CG Big Breaking गरियाबंद युक्तियुक्तिकरण महा घोटाला part-1″कहीं मातावले ‘बलि का बकरा’ तो नहीं? — छुरा के BEO की गलती पर बवाल क्या साजिश की स्क्रिप्ट ऊपर से लिखी गई? D.E.O. गरियाबंद क्यों अब तक सुरक्षित? युक्तियुक्तकरण घोटाले में बड़ा खुलासा!”
Gariyaband/छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिला में शिक्षा विभाग का एक और घोटाला सामने आया है, जिसमें शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण (Rationalization) के नाम पर योजनाबद्ध अव्यवस्था, पक्षपात और शासन को गुमराह करने का खुलासा हुआ है। इस खबर से गरियाबंद की शिक्षा व्यवस्था की जाड़ों को हिला के रख दिया है शिक्षकों के युक्तियुक्तिकरण के नाम पर जो अव्यवस्था फैली हुई,वह केवल प्रशासनिक भूल नहीं,बल्कि एक सुनियोजित प्रशासनिक अपराध की अपराध की तरह सामने आ रही है इस पूरे मामले में विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) छुरा, के. एल. मतावले के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। पर बड़ा सवाल यह उठता है—क्या सिर्फ मतावले ही दोषी हैं, या फिर जिला शिक्षा अधिकारी (D.E.O.) ए. के. सारस्वत गरियाबंद की भूमिका पर भी सवाल उठने चाहिए?
“युक्तियुक्तकरण” या “अयुक्तीयुक्तकरण”?
छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए राज्य सरकार द्वारा निर्धारित की गई युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया, जिसमें शिक्षकों की आवश्यकता और उपलब्धता के आधार पर तैनाती सुनिश्चित की जानी थी, एक घोटाले का रूप ले चुकी है। विकासखंड छुरा में इस प्रक्रिया को जिस लापरवाही और धूर्तता से अंजाम दिया गया, वह केवल एक अधिकारी की गलती नहीं मानी जा सकती।
गरियाबंद छुरा के बी.ई.ओ. के. एल. मतावले पर आरोप है कि उन्होंने अतिशेष शिक्षकों की सूची में जानबूझकर वरिष्ठता का उल्लंघन किया, अतिथि शिक्षकों की गिनती में गलत जानकारी दी, और स्कूलों की वास्तविक स्थिति को छिपाकर जिला स्तरीय समिति को भ्रमित किया। नतीजा – शिक्षकों में भ्रम, अव्यवस्था, और शासन की छवि को गहरा धक्का।
“सिर्फ बीईओ नहीं, डीईओ भी जवाबदेह!”
गरियाबंद में अब यहां सवाल यह उठता है कि क्या इतनी बड़ी अनियमितता को जिला शिक्षा अधिकारी की जानकारी के बिना अंजाम दिया जा सकता था?
• क्या जिला शिक्षा अधिकारी ए.के. सारस्वत गरियाबंद इस पूरे घटनाक्रम से अनजान थे?
• यदि हां, तो यह उनकी प्रशासनिक अक्षमता को दर्शाता है।
• यदि नहीं, तो यह उनकी मौन सहमति या मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
D.E.O. की भूमिका क्यों संदिग्ध?”
लेकिन क्या इतना बड़ा घोटाला अकेले एक BEO की करतूत हो सकती है? क्या जिला शिक्षा अधिकारी (D.E.O.) गरियाबंद इस सारे घटनाक्रम से बेखबर थे?
• D.E.O. ही जिला युक्तियुक्तकरण समिति के अध्यक्ष होते हैं।
• हर प्रस्तावित बदलाव उन्हीं की अनुमति और हस्ताक्षर से अमल में लाया जाता है।
• स्कूलों के डाटा, शिक्षकों की संख्या और आवश्यकता का फाइनल सत्यापन उन्हीं के जिम्मे होता है।
• ऐसे में यदि D.E.O. ने अनदेखी की, तो यह उनकी अक्षमता है।
• और यदि सब कुछ जानते हुए भी चुप रहे, तो यह उनकी सहमति या मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
“काउंसलिंग या प्रहसन?”
गरियाबंद जिले भर में काउंसलिंग प्रक्रिया का जो हाल रहा, वह ‘प्रक्रिया’ कम और ‘तमाशा’ ज़्यादा लगा।
किसे बचा रही है गरियाबंद जिला टीम?”
