April 3, 2026 8:32 pm

“महासमुंद में धान के ढेर में दफन हुआ करोड़ों का सच!”अमरकोट उपार्जन केंद्र में 1.65 करोड़ का घोटाला, फरार आरोपी आखिरकार पुलिस के शिकंजे में”

“महासमुंद में धान के ढेर में दफन हुआ करोड़ों का सच!”अमरकोट उपार्जन केंद्र में 1.65 करोड़ का घोटाला, फरार आरोपी आखिरकार पुलिस के शिकंजे में”

महासमुंद /छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले से एक ऐसा चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि किसानों की मेहनत और सरकारी तंत्र की पारदर्शिता पर भी गहरा धब्बा लगा दिया है। अमरकोट धान उपार्जन केंद्र में करोड़ों रुपये के गबन और धोखाधड़ी के इस मामले में आखिरकार लंबे समय से फरार चल रहे दो मुख्य आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

यह मामला किसी साधारण लापरवाही का नहीं, बल्कि सुनियोजित तरीके से सरकारी धन को चूना लगाने का प्रतीक बन चुका है।

“धान की बोरियों में छुपा था घोटाले का काला खेल”!

घटना की शुरुआत 20 मई 2025 को हुई, जब जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्यादित रायपुर के कर्मचारी अमृत लाल जगत ने अमरकोट धान उपार्जन केंद्र में भारी अनियमितताओं की शिकायत दर्ज कराई।

धान खरीदी वर्ष 2024-25 के भौतिक सत्यापन के दौरान जब बोरियों की गिनती की गई, तो सामने आया कि कुल 14,221 बोरियों के मुकाबले 11,416 बोरी धान कम पाया गया।यानी कागजों में जो धान मौजूद था, वह जमीन पर गायब था!

अगर इसे वजन में बदला जाए, तो यह आंकड़ा 4566.40 क्विंटल तक पहुंचता है। प्रति क्विंटल 3100 रुपये की दर से यह घोटाला सीधे-सीधे 1 करोड़ 65 लाख 80 हजार 908 रुपये का बनता है।

“जांच में खुली पोल, तीन कर्मचारी निकले दोषी”!

जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, इस पूरे घोटाले की परतें खुलती चली गईं।अमरकोट उपार्जन केंद्र के प्रभारी कार्तिकेश्वर यादव, बारदाना प्रभारी तेजराम पटेल और कंप्यूटर ऑपरेटर राजेंद्र पटेल को इस पूरे फर्जीवाड़े का जिम्मेदार पाया गया।तीनों पर थाना सरायपाली में धोखाधड़ी और गबन की धाराओं के तहत अपराध दर्ज किया गया।यह मामला सिर्फ आंकड़ों का नहीं था, बल्कि इसमें सरकारी व्यवस्था के भीतर बैठे लोगों द्वारा विश्वासघात की कहानी छिपी थी।

“एक ने किया आत्मसमर्पण, दो बने पुलिस के सिरदर्द”!

जांच के दबाव में आकर आरोपी राजेंद्र पटेल ने 2 फरवरी 2026 को न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया।लेकिन बाकी दो आरोपी—कार्तिकेश्वर यादव और तेजराम पटेल—लगातार फरार बने रहे।

पुलिस ने उनकी तलाश में कई बार दबिश दी, लेकिन हर बार वे पुलिस को चकमा देने में कामयाब रहे।यह फरारी अपने आप में कई सवाल खड़े करती है—क्या उन्हें किसी का संरक्षण मिल रहा था? क्या यह घोटाला अकेले तीन लोगों का था या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था?

“तकनीकी जांच बनी गेम चेंजर, पुलिस ने दबोचा”!

आखिरकार सरायपाली पुलिस ने तकनीकी जांच का सहारा लिया। मोबाइल लोकेशन, कॉल डिटेल और अन्य तकनीकी माध्यमों से आरोपियों की लोकेशन का पता लगाया गया।03 अप्रैल 2026 को पुलिस ने एक सटीक कार्रवाई करते हुए दोनों फरार आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया।

गिरफ्तार आरोपी हैं:

•कार्तिकेश्वर यादव (56 वर्ष), निवासी मुंधा,

•तेजराम पटेल (33 वर्ष), निवासी चकरदा,

दोनों को विधिवत गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर भेज दिया गया है।

“प्रशासनिक लापरवाही या सुनियोजित साजिश?”!

इस पूरे मामले ने एक बार फिर सरकारी धान खरीदी प्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।धान उपार्जन केंद्र, जो किसानों की उपज का सुरक्षित और पारदर्शी खरीद केंद्र माना जाता है, वही अगर भ्रष्टाचार का अड्डा बन जाए तो यह व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता मानी जाएगी।

•क्या इतने बड़े पैमाने पर धान की हेराफेरी बिना उच्च स्तर की मिलीभगत के संभव है?

•क्या नियमित ऑडिट और निगरानी तंत्र पूरी तरह फेल हो गया था?

“किसानों की मेहनत पर डाका”!

यह घोटाला केवल सरकारी खजाने की क्षति नहीं है, बल्कि उन किसानों के साथ भी अन्याय है, जिन्होंने दिन-रात मेहनत कर अपनी फसल तैयार की।उनकी उपज का सही हिसाब-किताब रखने की जिम्मेदारी जिन लोगों पर थी, वही लोग इस घोटाले के मुख्य किरदार बन गए।

अब जबकि सभी आरोपी पुलिस की गिरफ्त में हैं, इस मामले में आगे की जांच और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।यह देखना जरूरी होगा कि:

•क्या इस घोटाले में और भी लोग शामिल हैं?

•क्या यह एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा है?

•और सबसे बड़ा सवाल—क्या भविष्य में ऐसे घोटालों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे?

विश्वास का संकट”!

अमरकोट धान उपार्जन केंद्र का यह मामला केवल एक घोटाला नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र में विश्वास के संकट का प्रतीक बन चुका है।जहां एक ओर सरकार किसानों के हित में योजनाएं चला रही है, वहीं दूसरी ओर ऐसे मामले उन प्रयासों पर पानी फेरते नजर आते हैं।

सरायपाली पुलिस की इस कार्रवाई ने यह जरूर साबित कर दिया है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं, लेकिन अब जरूरत है पूरे सिस्टम को मजबूत करने की—ताकि भविष्य में कोई भी “धान के ढेर में करोड़ों का सच” छुपा न सके।

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