“संलग्नीकरण का ‘साइलेंट स्कैम’! स्वास्थ्य विभाग में नियमों की धज्जियां, क्या अब गिरेगी कार्रवाई की गाज या फिर मिलेगा संरक्षण?”
शासन के स्पष्ट आदेश के बावजूद सैकड़ों कर्मचारियों का वर्षों से संलग्नीकरण, संभागीय संयुक्त संचालक और CMHO पर उठे बड़े सवाल
रायपुर/बिलासपुर/छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग में इन दिनों एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने शासन की नीतियों और विभागीय अनुशासन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शासन द्वारा बार-बार स्पष्ट निर्देश जारी करने के बावजूद प्रदेश के कई जिलों में चिकित्सकों और कर्मचारियों का बड़े पैमाने पर संलग्नीकरण (अटैचमेंट) किया गया है। आरोप है कि संभागीय संयुक्त संचालक स्वास्थ्य सेवाएं और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) स्वयं उन आदेशों का उल्लंघन कर रहे हैं जिन्हें लागू करवाने की जिम्मेदारी उन्हीं पर है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या राज्य शासन इस पूरे मामले में दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करेगा, या फिर हमेशा की तरह दूसरे हाथ से संरक्षण देकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।
शासन का स्पष्ट आदेश, फिर भी नियमों की अनदेखी!
छत्तीसगढ़ शासन के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ने वर्षों पहले एक स्थायी निर्देश जारी किया था जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि चिकित्सा अमले का अन्यत्र संलग्नीकरण अनुशासनहीनता माना जाएगा। आदेश में यह भी साफ किया गया कि सामान्य परिस्थितियों में किसी भी चिकित्सक या कर्मचारी को दूसरे स्थान पर संलग्न नहीं किया जा सकता।
यदि किसी विशेष परिस्थिति में संलग्नीकरण आवश्यक हो, तो वह भी अधिकतम 7 दिन की अल्प अवधि के लिए ही किया जा सकता है। वहीं यदि किसी कर्मचारी को 15 दिन से अधिक अवधि के लिए संलग्न करना आवश्यक हो तो इसका निर्णय केवल शासन स्तर पर ही लिया जाएगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शासन ने किसी भी जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को 7 दिन से अधिक अवधि के लिए संलग्नीकरण करने का अधिकार नहीं दिया है, जबकि संभागीय संयुक्त संचालक स्वास्थ्य सेवाएं को तो संलग्नीकरण करने का अधिकार ही नहीं दिया गया है।
फिर भी संभाग में सैकड़ों कर्मचारियों का संलग्नीकरण!
सूत्रों के अनुसार बिलासपुर संभाग में पिछले कई वर्षों से नियमों को दरकिनार करते हुए बड़े पैमाने पर संलग्नीकरण का खेल चलता रहा है। आरोप है कि संभागीय संयुक्त संचालक स्वास्थ्य सेवाएं द्वारा ही विभिन्न जिलों के बीच 200 से 300 कर्मचारियों को संलग्न किया गया।
चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से केवल 40 से 45 कर्मचारियों का ही कागजों में संलग्नीकरण समाप्त किया गया है, जबकि बाकी कर्मचारी आज भी अपने मूल पदस्थापन स्थल से अलग स्थानों पर कार्य कर रहे हैं।
यह स्थिति न केवल शासन के आदेशों का खुला उल्लंघन है बल्कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं भी प्रभावित हो रही हैं।
जिला कार्यालय बना ‘संलग्नीकरण का अड्डा’
आरोप केवल संभागीय स्तर तक सीमित नहीं हैं। जिला स्तर पर भी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी द्वारा नियमों को ताक पर रखकर बड़ी संख्या में कर्मचारियों को संलग्न किया गया है।
बताया जा रहा है कि जिले में 50 से 100 कर्मचारियों का संलग्नीकरण किया गया, जिनमें से 21 चिकित्सक और विभिन्न संवर्ग के कर्मचारी जिला कार्यालय में ही संलग्न हैं।
इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं —
1.डॉ. प्रमोद तिवारी
2.डॉ. रेणुका सेमुवल
3.डॉ. सौरभ शर्मा
4.डॉ. जोगी
5.विजय सिंह (नेत्र सहायक)
6.आर.के. शर्मा (नेत्र सहायक)
7.बद्री चौहान (लेखपाल)
8.प्रवीण शर्मा (RHO)
9.मिर्जा कासिम बेग (RHO)
10.भानु राठौर (RHO)
11.शशांक वर्मा (लिपिक)
12.श्यामू सोनी (लिपिक)
13.शिशिर चेरियन (लिपिक)
14.थापा (लिपिक)
15.अमित ठाकुर (ड्राइवर)
16.पाटले (चपरासी)
17.डोंगरे (चपरासी)
18.मनीष साहू (चपरासी)
19चित्रलेखा पांडे (ANM)
इसके अलावा मलेरिया कार्यालय में भी दो सुपरवाइजर और दो ग्रामीण चिकित्सा सहायकों को संलग्न किया गया है।
नियमों में दंड का प्रावधान, फिर भी नहीं हुई कार्रवाई!
