक्टूबर 2025—सभी संभागीय आयुक्तों के माध्यम से फिर से ज्ञापन सौंपे गए।
इसके बावजूद शासन की चुप्पी ने कर्मचारियों के आक्रोश को और तेज कर दिया।
सरकार की चुप्पी टूटी, पर आदेशों में आया ‘दमन’!
मांगों पर निर्णय तो नहीं आया, लेकिन सरकार की तरफ से जो आया… वह था एफआईआर, सेवा मुक्ति आदेश, दमनकारी नोटिस, और ESMA का डर।
कर्मचारी नेताओं ने बताया कि—
•15 से 20 प्रदेश पदाधिकारियों पर सेवा मुक्ति जैसे कठोर आदेश जारी किए गए।
•प्रदेश अध्यक्ष पर एफआईआर दर्ज कर उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश की गई।
•शांतिपूर्वक धरना दे रहे कर्मचारियों को पुलिस थानों में बैठाया जा रहा है।
ESMA लगाकर आंदोलन को दबाने की कोशिश हो रही है—जबकि ESMA केवल नियमित शासकीय कर्मचारियों पर लागू होता है, न कि संविदा या दैनिक वेतनभोगियों पर।कर्मचारियों ने सरकार से सवाल किया—“हम नियमित कर्मचारी नहीं, तो ESMA हम पर कैसे?”
3 नवंबर से छ.ग. पांचों संभागों में ज्वालामुखी जैसी हड़ताल!
तुता रायपुर में अनिश्चितकालीन आंदोलन की अनुमति न मिलने पर,3 नवंबर 2025 से प्रदेश के पांचों संभागों में एकसाथ हड़ताल, धरना, प्रदर्शन शुरू हुआ।कर्मचारियों ने लोकतांत्रिक ढंग से अपनी लड़ाई जारी रखी पर बदले में उन्हें मिला—
•मानसिक प्रताड़ना,
•आर्थिक दमन,
•नौकरी से हटाने की कार्रवाई,
•थाने, पुलिस, नोटिस और भय का माहौल,
•इससे कर्मचारियों का धैर्य टूट गया।
वर्ष 2025-26 की धान खरीदी पर बड़ा संकट!
कर्मचारी संघ पहले ही सरकार को चेतावनी दे चुका था—“दमन बंद न हुआ और मांगें नहीं मानी गईं, तो धान खरीदी से अलग रहेंगे।”
अब परिस्थितियों ने उस चेतावनी को वास्तविकता में बदल दिया है।कर्मचारी कोर्ट-थाने-FIR और अप्राप्त वेतन की समस्याओं में उलझे हुए हैं।कई महीनों का वेतन बकाया है, घर परिवार चलाना कठिन हो गया है।

ऐसे हालात में धान खरीदी जैसे विशाल अभियान को चलाने वाली रीढ़—यानी ये कर्मचारी—अपने को पूरी तरह असहाय और अपमानित महसूस कर रहे हैं।
2058 सहकारी समितियों के कर्मचारीगण का सामूहिक इस्तीफा!
आज 17 नवंबर 2025 को दोनों संगठनों ने सबसे बड़ा कदम उठाया—छत्तीसगढ़ की 2058 सहकारी समितियों के सभी दैनिक, संविदा और नियमित कर्मचारीगण ने सामूहिक इस्तीफा सौंप दिया। पत्र सीधे भेजे गए—
•राज्यपाल, छत्तीसगढ़
•मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़
•माध्यम: संभागीय आयुक्त, रायपुर,
इस्तीफे में साफ लिखा—
“दमन, प्रताड़ना, अवैध ESMA, अनुचित सेवा मुक्ति आदेश, वेतन बकाया और मांगों की अनदेखी के लिए छत्तीसगढ़ शासन स्वयं जिम्मेदार होगा।”
समिति कर्मचारियों का दर्द—शब्दों में ज्वाला!संगठन के प्रदेश अध्यक्ष का बयान दिल दहला देने वाला रहा—
“हम अपराधी नहीं हैं कि ESMA लगाया जाए,हम वेतन मांगते हैं, अधिकार मांगते हैं… और जवाब में मिलता है थाना और FIR?”समस्या सिर्फ आंदोलन नहीं, यह भी है—
• धान सूखने पर समिति का कमीशन काटा जाता है!
•जबकि धान का उठाव समय पर न होना कर्मचारियों की गलती नहीं।
• कंप्यूटर ऑपरेटरों को केवल 6 माह का वेतन!
•लेकिन काम पूरा साल करना पड़ता है—बाकी 6 महीनों में वह परिवार कैसे चलाए?
सवालों के घेरे में सरकार—धान खरीदी की मशीनरी ठप होने का खतरा!
धान खरीदी हर साल करोड़ों किसानों का जीवन बदलती है।यही काम संभालते हैं—ये सहकारी समिति कर्मचारी और ऑपरेटर।इनके बिना डेटाअपलोड, तौल, पंजीयन, टोकन, भुगतान—सब रुक जाएगा।
अब जब सभी कर्मचारी सामूहिक इस्तीफा दे चुके हैं…
•क्या सरकार खुद धान खरीदी चलाएगी?
•क्या हजारों समितियों में काम ठप नहीं होगा?
•क्या लाखों किसान प्रभावित नहीं होंगे?
•क्या जिसने कभी धान खरीदी नहीं की है वह 2 दिन में धान खरीदना सीख गया?
शासन के सामने अब स्थिति विस्फोटक है।आंदोलन एक चेतावनी नहीं—एक प्रदेश-व्यापी ‘जन-आक्रोश’ है कर्मचारियों ने स्पष्ट कहा—
“हम धान खरीदी से अलग रहेंगे, जब तक हमारी मांगें नहीं मानी जातीं।”अब यह संघर्ष केवल वेतन या मांगों का नहीं,यह सम्मान, अधिकार और न्याय का संघर्ष बन चुका है।
प्रदेश की नियति निर्णायक मोड़ पर!
आज रायपुर से उठा यह भूचाल आने वाले दिनों में बड़े प्रशासनिक संकट का संकेत है।2058 समितियों का सामूहिक इस्तीफा सिर्फ एक पत्र नहीं—यह सरकार के सामने खड़ी हजारों परिवारों की बेबसी और दमन के खिलाफ गूंजती चेतावनी है।अब गेंद शासन के पाले में है—समाधान निकलेगा या संघर्ष और उग्र होगा?
छत्तीसगढ़ की जनता की नज़रें उसी पर टिकी हैं।













