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August 29, 2025 10:50 pm

मोदी की गारंटी… अब कर्मचारियों की बारी”! 20 साल से इंतजार, अब आर-पार की लड़ाई: रायगढ़ की एन.एच.एम. बहनों ने खोला मोर्चा!

मोदी की गारंटी… अब कर्मचारियों की बारी”!
20 साल से इंतजार, अब आर-पार की लड़ाई: रायगढ़ की एन.एच.एम. बहनों ने खोला मोर्चा!

Raigarh/छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले की सड़कें एक बार फिर आक्रोश और आंसुओं की गवाही देने जा रही हैं। यहां की एन.एच.एम. (राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन) की महिलाएं – जो वर्षों से समाज की निस्वार्थ सेवा कर रही हैं – अब खुद को लाचार महसूस कर रही हैं। हाथों में तख्तियां, आंखों में आंसू और दिलों में उम्मीदें लेकर वे एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री को संबोधित करती पाती लिख रही हैं।

“मोदी की गारंटी” — यह वाक्य अब एक सवाल बन चुका है इन बहनों के लिए, जिन्होंने कोरोना जैसी वैश्विक महामारी में जान हथेली पर रखकर लोगों की सेवा की। लेकिन अब वे खुद सवाल कर रही हैं: क्या हमारी सेवा की कोई गारंटी नहीं?

बेरुखी की कहानी, जो अब विद्रोह में बदल रही!
20 वर्षों से अधिक का लंबा संघर्ष, जिसमें उन्होंने न तो मौसम देखा, न हालात। गाँव-गाँव जाकर टीकाकरण, पोषण, मातृ स्वास्थ्य और संक्रामक रोगों के खिलाफ जंग लड़ने वाली ये बहनें अब खुद सरकार की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोल चुकी हैं।

155 बार से अधिक ज्ञापन सौंपे गए — मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री, वित्त मंत्री और संबंधित अधिकारियों को। लेकिन परिणाम? शब्दों की चाशनी और आश्वासनों की घुट्टी, न कोई ठोस नीति, न समाधान।

अब आर-पार की लड़ाई: 18 अगस्त से अनिश्चितकालीन हड़ताल!
एन.एच.एम. कर्मचारी संघ ने ऐलान कर दिया है — अब कोई ज्ञापन नहीं, कोई इंतजार नहीं! 18 अगस्त 2025 से जिले के समस्त एन.एच.एम. कर्मचारी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर रहेंगे। और सबसे चौंकाने वाली बात – आपातकालीन सेवा में कार्यरत कर्मचारी भी इस हड़ताल में शामिल होंगे।

स्वास्थ्य सेवाएं बाधित होंगी। ग्रामीण क्षेत्रों में टीकाकरण, डिलीवरी, नवजात देखरेख, मातृ सेवा, जननी एक्सप्रेस संचालन, संक्रामक रोग नियंत्रण – सब कुछ ठप पड़ सकता है।

•10 सूत्रीय मांगे – न्याय की पुकार या आखिरी चेतावनी?

• संविलियन/स्थायीकरण – 20 वर्षों की सेवा के बाद भी ठेका? क्या यह न्याय है?

• पब्लिक हेल्थ कैडर – स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा मजबूत क्यों नहीं हो रहा?

• ग्रेड-पे निर्धारण – मेहनत का मूल्य आखिर कब तय होगा?

• कार्य मूल्यांकन पारदर्शिता – क्या ईमानदार सेवा की कोई मान्यता नहीं?

• 27% लंबित वेतन वृद्धि – महंगाई बढ़ी, वेतन वहीं का वहीं?

• नियमित भर्ती में आरक्षण – अनुभव का कोई मोल नहीं?

• अनुकम्पा नियुक्ति – बलिदान का बदला बेरोजगारी क्यों?

• मेडिकल अवकाश सुविधा – जो दूसरों का इलाज करते हैं, खुद के लिए राहत क्यों नहीं?

• स्थानांतरण नीति – मनमानी और पक्षपात कब बंद होगा?

