एम्स रायपुर में इलाज बना लापरवाही का शिकार: इंजेक्शन और प्लास्टर हटाने में भारी चूक, मासूम के पैर पर गहरा घाव…
Raipur/छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाते हुए बिलासपुर निवासी रामसजीवन ने एक लिखित शिकायत दर्ज कराई है। उनका कहना है कि उनकी नाबालिग पुत्री पृथा चौधरी का इलाज 29 अगस्त 2025 को संस्थान में हुआ था, जिसमें डॉक्टरों ने इंजेक्शन लगाकर पैर में प्लास्टर चढ़ाया था। लेकिन लंबे इलाज के बाद जब 11 सितंबर 2025 को प्लास्टर काटा गया जिससे पूरे प्रकरण ने एक भयावह मोड़ ले लिया।
फोन पर बात करते रहे लैब टेक्नीशियन, बच्ची का पैर घायल!
शिकायतकर्ता के अनुसार, जब प्लास्टर हटाने की प्रक्रिया चल रही थी, तब जिम्मेदार लैब तकनीशियन प्रदीप कुमार मोबाइल फोन पर व्यस्त थे। प्लास्टर काटते समय लापरवाही के चलते उनकी बच्ची के दाहिने पैर में गहरी चोट लग गई। यह कट इतना गहरा था कि मौके पर ही खून बहने लगा।
रामसजीवन का कहना है कि जब उन्होंने तुरंत इस चूक की जानकारी कक्ष प्रभारी को दी, तो मामला टालने की कोशिश की गई। हालांकि, गंभीरता बढ़ने पर डॉक्टर द्वारा दो टांके लगाए गए।
पीड़ित पिता का सवाल – “क्या AIIMS जैसे संस्थान में बच्चों की जान से खिलवाड़ होगा?”
रामसजीवन ने अपने प्रपत्र में लिखा है –
“ मेरी पुत्री के इलाज में जिस तरह की लापरवाही हुई, वह न केवल दुखद है बल्कि शर्मनाक भी है। यह देश का प्रमुख चिकित्सा संस्थान है, जहाँ हर साल लाखों मरीज इलाज के लिए आते हैं। अगर यहां भी स्टाफ अपनी जिम्मेदारी को मज़ाक बना दे, तो आम जनता का भरोसा कैसे कायम रहेगा?”
उन्होंने मांग की है कि ऐसे कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई हो, ताकि भविष्य में किसी और मासूम के साथ ऐसा हादसा न हो।
AIIMS रायपुर पर बढ़ते सवाल!
AIIMS रायपुर, जिसकी गिनती देश के सर्वोच्च चिकित्सा संस्थानों में होती है, पिछले कुछ वर्षों से लगातार मरीजों की शिकायतों के घेरे में है। लंबी वेटिंग, स्टाफ का गैर-जिम्मेदार रवैया और बदहाल प्रबंधन पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।अब इस घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि –
•क्या बड़े-बड़े अस्पतालों में तकनीकी दक्षता से अधिक ढीला रवैया हावी है?
•क्या मरीजों के साथ संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से पेश आना पीछे छूट गया है?
जांच की मांग तेज!
इस मामले के सामने आने के बाद पीड़ित परिवार ने न केवल लिखित शिकायत सौंपी है बल्कि इसकी कॉपी जिला प्रशासन और स्वास्थ्य मंत्रालय को भी भेजने की बात कही है।रामसजीवन का कहना है कि –
“मैं चाहता हूँ कि मेरे परिवार के साथ जो अन्याय हुआ है, वह किसी और परिवार के साथ न हो। अगर समय रहते ऐसी लापरवाहियों पर रोक नहीं लगी, तो यह संस्थान भरोसे का केंद्र नहीं बल्कि भय का प्रतीक बन जाएगा।”
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
AIIMS की साख दांव पर – देशभर के मरीज इस संस्थान को सर्वोच्च चिकित्सा सुविधा मानते हैं। यहां लापरवाही के मामले आम लोगों के भरोसे को तोड़ सकते हैं।मासूम बच्ची पर असर – इलाज के नाम पर पैर पर गहरा घाव लगना न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक आघात भी है।
प्रणालीगत खामियां उजागर – फोन पर बात करते हुए जिम्मेदारी निभाना लापरवाही की पराकाष्ठा है। यह प्रशिक्षण, अनुशासन और कार्य संस्कृति की विफलता को दर्शाता है।
क्या कहती है अस्पताल प्रबंधन की जिम्मेदारी?
अस्पताल प्रबंधन का दायित्व है कि:
• हर प्रक्रिया में प्रशिक्षित और सतर्क स्टाफ तैनात हो।
• मरीज की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
• शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई कर जिम्मेदारों पर सख्त दंड दिया जाए।
लेकिन अभी तक प्रबंधन की ओर से कोईआधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
जनता की प्रतिक्रिया और उठे सवाल!
इस घटना ने सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर भी चर्चा को जन्म दिया है। लोग सवाल उठा रहे हैं:
•“क्या AIIMS जैसे संस्थानों में भी लापरवाही आम हो चुकी है?”
•“क्या फोन कॉल अब मरीजों की जान से ज्यादा जरूरी हो गया है?”
•“क्या सरकार को ऐसे मामलों पर स्वतः संज्ञान नहीं लेना चाहिए?”
लापरवाही का इलाज, जिम्मेदारी से ही संभव!
यह घटना सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं है, बल्कि पूरे चिकित्सा तंत्र की कमजोरी की झलक है। AIIMS जैसे संस्थान पर आम जनता का विश्वास तभी कायम रह पाएगा जब हर मरीज को समय पर, संवेदनशील और सुरक्षित इलाज मिल सके।
रामसजीवन की यह शिकायत अब एक मिसाल है कि आम आदमी अपनी आवाज उठाए तो बड़ी संस्थाओं को भी कटघरे में खड़ा किया जा सकता है। लेकिन असली सवाल यही है – क्या इस लापरवाही का जिम्मेदार वाकई सजा पाएगा, या मामला फाइलों में दबकर रह जाएगा?













