ऑपरेशन के नाम पर मौत का सौदा” – गरियाबंद जिले के पेंड्रा गांव दहला झोलाछाप डॉक्टरों के चंगुल में गई आदिवासी मासूम की जान!
Gariyaband/गरियाबंद जिले का शांत और छोटा सा गांव पेंड्रा शनिवार को उस भयानक घटना का गवाह बना, जिसने जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासन की पोल खोल कर रख दी। यह कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि मानव जीवन से घोर खिलवाड़ की कहानी है।
30 हज़ार का सौदा और मौत की डील!
ग्राम पेंड्रा निवासी पुरूषोत्तम ध्रुव को पाइल्स की पुरानी शिकायत थी। इलाज के भरोसे में उन्होंने तथाकथित “डॉक्टर” संजू राजपूत (अमलीपदर निवासी) से संपर्क किया। बताया जाता है कि राजपूत द्वारा इलाज और ऑपरेशन के नाम पर 30,000 रुपए की डील पर सहमती की गई।
पहला ऑपरेशन संजू राजपूत, उसके साथी बबलू टांडी (निवासी – कोमना, उड़ीसा) और उसके बेटे द्वारा गुप्त कमरे में किया गया। किसी को अंदर जाने नहीं दिया गया। इसके बाद लगातार दो और बार इसी तरह से ऑपरेशन किए गए और हर बार 10-10 हजार रुपए लिए गए।
शनिवार बना मौत का दिन!
शनिवार को तीसरी बार! झोलाछाप टीम ने बंद कमरे में ऑपरेशन किया। परिजनों को बाहर ही रोका गया। कुछ देर बाद जब सवाल पूछे गए तो उन्हें बताया गया कि “मरीज को इंजेक्शन दिया गया है और वह आराम कर रहे हैं।और बिना पैसा लिए जल्दी से गाड़ी में बैंकर कर निकल गयें। सबसे बड़ा सच सामने तब आया आया जब परिजन कमरे में घुसे तो पुरूषोत्तम ध्रुव तड़पते हुए जोर-जोर से सांस ले रहे थे।
परिवार ने आनन-फानन में उन्हें जिला अस्पताल पहुँचाया, मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अस्पताल में मौजूद “डॉक्टर हरीश चौहान ने स्पष्ट किया कि मरीज की मौत गलत और असुरक्षित ऑपरेशन के चलते अत्यधिक ब्लीडिंग और दर्द सहन न कर पाने से हुई है”
पकड़े ना जा सके झोलाछाप!
घटना की खबर मिलते ही परिजन और ग्रामीण भागते डॉक्टरों को पकड़ने पहुंचे, लेकिन संजू राजपूत और उसका साथी मौके से फरार हो गए।मृतक का छोटा भाई और गांव वाले पीछे भी दौड़े, परंतु दोनों मौके का फायदा उठाकर निकल भागे।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने खोली पोल!
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफ हुआ कि मरीज के शरीर पर पाइल्स स्थान पर ऑपरेशन के चीरे स्पष्ट देखे गए। डॉक्टरों ने मानक नियमों को ताक पर रखकर, बिना किसी योग्य प्रशिक्षण, उपकरण और अनुमति के ऑपरेशन किया, जिसने मरीज की जान ले ली।
प्रशासन और कानून की कार्रवाई!
घटना की सूचना जैसे ही अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक जितेंद्र चंद्राकर तक पहुँची, उन्होंने तत्काल सिटी कोतवाली को जांच सौंपने की बात कही। थाना प्रभारी द्वारा मर्ग कायम कर पंचनामा तैयार किया गया।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि बहुत जल्द आरोपियों के विरुद्ध हत्या जैसे गंभीर अपराध में प्रकरण दर्ज कर कानूनी कार्यवाही शुरू की जाएगी।
सवालों के घेरे में स्वास्थ्य व्यवस्था!
यह घटना सिर्फ एक गांव या एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उन अनगिनत ग्रामीणों की पीड़ा का प्रतीक है जो आज भी झोलाछाप डॉक्टरों के सहारे अपनी ज़िंदगी का दांव खेलते हैं।
• क्या जिला प्रशासन सो रहा था कि गांव में बिना डिग्री, बिना अनुमति और बिना सुविधाओं के “ऑपरेशन थियेटर” चला?
• स्वास्थ्य विभाग की निगरानी कहाँ थी?
• क्यों लोगों को सही हॉस्पिटल और योग्य डॉक्टर तक पहुँचाने के लिए तंत्र फेल है?
• कब तक आदिवासी गरीब और भोले-भाले ग्रामीण ऐसे झोलाछापों की भेंट चढ़ते रहेंगे?
•क्या जिला प्रशासन चुप्पी साध के बैठा हुआ है या मोटा कमीशन का खेल खेला जा रहा है?
एक परिवार का उजड़ना!
पुरूषोत्तम ध्रुव की मौत के साथ परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। गाँव में मातम का माहौल है। अपने पिता को खोने वाले बेटी का कहना है –
“हम भरोसा करके ऑपरेशन कराये थे, पर उन्होंने मेरे पापा को मार दिया। यह हत्या है… इन्हें सज़ा मिलनी चाहिए।”
सच्चाई की बेजोड़ दस्तक!
पेंड्रा की यह घटना स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन के चेहरे पर करारा तमाचा है। यह सिर्फ एक शव का दर्द नहीं, बल्कि उस लालच और लापरवाही की पोल खोलने वाली चीख है, जिसने जिंदगी को पैसों की बोली में बेच दिया।
अब पूरा गांव और जिला प्रशासन इंसाफ की मांग कर रहा है।और सवाल यही है – क्या दोषियों को कानून का हक़ीकी दंड मिलेगा या एक और केस फ़ाइलों में दब जाएगा?
यह था “पेंड्रा त्रासदी” – झोलाछाप डॉक्टरों के नाम पर मौत का सौदा, जिसकी गूंज अब गरियाबंद ही नहीं, पूरे प्रदेश को झकझोरने लगी है।