• ₹10 लाख की कैशलेस स्वास्थ्य सुविधा – स्वास्थ्यकर्मी बीमार पड़ें तो उनके पास विकल्प क्या?

• भावनात्मक पाती: मोदी जी, क्या आपकी गारंटी में हम नहीं आते?

इन पातियों में केवल मांगें नहीं, भावनाएं भी झलक रही हैं। एक बहन ने लिखा है:

“मान्यवर, आपने कहा था सबका साथ, सबका विकास। हमने सबका साथ निभाया – गांव की गोद में, शहर की सड़कों पर, बीमार की सांस में। अब हमारा विकास कब होगा?”

राजनीति या संवेदनशीलता – सरकार की अगली चाल पर टिकी हैं उम्मीदें!
अब सवाल यह है कि क्या सरकार इस बार भी आश्वासन की चादर ओढ़कर सो जाएगी या इन बहनों की पीड़ा पर संवेदनशील निर्णय लेगी?

एन.एच.एम. महिला कर्मचारी संघ की अध्यक्ष ने प्रेस वार्ता में कहा –
“हमारे बच्चे भूखे हैं, हमारे घरों में आंसू हैं, लेकिन हमारे इरादे मजबूत हैं। जब तक न्याय नहीं मिलता, तब तक हड़ताल जारी रहेगी।”

  सरकार से पूछे जाने वाले 5 सीधे सवाल!            

• 20 वर्षों की सेवा के बाद भी स्थायीत्व क्यों नहीं?                                                                 

• क्या कोरोना योद्धाओं की कोई कीमत नहीं?

•अगर 155 ज्ञापन पर्याप्त नहीं, तो और क्या चाहिए?

•क्या छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था इन कर्मचारियों के बिना चल पाएगी?

•”मोदी की गारंटी” क्या केवल चुनावी नारा था?

जनता की चिंता – इलाज कहां जाएगा?
जहां कर्मचारी आंदोलन के मूड में हैं, वहीं आम नागरिकों के मन में चिंता गहराती जा रही है। कई गांवों में केवल एन.एच.एम. बहनें ही स्वास्थ्य सेवा की अंतिम उम्मीद हैं। हड़ताल का सीधा असर गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं, वृद्ध जनों और बीमार नागरिकों पर पड़ेगा।

एकता की मिसाल – पूरे जिले के कर्मचारी साथ!
यह हड़ताल किसी एक ब्लॉक या किसी एक विभाग की नहीं। यह एकजुटता की तस्वीर है। नर्सिंग स्टाफ, मितानिन ट्रेनर्स, एएनएम, लैब टेक्नीशियन, मल्टीपर्पज वर्कर, डाटा एंट्री ऑपरेटर – सभी मिलकर मोर्चा संभालने जा रहे हैं।

अब समय है निर्णय का, नहीं तो…छत्तीसगढ़ की सरकार के सामने अब दो ही विकल्प हैं !

• संवाद करके समाधान निकाले,

• या फिर देखें कि जब फ्रंटलाइन वॉरियर्स पीछे हटते हैं तो स्वास्थ्य तंत्र कैसे चरमराता है!

जनता, मीडिया, और राजनीतिक नेतृत्व – सबकी नजरें अब इस संघर्ष पर हैं। क्या सरकार समय रहते निर्णय लेगी? या फिर यह आंदोलन और भी विकराल रूप धारण करेगा?

हमारी अपील – हर आवाज मायने रखती है!
हम नागरिकों से अपील करते हैं कि इन बहनों की इस न्यायिक लड़ाई में उनके साथ खड़े हों। यह केवल उनकी लड़ाई नहीं, पूरे समाज के स्वास्थ्य अधिकारों की लड़ाई है।

अगर आपने कभी किसी एएनएम या मितानिन बहन को अपने घर में इलाज करते देखा है, तो आज उनकी आवाज बनिए। क्योंकि जो हर बीमारी का इलाज करती हैं, आज वही खुद अनदेखी की बीमारी से पीड़ित हैं।

स्वास्थ्य कर्मियों को सम्मान दो, समाज को स्वस्थ बनाओ”

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