जब शिक्षकों ने खुलकर इन गड़बड़ियों की शिकायत की, दस्तावेजों के प्रमाण दिए, तब भी जिला स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। काउंसलिंग टीम – जो कि D.E.O. की निगरानी में काम करती है – ने शिकायतों को या तो दरकिनार किया या बहाना बना कर टाल दिया।
जिला स्तरीय युक्तियुक्तकरण समिति के अध्यक्ष के तौर पर D.E.O. की जिम्मेदारी बनती है कि प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच करें, उनके सत्यापन के बाद ही काउंसलिंग प्रक्रिया आगे बढ़ाएं। लेकिन जब शिक्षक खुद सामने आकर जिला समिति को गलतियों की ओर इशारा कर रहे हैं, तब यह स्पष्ट होता है कि D.E.O. ने या तो प्रक्रिया को गंभीरता से नहीं लिया या उन्होंने जानबूझकर आंखें मूंद लीं।
“काउंसलिंग बनी तमाशा: शिक्षा व्यवस्था पर कलंक”छुरा के विभिन्न स्कूलों से मिले उदाहरण चौंकाने वाले हैं:
• प्राथमिक शाला टिकरापारा व सतनामीपारा केस में वरिष्ठता को दरकिनार कर वरिष्ठ शिक्षक को युक्तियुक्त किया गया।
• माध्यमिक शाला सांकरा में पाँच शिक्षक होने के बावजूद उन्हें ‘अतिशेष’ नहीं माना गया।
• सेम्हरा, घटकर्रा और पंक्तिया जैसे स्कूलों में अतिथि शिक्षकों की गिनती में भी भारी गड़बड़ी पाई गई।
• हायर सेकंडरी विद्यालय पेण्ड्रा में संचालित वाणिज्य संकाय को नकारते हुए वहाँ कार्यरत व्याख्याता को अतिशेष घोषित किया गया।
• यह सारी त्रुटियाँ सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि एक सोची-समझी प्रशासनिक साजिश की बू देती हैं।
“शासन की मंशा को ठेंगा!”
छत्तीसगढ़ सरकार की मंशा है कि हर शिक्षक अपने कार्यस्थल पर न्याय के साथ पदस्थ हो। बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले। लेकिन छुरा जैसे ब्लॉक में जिस तरह से शिक्षकों के साथ खिलवाड़ हुआ है, वह मंशा को नकारने के बराबर है। शिक्षकों को ‘गिनती की वस्तु’ बना दिया गया है, जिनकी प्रतिष्ठा और भविष्य अधिकारियों के मनमाने निर्णय पर टिका है।
“जवाब दो डीईओ साहब!”
गरियाबंद जिला में जब युक्तियुक्तकरण की समूची रूपरेखा BEO से लेकर D.E.O. तक की निगरानी में बनती है, तो केवल बीईओ को दोषी मानना पूरी व्यवस्था के साथ अन्याय है। क्या D.E.O. की कोई जवाबदेही नहीं है?
• क्या डीईओ गरियाबंद ने कभी दस्तावेजों का सत्यापन किया?
• क्या उन्होंने शिक्षकों के प्रत्यक्ष विरोध और शिकायतों को गंभीरता से लिया?
• क्या कांउसलिंग की अव्यवस्था में उनकी भूमिका की कोई समीक्षा की गई?
यदि इन सभी सवालों का जवाब ‘नहीं’ है, तो जिला शिक्षा अधिकारी गरियाबंद भी इस घोटाले के भागीदार हैं। और यदि उन्होंने सब कुछ जानते हुए भी चुप्पी साधी, तो यह और गंभीर मामला बनता है।
“बलि का बकरा मतावले, असली सूत्रधार कौन?”
ऐसे अनेक प्रशासनिक मामलों में देखा गया है कि जब ऊपरी स्तर की लापरवाही को छिपाना होता है, तब निचले स्तर के अधिकारी को ‘बलि का बकरा’ बना दिया जाता है। क्या इस बार भी वही हो रहा है?
यदि मतावले ने जानबूझकर गलत जानकारी दी, तो उनकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
लेकिन यदि जिला स्तरीय समिति और D.E.O. की मौन स्वीकृति या सहमति इस प्रक्रिया में शामिल रही है, तो अकेले मतावले को सजा देना न्याय नहीं बल्कि राजनीतिक ड्रामा बन जाएगा।
“मांग: उच्चस्तरीय जांच समिति गठित हो!”
इस पूरे मामले में अब जरूरत है एक स्वतंत्र और निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच की। केवल मतावले को सस्पेंड कर देना इस सिस्टम की सड़न को नहीं रोक सकता। जिले के शीर्ष अधिकारियों से लेकर युक्तियुक्तकरण समिति के प्रत्येक सदस्य की भूमिका की समीक्षा आवश्यक है।
https://jantakitakat.com/2025/06/08/cg-breaking12-साल-का-इंतज़ार-अब-होगा-न/
“यदि प्रशासन शिक्षा को राजनीति की तरह चलाएगा, तो स्कूल भी सत्ता की मंडी बन जाएंगे।”
अब समय है कार्यवाही का — केवल मतावले पर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर।
जल्द ही आपके पास गरियाबंद जिला के युक्ति युक्तिकरण के महा घोटाला part-2 आएंगे!