“ट्रैक्टर बना एम्बुलेंस: लोहाराटांड़ की प्रसव पीड़ा में डूबा विकास का सच!”
Balrampur/छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में एक बार फिर सरकार की “विकास गाथा” की हकीकत ज़मीन पर बिखरती नजर आई, जब लोहाराटांड़ गांव की एक गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए ट्रैक्टर का सहारा लेना पड़ा। शंकरगढ़ ब्लॉक के इस आदिवासी गांव में बुनियादी सुविधाओं की घोर कमी एक बार फिर सामने आई है, जो न केवल सवाल खड़े करती है, बल्कि शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता को भी उजागर करती है।
बारिश बनी अभिशाप, सड़क बनी दलदल!
लोहाराटांड़ गांव की सड़कों की हालत ऐसी है कि सामान्य दिनों में भी पैदल चलना मुश्किल है। पर जब बारिश होती है, तब यह रास्ते कीचड़, दलदल और खतरों की सुरंग बन जाते हैं। ऐसे में अगर कोई बीमार हो जाए या गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा होने लगे, तो हालात नरक से भी बदतर हो जाते हैं।
पोल खुली जब ऐसा मंजर को देखने को मिला, जब पहाड़ी कोरवा जनजाति से ताल्लुक रखने वाली एक गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा होने लगी। परिवार वालों ने तुरंत इलाज के लिए प्रशासन से मदद मांगनी चाही, पर मोबाइल नेटवर्क नदारद और रास्ते में एम्बुलेंस पहुंचने का तो सवाल ही नहीं था। अंततः ग्रामीणों ने ट्रैक्टर का सहारा लिया और गर्भवती महिला को उसमें लादकर अस्पताल पहुंचाया।
ट्रैक्टर पर दर्द से कराहती रही महिला!
गड्ढों से भरे रास्तों पर ट्रैक्टर झूलता रहा, और महिला दर्द से कराहती रही। न कोई सुविधा, न कोई सुरक्षा, न कोई स्वास्थ्य कर्मी साथ — मानो 21वीं सदी की नहीं, बल्कि किसी आदिम युग की तस्वीर पेश हो रही थी। ट्रैक्टर को अस्पताल पहुंचने में करीब दो घंटे लगे। यह ट्रैवल केवल किलोमीटरों का नहीं, बल्कि इंसानियत और संवेदनशीलता के पतन का प्रतीक बन गया।
“जन मन योजना” सिर्फ कागज़ों पर?
जिस महिला को ट्रैक्टर पर लादकर अस्पताल लाया गया, वह पहाड़ी कोरवा जनजाति की है — यह समुदाय विशेष पिछड़ी जनजातियों में आता है, जिन्हें सरकार “जन मन योजना“ के अंतर्गत विशेष सुविधाएं देने का दावा करती है। पर जब ज़रूरत पड़ी, तो न कोई स्वास्थ्य सहायक था, न एम्बुलेंस, न सड़क। सवाल उठता है — क्या यह योजना केवल कागज़ों में है? क्या इन समुदायों तक असल लाभ नहीं पहुंच रहा?
ग्रामीणों की गुहार अनसुनी!
ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने इस बदहाली की शिकायत कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से की है। लेकिन हर बार आश्वासन मिला, काम नहीं। उनका कहना है कि “विकास की गाड़ी” शायद शहरों में ही दौड़ रही है, गांवों के लिए वह सिर्फ चुनावी भाषणों में रह गई है। लोहाराटांड़ गांव को न सड़क मिली, न पुल, न संचार सुविधा — और अब यह मामला पूरे जिले में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल बनकर उभरा है।
स्वास्थ्य विभाग की बेतुकी सफाई!
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी का बयान भी चौंकाने वाला है। उन्होंने कहा कि “ग्रामीणों ने 102 एम्बुलेंस सेवा को कॉल नहीं किया”। लेकिन जब गांव में नेटवर्क नहीं, सड़क नहीं, तो कॉल कैसे हो? क्या प्रशासन इस बुनियादी सच से अनजान है या जानबूझकर अनदेखी कर रहा है? अधिकारी ने यह भी बताया कि महिला को अब बेहतर इलाज के लिए अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया है। पर क्या यह रेफर ही समाधान है?
बलरामपुर में यह कोई पहली घटना नहीं!
यह पहली बार नहीं है जब बलरामपुर जिले में ऐसा मामला सामने आया है। कुछ दिन पहले एक महिला को नदी पार कर अस्पताल ले जाने की कोशिश हुई, पर पुल न होने के कारण उसे खुले आसमान के नीचे ही डिलीवरी करनी पड़ी। इन घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि जिले में प्रसव जैसी अत्यावश्यक स्थितियों से निपटने की तैयारी बेहद कमजोर है।
राजनेताओं और अधिकारियों की चुप्पी!
जहां एक ओर इस घटना पर सोशल मीडिया में जनता उबल रही है, वहीं दूसरी ओर संबंधित जनप्रतिनिधि और अधिकारी अभी तक चुप हैं। न कोई बयान, न कोई मुआवजा, न ही कोई निरीक्षण। सवाल यह है — क्या आदिवासी और ग्रामीण जनता की जिंदगी का कोई मोल नहीं है?
क्या यह “न्याय का अधिकार” है?
छत्तीसगढ़ सरकार “गर्व से कहो हम न्याय की धरती पर हैं” जैसे नारे देती है। लेकिन जब एक गर्भवती महिला को ट्रैक्टर पर अस्पताल जाना पड़े, तो ये नारे खोखले लगते हैं। क्या यह न्याय है? क्या यह सम्मान है? या फिर यह सिस्टम की वो लाचारी है जो केवल चुनावी नारों में न्याय का सपना दिखाता है?
बलरामपुर की यह घटना हमें झकझोरती है — कि जब तक सड़कों तक एम्बुलेंस नहीं पहुंचेगी, तब तक गर्भवती महिलाओं की चीखें, ट्रैक्टर की धड़कनों में दबती रहेंगी, और विकास केवल रिपोर्ट कार्डों में चमकता रहेगा।