“अनुग्रह अनुदान या अन्याय?”— शासकीय सेवकों की मौत के बाद भी सिस्टम कर रहा सौदेबाज़ी!
भानुप्रताप यादव ने सरकार के सामने उठाई 25 साल पुरानी सीमा पर पुनर्विचार की मांग!
Durg/छत्तीसगढ़ के हजारों शासकीय सेवकों की भावनाओं को झकझोर देने वाला एक संवेदनशील मुद्दा इन दिनों फिर से चर्चा में है। राज्य के प्रतिष्ठित कर्मचारी संगठन — छत्तीसगढ़ प्रदेश तृतीय वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ, जिला दुर्ग के अध्यक्ष भानुप्रताप यादव ने अपने ज्ञापन के माध्यम से शासन की उस चुप्पी पर सवाल खड़ा किया है, जो मृत शासकीय कर्मचारियों के परिजनों को दी जाने वाली अनुग्रह राशि की सीमा को बीते दो दशकों से ठंडे बस्ते में डालकर बैठी है।
ज्ञात हो कि वर्तमान में किसी शासकीय सेवक की सेवा काल में मृत्यु होने पर उसके परिजनों को मात्र 50,000/- रुपए तक की अनुग्रह राशि प्रदान किए जाने का प्रावधान है, जो बेसिक पे और ग्रेड पे के छह गुना तक सीमित है। यह नियम उस समय तय किया गया था जब वेतनमान और जीवन यापन की लागत बहुत कम थी। परंतु अब, जब छत्तीसगढ़ के शासकीय सेवकों को सांतवां वेतनमान मिल रहा है, तो ऐसे में यह राशि व्यंग्य जैसी प्रतीत होती है।
मध्यप्रदेश ने बढ़ाया, छत्तीसगढ़ अब भी मौन!
भानुप्रताप यादव ने इस विषय पर कलेक्टर दुर्ग के माध्यम से छत्तीसगढ़ शासन के सामान्य प्रशासन विभाग को ज्ञापन सौंपते हुए जोरदार आग्रह किया है कि मध्यप्रदेश शासन के उदाहरण को अपनाया जाए, जहां हाल ही में 03 अप्रैल 2025 को जारी आदेश के अनुसार अनुग्रह अनुदान की राशि को बढ़ाकर ₹1,25,000/- कर दिया गया है।
यह ध्यान देने योग्य है कि मध्यप्रदेश से ही छत्तीसगढ़ का जन्म वर्ष 2000 में हुआ, और राज्य गठन के बाद से ही यह परंपरा रही है कि मध्यप्रदेश शासन द्वारा लिए गए जनहित के फैसलों को छत्तीसगढ़ में भी लागू किया जाता है।
भानुप्रताप यादव ने अपने ज्ञापन में साफ तौर पर संकेत दिया है कि मध्यप्रदेश में 2025 में पारित पत्र क्रमांक एफ 4-1/2025/नियम/चार दिनांक 03 अप्रैल 2025 को मध्यप्रदेश रि-ऑर्गनाइजेशन एक्ट 2000′ की धारा 61 के तहत लागू किया गया है। ऐसे में अब छत्तीसगढ़ शासन की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी बनती है कि वह भी इस संशोधन को अपनाकर मृत कर्मचारियों के परिजनों के प्रति अपनी संवेदनशीलता दिखाए।
“क्या एक कर्मचारी का जीवन सिर्फ 50,000 का?”
इस ज्ञापन ने एक बार फिर सरकार और समाज के सामने यह कटु प्रश्न खड़ा कर दिया है — “क्या एक शासकीय कर्मचारी का जीवन सिर्फ ₹50,000 का है?”
आज जब महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास जैसी मूलभूत आवश्यकताओं का खर्च लाखों में जा रहा है, तब एक परिवार को अपने पालनकर्ता की मौत के बाद केवल ₹50,000 देकर क्या सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेती है?
संघ ने उठाई मांग:
• भानुप्रताप यादव ने ज्ञापन में तीन मुख्य बिंदुओं को प्रमुखता से उठाया—
• अनुग्रह राशि की सीमा ₹50,000 से बढ़ाकर ₹1,25,000 की जाए।
• मध्यप्रदेश शासन के 03 अप्रैल 2025 के आदेश को मॉडल मानते हुए, छत्तीसगढ़ में तत्काल आदेश पारित हो।
• भविष्य में वेतनमान में बदलाव के साथ-साथ अनुग्रह राशि का स्वतः पुनरीक्षण किया जाए, ताकि यह प्रावधान समयानुकूल और मानवीय बना रहे।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा…
फिलहाल, यह ज्ञापन कलेक्टर दुर्ग के माध्यम से राज्य शासन को भेजा गया है। प्रशासन की ओर से अब तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, परंतु कर्मचारी संघों में इस मुद्दे को लेकर बड़ी बेचैनी और गंभीरता देखी जा रही है।
यदि शासन इस विषय को भी महज एक ‘कागजी ज्ञापन’ समझकर दरकिनार करता है, तो यह शासकीय कर्मचारियों की आत्मा पर प्रहार के समान होगा।
सामाजिक समर्थन की भी अपील!
भानुप्रताप यादव ने सिर्फ शासन से नहीं, समाज और मीडिया से भी अपील की है कि वे इस मुद्दे को प्रमुखता दें। क्योंकि यह केवल कर्मचारी वर्ग का मामला नहीं, बल्कि हर उस परिवार का मामला है जो अपने बेटे, पति या पिता को खो बैठता है और बाद में सरकार से एक ‘औपचारिक सहायता राशि’ की प्रतीक्षा करता है।
अब और देर नहीं!
छत्तीसगढ़ शासन के सामने यह एक मौका है कि वह दिखाए — वह सिर्फ कर्मचारियों से काम नहीं लेता, बल्कि उनके जीवन और उनके परिवारों की गरिमा की रक्षा भी करता है।
अब देखना यह होगा कि शासन इस मानवीय पहलु को संज्ञान में लेकर तुरंत कार्यवाही करता है या फिर यह मुद्दा भी अन्य फाइलों की तरह धूल फांकता रह जाएगा।













