इलाज के मंदिर में मौत की दुर्गंध: सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तखतपुर बना “संक्रमण परोसने का केंद्र”,जहाँ जीवन बचाने के बीचों-बीच रखी जा रही हैं लाशें…
Bilaspur/आज बिलासपुर जिला के तखत विकासखंड के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से एक चौकाने वाला मामला सामने आया है एक पुरानी कहावत है— “आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास”। यह कहावत आज अक्षरशः लागू होती दिखाई दे रही है सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तखतपुर पर, जहाँ लोग इलाज की उम्मीद लेकर पहुँचते हैं, लेकिन वहाँ उन्हें बीमारी से भी अधिक खतरनाक माहौल का सामना करना पड़ रहा है। जिस अस्पताल को जीवन रक्षक माना जाता है, वही अस्पताल आज कथित तौर पर संक्रमण फैलाने का केंद्र बनता जा रहा है।

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तखतपुर की जिम्मेदारी खंड चिकित्सा अधिकारी और ब्लॉक कार्यक्रम प्रबंधक के कंधों पर होती है। शासन की मंशा के अनुरूप इन्हीं अधिकारियों पर चिकित्सा उपचार, मानव संसाधन की व्यवस्था, स्वच्छता, सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों के पालन की जिम्मेदारी होती है। लेकिन आरोप है कि इन्हीं जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारियों की लापरवाही के कारण आज यह अस्पताल भय और संक्रमण का अड्डा बन गया है।

इस अस्पताल में प्रतिदिन दुधमुंहे नवजात, गर्भवती महिलाएँ, बुजुर्ग, और विभिन्न गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीज इलाज के लिए पहुँचते हैं। शासन की गाइडलाइन के अनुसार बच्चों के टीकाकरण, गर्भवती माताओं के उपचार व टीकाकरण, तथा अन्य रोगियों के प्राथमिक उपचार के लिए अलग-अलग कक्ष बनाए गए हैं। दवा वितरण कक्ष, ओपीडी और टीकाकरण कक्षों में मरीजों के साथ उनके परिजन भी मौजूद रहते हैं, जिससे स्वाभाविक रूप से भीड़ भरा वातावरण बना रहता है।
लेकिन चौंकाने वाला आरोप यह है कि इन्हीं उपचार कक्षों के बीचों-बीच एक कक्ष को मर्चुरी में तब्दील कर दिया गया है। सूत्रों के अनुसार इसी कक्ष में गंभीर बीमारी, जहरखुरानी या अन्य कारणों से मृत व्यक्तियों के शव रखे जाते हैं और वहीं पोस्टमार्टम की प्रक्रिया भी की जाती है। बताया जाता है कि शवों से उठने वाली दुर्गंध, पोस्टमार्टम के बाद निकला खून और बिसरा लंबे समय तक उसी परिसर में फैला रहता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, नवजात शिशुओं, गर्भवती महिलाओं और गंभीर रोगियों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता पहले से ही कमजोर होती है। ऐसे में मर्चुरी से निकलने वाली दुर्गंध और संभावित रोगाणु उनके लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं। आरोप है कि इस अव्यवस्थित व्यवस्था के कारण मरीजों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है, लेकिन इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारी आंख मूंदे बैठे हैं।
सबसे गंभीर बात यह है कि यह कथित अव्यवस्था कोई नई नहीं है। स्थानीय लोगों और कर्मचारियों का कहना है कि यह स्थिति विगत दो वर्षों से बनी हुई है। सवाल यह उठता है कि इस दौरान कितने मरीज इस प्रदूषित माहौल की चपेट में आकर बीमार हुए होंगे, इसका कोई लेखा-जोखा आखिर कौन रखेगा? क्या इलाज के लिए आया मरीज संक्रमण लेकर घर लौट रहा है?
और भी हैरान करने वाली बात यह है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तखतपुर का समय-समय पर निरीक्षण भी होता रहा है। क्षेत्रीय विधायक, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, जिला कार्यक्रम प्रबंधक, विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं के जिला प्रभारी अधिकारी और अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) तखतपुर लगभग हर माह इस अस्पताल का दौरा करते रहे हैं। इसके बावजूद, आरोप है कि किसी भी अधिकारी ने इस अव्यवहारिक और अमानवीय व्यवस्था पर न तो सवाल उठाया और न ही कोई ठोस कार्रवाई की।
यह स्थिति जिला स्तर के स्वास्थ्य अधिकारियों की स्वास्थ्य योजनाओं के संचालन के प्रति उदासीनता और कर्तव्यों के प्रति निष्क्रियता को उजागर करती है। निरीक्षण क्या केवल औपचारिकता बनकर रह गया है? क्या फाइलों में सब कुछ ठीक दिखाना ही निरीक्षण का उद्देश्य है, जबकि ज़मीनी हकीकत मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रही हो?
स्थानीय नागरिकों में इस मुद्दे को लेकर भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि अस्पताल, जहाँ जीवन बचाया जाना चाहिए, वहाँ अगर मौत की दुर्गंध और संक्रमण फैलाने वाले हालात बनाए जाएँगे, तो यह सीधे-सीधे आम जनता के स्वास्थ्य के साथ अपराध है। लोगों का यह भी कहना है कि यदि कोई निजी संस्था ऐसा करती, तो उस पर कब की कार्रवाई हो चुकी होती, लेकिन सरकारी व्यवस्था में जिम्मेदारी तय करने से सब कतराते नजर आते हैं।
अब तखतपुर ब्लॉक के आम नागरिकों और अस्पताल में आने वाले मरीजों की मांग तेज होती जा रही है कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। आरोपों के घेरे में आए खंड चिकित्सा अधिकारी को तत्काल पद से हटाकर उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाए और यदि जांच में लापरवाही सिद्ध होती है, तो संबंधित धाराओं में पुलिस थाना में एफआईआर भी दर्ज की जाए।
यह मामला केवल एक अस्पताल की अव्यवस्था का नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की संवेदनहीनता का प्रतीक बनता जा रहा है। सवाल यह है कि क्या शासन और प्रशासन इस गंभीर मुद्दे को समय रहते समझेगा, या फिर तखतपुर का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र यूँ ही “इलाज के नाम पर संक्रमण परोसने का केंद्र” बना रहेगा?
अब जवाबदेही तय करने की घड़ी आ चुकी है, क्योंकि दांव पर केवल व्यवस्था नहीं, बल्कि आम जनता की जान है।













