March 18, 2026 4:12 pm

बिलासपुर संलग्नीकरण खत्म करने का फरमान हवा में, अफसरशाही का अपना संविधान! ” ”संभागीय संयुक्त संचालक स्वास्थ्य से CMHO तक—मंत्री के आदेशों को दिखाया ठेंगा!”

बिलासपुर संलग्नीकरण खत्म करने का फरमान हवा में, अफसरशाही का अपना संविधान! ” ”संभागीय संयुक्त संचालक स्वास्थ्य से CMHO तक—मंत्री के आदेशों को दिखाया ठेंगा!”

Bilaspur/छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिला से स्वास्थ्य व्यवस्था की एक ऐसी तस्वीर सामने आ रही है, जिसने शासन के दावों और जमीनी हकीकत के बीच गहरी खाई को उजागर कर दिया है। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल द्वारा विधानसभा में दिए गए स्पष्ट निर्देश—“तीन दिन के भीतर संलग्नीकरण समाप्त होगा”—अब कागज़ों तक सीमित नजर आ रहे हैं।

संलग्नीकरण का खेल: कागज़ पर खत्म, जमीन पर जारी!

राज्य शासन ने हाल ही में आदेश जारी करते हुए सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों (CMHO) को निर्देशित किया था कि वर्षों से विभिन्न कार्यालयों या संस्थानों में संलग्न कर्मचारियों को तीन दिन के भीतर उनके मूल पदस्थापना स्थल पर वापस भेजा जाए।

लेकिन बिलासपुर में हालात बिल्कुल उलट हैं। यहां संलग्नीकरण समाप्ति का “खेल” सिर्फ फाइलों में खेला जा रहा है, जबकि धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है।

सूत्रों के मुताबिक, संभाग में करीब 200-250 कर्मचारियों का वर्षों से संलग्नीकरण किया गया है। इनमें से महज 40-45 कर्मचारियों का संलग्नीकरण कागज़ों में समाप्त दिखाया गया है, लेकिन वास्तविकता यह है कि वे आज भी पुराने स्थानों पर ही कार्यरत हैं।किसी को कार्यमुक्त नहीं किया गया है ।

डॉ. रक्षित जोगी का मामला बना प्रतीक!

इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा उदाहरण हैं डॉ. रक्षित जोगी, जो नाक, कान और गला (ENT) के विशेषज्ञ हैं। उनकी मूलपदस्थापना बिल्हा में है, लेकिन वर्षों से वे CMHO कार्यालय बिलासपुर में संलग्न हैं।

इसका सीधा असर बिल्हा ब्लॉक के हजारों ग्रामीणों पर पड़ रहा है। यहां के मरीजों को छोटी-छोटी बीमारियों के इलाज के लिए जिला अस्पताल, सिम्स बिलासपुर या निजी अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

बिल्हा के ग्रामीणों की उम्मीदें फिर टूटीं!

जब स्वास्थ्य मंत्री ने विधानसभा में घोषणा की कि तीन दिनों में संलग्नीकरण खत्म कर दिया जाएगा, तब बिल्हा क्षेत्र के ग्रामीणों में उम्मीद जगी थी। उन्हें लगा था कि अब उनके क्षेत्र में विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध होंगे और इलाज के लिए भटकना नहीं पड़ेगा।

लेकिन तीन दिन क्या, उससे ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। ग्रामीणों की उम्मीदें एक बार फिर टूटती नजर आ रही हैं।

अधिकारियों की चुप्पी और टालमटोल!

