“धरती के पेट में छुपा ऊर्जा का महाआधार: पुरुंगा खदान से भारत की पर्यावरण-सुरक्षित प्रगति की गूंज, विरोध की धुंध में सच की किरण!”
कुड़ेकेला। ऊर्जा संकट से जूझती दुनिया में जब कई देश अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता से भरे हुए हैं, भारत ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने विकास की दिशा में नई रोशनी जगा दी है। छत्तीसगढ़ की हरी-भरी मिट्टी के नीचे छुपा कोयले का अथाह भंडार देश को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने के लिए तैयार खड़ा है। इसी कड़ी में पुरुंगा भूमिगत कोयला खदान छोटे से रायगढ़ जिले को राष्ट्रीय महत्व के नक्शे पर चमका रही है। सवाल यह नहीं कि खदान बनेगी या नहीं, सवाल यह है कि क्या हम भविष्य को तथ्यों के आधार पर देखना चुनेंगे या भ्रम की धुंध में उलझे रहेंगे।
6 अगस्त 2025 को भारत सरकार की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति ने देश में हलचल मचा दी। इस विज्ञप्ति में साफ कहा गया कि भूमिगत कोयला खनन भविष्य की अनिवार्य तकनीक है, जो पर्यावरणीय संतुलन को सुरक्षित रखते हुए उद्योग और समाज दोनों को नई गति दे सकती है। सरकार के मुताबिक भूमिगत खनन खेती की जमीन, जंगलों और ग्रामीण बसाहटों को लगभग अछूता छोड़ देता है। सतही खनन की तुलना में यहां न तो बड़े पैमाने पर पेड़ कटते हैं, न ही गांव उजड़ते हैं। तकनीक ऐसी है जो धरती के अंदर खनन करती है और ऊपर की दुनिया को लगभग वैसा ही रहने देती है जैसा वह है।
कुड़ेकेला और आसपास के ग्रामीण इलाकों में ऊपरी सतह पर कोई भारी मशीन नहीं दौड़ती, न ही धूल का ऐसा गुबार उठता है जो आसमान को ढक दे। भूमिगत खनन की यही खासियत है। यह तकनीक न केवल पर्यावरण को बचाती है बल्कि ध्वनि प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में बड़ी कमी लाती है। वैश्विक तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के दौर में यह बदलाव छोटा नहीं, बल्कि बेहद निर्णायक माना जा रहा है।
पुरुंगा भूमिगत खदान इस दिशा में एक मील का पत्थर बनकर उभर रही है। 2.25 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन क्षमता वाली यह विशाल परियोजना न केवल देश को ऊर्जा सुरक्षा देगी, बल्कि क्षेत्र में रोजगार की नई धाराएं भी उत्पन्न करेगी। स्थानीय युवाओं के लिए प्रशिक्षित तकनीकी नौकरियां, सहायक सेवाओं में कार्य के अवसर, और महिलाओं के लिए कई तरह की आर्थिक गतिविधियां इस परियोजना के माध्यम से बढ़ेंगी। रायगढ़ और आसपास के क्षेत्र विकास की नई चौखट पर खड़े दिखाई दे रहे हैं।
विरोध की आवाजें भी उठ रही हैं, हालांकि इनमें कई बातें गलतफहमी और राजनीतिक शोर पर आधारित हैं। भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय विनाश जैसे आरोप सतही खनन के संदर्भ में सही हो सकते हैं, पर भूमिगत तकनीक के संदर्भ में इनकी प्रासंगिकता बहुत कम है। सच यह है कि इस परियोजना में सतही हस्तक्षेप न्यूनतम होगा, जिससे किसानों की जमीन, ग्रामीण इलाकों की बसाहट और स्थानीय जैव विविधता लगभग अप्रभावित रहेगी। सच को दबाकर डर फैलाना आसान है, पर तथ्य वही हैं जो सरकार और विशेषज्ञों ने प्रस्तुत किए हैं।
रायगढ़ क्षेत्र के आर्थिक परिदृश्य की बात करें तो पुरुंगा खदान जैसे प्रोजेक्ट शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन सुविधाओं में भी सुधार का मार्ग खोलेंगे। खदान से मिलने वाली रॉयल्टी और CSR व्यय से गांवों की सड़कें, स्कूल, जल आपूर्ति और बिजली व्यवस्था मजबूत होगी। कई परिवार जो आज पलायन के कगार पर खड़े हैं, उन्हें अपने ही क्षेत्र में सम्मानजनक रोजगार मिलने का रास्ता दिखाई दे रहा है।
कुड़ेकेला और आस-पास के गांवों में बैठकों का दौर जारी है। कुछ लोग संशय में हैं, कुछ लोग उम्मीद से भरे हुए हैं, पर एक बात सभी समझने लगे हैं कि सतही खनन के मुकाबले भूमिगत तकनीक पर्यावरण और समाज दोनों की सुरक्षा करती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले दस वर्षों में भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी तकनीक के माध्यम से पूरा होगा।
भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। ऊर्जा की आवश्यकता बढ़ रही है, पर पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। पुरुंगा खदान जैसी परियोजनाएं इस संतुलन का उदाहरण बन सकती हैं। जब देश आत्मनिर्भर ऊर्जा की ओर कदम बढ़ा रहा है तब इसे विरोध और गलत सूचनाओं की भेंट चढ़ाना किसी भी रूप में न्यायोचित नहीं होगा।
निर्णय वही होना चाहिए जो भविष्य के हित में हो। पुरुंगा की भूमिगत खदान सिर्फ एक खदान नहीं, बल्कि भारत की पर्यावरण-सुरक्षित प्रगति का प्रतीक बन सकती है। सवाल केवल इतना है कि क्या हम सच को स्वीकारकर आगे बढ़ेंगे या फिर भ्रम की राजनीति में अपने ही विकास का रास्ता रोक देंगे।













