मलांजकुड़ुम जलप्रपात बना मौत का झरना: रायपुर के युवक की दर्दनाक मौत, सुरक्षा इंतज़ामों पर उठे गंभीर सवाल”!
Kanker/छत्तीसगढ़ के मशहूर मलांजकुड़ुम जलप्रपात में एक बार फिर मौत ने दस्तक दी। शनिवार को रायपुर से सैर-सपाटे के लिए पहुंचे छह दोस्तों का ग्रुप उस वक्त चीखों में बदल गया, जब 24 वर्षीय युवक गोपाल चंद्राकर का पैर फिसलकर मौत की गहराई में चला गया। इस दर्दनाक हादसे ने न केवल परिवार और दोस्तों को सदमे में डाल दिया, बल्कि पूरे प्रदेश में पर्यटक स्थलों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मस्ती से मातम तक… कुछ ही पलों में बदल गया नज़ारा!
शनिवार की दोपहर रायपुर निवासी गोपाल चंद्राकर अपने पांच दोस्तों के साथ मलांजकुड़ुम वाटरफॉल घूमने आया था। बारिश से झरने का पानी उफान पर था और पत्थर फिसलन भरे। दोस्तों के बीच सेल्फी और हंसी-मजाक का सिलसिला चल ही रहा था कि गोपाल रोमांच में डेंजर जोन की तरफ बढ़ गया। कुछ ही सेकंड में उसका पैर चिकने पत्थर पर फिसला और वह सीधा जलप्रपात की गहराई में जा गिरा। देखते ही देखते मस्ती का माहौल चीख-पुकार और मातम में बदल गया।
रातभर अंधेरे ने रोका रेस्क्यू, सुबह मिला शव!
हादसे के तुरंत बाद उसके दोस्तों ने पुलिस को सूचना दी। मौके पर पुलिस और स्थानीय लोग पहुंचे, लेकिन गहराई और अंधेरे के कारण बचाव अभियान शुरू नहीं हो सका। पूरा इलाका मौत की खामोशी में डूबा रहा। रविवार की सुबह नगर सेना और गोताखोरों की टीम ने अथक प्रयास कर युवक के शव को बाहर निकाला। जब गोपाल का निर्जीव शरीर बाहर आया, तो दोस्तों और परिजनों की आंखों से आंसुओं की बाढ़ फूट पड़ी।
हर साल मौतें, फिर भी प्रशासन लापरवाह!
यह पहली बार नहीं है जब मलांजकुड़ुम जलप्रपात किसी की जान ले रहा है। साल 2022 में भी यहां दो युवकों की मौत हो चुकी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि हर साल यहां हादसे होते हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से सुरक्षा को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। न तो चेतावनी बोर्ड स्पष्ट रूप से लगे हैं, न ही पर्याप्त सुरक्षा गार्ड तैनात होते हैं। नतीजा यह है कि रोमांच और एडवेंचर की तलाश में आने वाले पर्यटक अक्सर अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं।
पर्यटन स्थल या मौत का जाल?
छत्तीसगढ़ सरकार पर्यटन को बढ़ावा देने के बड़े-बड़े दावे करती है। मगर जब पर्यटक स्थलों पर सुरक्षा इंतज़ाम नदारद हों, तो यह सवाल उठना लाजमी है कि पर्यटन विभाग आखिर कर क्या रहा है? मलांजकुड़ुम जैसे खूबसूरत झरने, जहां रोजाना सैकड़ों सैलानी पहुंचते हैं, वहां कोई सुरक्षा घेरा नहीं, चेतावनी पट्टिकाएं धुंधली पड़ी हैं और डेंजर जोन में जाने से रोकने वाला कोई नहीं। ऐसे में यह प्राकृतिक सुंदरता अब “मौत का जाल” बनती जा रही है।
स्थानीय लोगों का गुस्सा!
हादसे के बाद स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों में गुस्सा है। उनका कहना है कि प्रशासन केवल हादसों के बाद औपचारिक बयान देकर चुप बैठ जाता है। अगर समय रहते सुरक्षा इंतज़ाम किए गए होते तो आज गोपाल चंद्राकर की जान बचाई जा सकती थी। ग्रामीणों ने मांग की है कि झरने के खतरनाक हिस्सों में बैरिकेडिंग की जाए, सुरक्षा गार्ड तैनात हों और चेतावनी पट्टिकाएं बड़े अक्षरों में लगाई जाएं।
परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़!
गोपाल चंद्राकर अपने परिवार का होनहार बेटा था। दोस्तों का कहना है कि वह बेहद मिलनसार और जिंदादिल स्वभाव का था। उसकी अचानक हुई मौत से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। मां का कहना है, “हमने अपने बेटे को घूमने भेजा था, ये नहीं सोचा था कि वो कभी लौटकर ही नहीं आएगा।”
हादसों से सबक क्यों नहीं लेता सिस्टम?
हर साल यहां हादसे होते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स और जनाक्रोश के बाद भी न तो प्रशासन जागता है, न ही पर्यटन विभाग। सवाल यह उठता है कि क्या सरकार किसी और बड़ी त्रासदी का इंतज़ार कर रही है? आखिर कब तक खूबसूरत पर्यटन स्थल बदइंतजामी की वजह से पर्यटकों की कब्रगाह बनते रहेंगे?
मलांजकुड़ुम जलप्रपात अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, लेकिन अब यह खूबसूरती भय का प्रतीक बनती जा रही है। गोपाल चंद्राकर की मौत केवल एक हादसा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की लापरवाही का परिणाम है। यदि अब भी प्रशासन नहीं जागा, तो आने वाले दिनों में और कितने गोपाल इस मौत की गहराई में समा जाएंगे, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
अब वक्त आ गया है कि सरकार और पर्यटन विभाग महज़ औपचारिक बयानबाज़ी से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाएं, ताकि रोमांच की तलाश में आने वाले सैलानियों को अपनी जान गंवाकर कीमत न चुकानी पड़े।