इस मामले में जब वर्तमान CMHO बिलासपुर से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने फोन तक उठाना उचित नहीं समझा। वहीं बिल्हा के खंड चिकित्सा अधिकारी ने साफ कहा कि डॉ. जोगी उनके यहां पदस्थ हैं, लेकिन उन्हें वर्षों से CMHO कार्यालय में संलग्न रखा गया है।”

संभागीय संयुक्त संचालक डॉ. अनिल गुप्ता से जब इस विषय पर सवाल किया गया कि उन्होंने अब तक संलग्नीकरण समाप्त करने के आदेश CMHO स्तर पर क्यों जारी नहीं किए, तो उनका जवाब और भी चौंकाने वाला था—
“आपने अपनी बात रख दी, मैं अपने हिसाब से आदेश जारी करूंगा, प्रक्रिया में है।”

यह बयान अपने आप में यह संकेत देते है कि शासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद स्थानीय स्तर पर अफसर अपनी मनमानी कर रहे हैं।मतलब मंत्री जी के आदेश से नहीं चलेगा विभाग विभाग अधिकारियों के आदेश से चलेगा।

नियमों की अनदेखी का पुराना इतिहास!

जानकारी के अनुसार, डॉ. अनिल गुप्ता सम्भागीय संयुक्त संचालक बिलासपुर के अल्प अवधि के कार्यकाल में लगातार नियमों के विपरीत संलग्नीकरण किए गए हैं। 2022 से पदस्थ रहे तत्कालीन सम्भागीय संयुक्त संचालकों द्वारा संलग्नीकरण का खेल खेला जाता रहा जिसके कारण 200-250 चिकित्सक एवं कर्मचारी संलग्न रहकर कार्यरत  है शासन के स्थायी निर्देशों की अनदेखी करते हुए बड़ी संख्या में कर्मचारियों को अन्यत्र अटैचमेंट किया गया।

साथ ही डॉ. अनिल गुप्ता के द्वारा मात्र डेढ़ माह की अवधि में लिपिक संवर्ग में भी अपात्रों को पदोन्नति दी गई है।जिसमें दिनांक 16/03/2026 को पदोन्नति सूची जारी की गई है उसमें भी जिसका वेटिंग लिस्ट में नाम उल्लेख नहीं है उसको भी पदोन्नति दी गई है। जारी पदोन्नति सूची में भी अनि- यमितताओं के आरोप लगे हैं।

बड़ा सवाल: आदेश या दिखावा?

•अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है—क्या स्वास्थ्य मंत्री के आदेश सिर्फ औपचारिकता थे?

•क्या यह पूरा अभियान सिर्फ दिखावे के लिए चलाया गया?

अगर बिलासपुर जैसे प्रमुख संभाग में ही स्वास्थ्य मंत्री के आदेशों का पालन नहीं हो रहा है, तो बाकी जिलों की स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।

मरीजों की कीमत पर अफसरशाही?

सबसे गंभीर पहलू यह है कि इस पूरे मामले का खामियाजा आम जनता—खासतौर पर ग्रामीण मरीजों—को भुगतना पड़ रहा है।

बिल्हा क्षेत्र के लोग, जो पहले से ही स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं, अब एक विशेषज्ञ डॉक्टर की अनुपलब्धता के कारण और अधिक परेशान हो गए हैं।

यह स्थिति न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे अफसरशाही के फैसले सीधे तौर पर जनता के स्वास्थ्य और जीवन को प्रभावित कर रहे हैं।

अब निगाहें बिलासपुर CMHO पर!

अब सबकी नजरें CMHO बिलासपुर पर टिकी हैं।

•क्या वे शासन के आदेशों का पालन करते हुए डॉ. रक्षित जोगी को उनके मूल पदस्थापना स्थल बिल्हा में कार्यमुक्त करेंगी?

•या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा और मरीज यूं ही इलाज के लिए भटकते रहेंगे?

आदेश बनाम हकीकत की जंग!

बिलासपुर का यह मामला सिर्फ एक जिले की कहानी नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।

जहां एक ओर सरकार पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर अधिकारी उन्हीं आदेशों को ठेंगा दिखाते नजर आ रहे हैं।

अब देखना यह होगा कि शासन इस मामले में सख्ती दिखाता है या फिर “संलग्नीकरण समाप्ति” का यह खेल यूं ही चलता रहेगा—कागज़ों में सुधार और जमीन पर अव्यवस्था के साथ।

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