स्वास्थ्य विभाग के स्थायी निर्देश में स्पष्ट लिखा गया है कि यदि कोई चिकित्सक या कर्मचारी अपने मूल पदस्थापन से हटाकर अन्यत्र संलग्न किया जाता है, तो इसके लिए आदेश जारी करने वाले अधिकारी और संबंधित कार्यालय प्रमुख के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
साथ ही जिस संस्था से या जिस संस्था में संलग्नीकरण किया गया है और वेतन आहरण करने वाले आहरण-संवितरण अधिकारी पर भी कार्रवाई का प्रावधान है। इतना ही नहीं, संलग्न अधिकारी या कर्मचारी भी दंड के भागी होंगे।
इसके बावजूद वर्षों से यह व्यवस्था चलती रही और किसी भी अधिकारी पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
विधानसभा तक पहुंचा मामला!
अब इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। विधानसभा में भी संलग्नीकरण समाप्त करने को लेकर चर्चा हुई और स्वास्थ्य मंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिए कि नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए।
इसके बाद स्वास्थ्य सेवाएं आयुक्त सह संचालक द्वारा 12 मार्च 2026 को आदेश जारी कर सभी संलग्नीकरण समाप्त करने का निर्देश दिया गया।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आदेश वास्तव में जमीन पर लागू होगा या फिर यह भी सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगा।
उठ रहे हैं बड़े सवाल!
पूरे मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं —
•क्या प्रदेश में किए गए सभी संलग्नीकरण आदेश वास्तव में समाप्त होंगे?
•क्या सभी चिकित्सक और कर्मचारी अपने मूल पदस्थापन स्थल पर लौटेंगे?
•क्या नियमों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई होगी?
•या फिर विधानसभा में स्वास्थ्य मंत्री की घोषणा और 12 मार्च 2026 का आदेश केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा?
स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ रहा असर!
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के अनियंत्रित संलग्नीकरण का सबसे बड़ा नुकसान ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों को होता है। जहां डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों की पहले ही कमी है, वहां से कर्मचारियों को जिला मुख्यालय या अन्य जगहों पर संलग्न कर दिया जाता है।
इससे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र खाली हो जाते हैं और मरीजों को उचित इलाज नहीं मिल पाता।
अब निगाहें शासन की कार्रवाई पर!
फिलहाल पूरा मामला शासन के सामने है और स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों पर निगाहें टिकी हुई हैं। यदि वास्तव में नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाता है तो यह स्वास्थ्य व्यवस्था में अनुशासन स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम होगा।
लेकिन यदि इस बार भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह संदेश जाएगा कि स्वास्थ्य विभाग में नियमों से ज्यादा प्रभाव और संरक्षण का महत्व है।
अब देखना यह होगा कि शासन इस “संलग्नीकरण के खेल” पर लगाम लगाता है या फिर यह सिलसिला पहले की तरह जारी रहता है।












