“जंगल में मंगल: सरकारी दफ्तर बना ‘राजनीतिक रिसॉर्ट’! मंत्री जी को ‘सप्राइज पार्टी’ में बुलाना भूल गए अफसर!”
Raipur/छत्तीसगढ़ के जंगलों में इन दिनों बाघ, हिरण और बंदरों से ज्यादा चर्चा अगर किसी की है, तो वह है—सरकारी दफ्तर में खुला नया ‘राजनीतिक अखाड़ा’! जी हां, जहां पहले फाइलों की सरसराहट और पेड़ों की सरगोशियां सुनाई देती थीं, अब वहां राजनीतिक बहसों की गूंज और चाय की चुस्कियों के बीच रणनीतियां पक रही हैं।
मामला है छत्तीसगढ़ के वन विभाग के उस राजा तालाब स्थित पुराने जंगल सफारी कार्यालय परिसर का, जिसे अब कुछ जुगाड़ू दिमागों ने “राजनीतिक ऊर्जा केंद्र” में तब्दील कर दिया है।
जंगल सफारी से ‘राजनीतिक सफारी’ तक का सफर!
कहते हैं, बदलाव प्रकृति का नियम है… लेकिन यहां तो प्रकृति ही बदल गई!जहां पहले वन्यजीवों की सुरक्षा पर चर्चा होती थी, अब वहां “कौन किसका समर्थन करेगा” जैसे गंभीर (और कभी-कभी मनोरंजक) मुद्दों पर बहस होगी।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, बिना किसी टेंडर, बिना किसी स्वीकृति और बिना किसी “ऊपर वाले” (यहां ऊपर वाला मतलब भगवान नहीं, मंत्री जी हैं) की जानकारी के—एक नया वन विभाग का कर्मचारी संघ कार्यालय खोल दिया गया।
उद्घाटन: विभागीय मंत्री गायब, अफसर लाजवाब!
इस ऐतिहासिक (और हास्यप्रद) उद्घाटन का मुख्य आकर्षण थे वही श्रीनिवास राव जो वन विभाग के मुखिया है जिनके करकमलों से इस “राजनीतिक प्रयोगशाला”का फीता काटा गया।मजेदार बात यह रही कि विभाग के मंत्री केदार कश्यप को इस कार्यक्रम की भनक तक नहीं लगी।लगता है इस बार
“सरप्राइज पार्टी” कुछ ज्यादा ही सरप्राइज हो गई!
लोग चुटकी ले रहे हैं—“मंत्री जी को बुलाते तो कार्यक्रम सरकारी हो जाता, नहीं बुलाया तो ‘प्राइवेट लिमिटेड’ बन गया!”
अंदर की कहानी: ऑफिस या ‘पॉलिटिकल कैफे’?
कार्यालय के अंदर का नजारा भी कम दिलचस्प नहीं है।
जहां एक ओर अधिकारी गंभीर मुद्रा में बैठते हैं, वहीं दूसरी ओर चाय के कप के साथ “राजनीतिक समीकरण” बनाए जाएंगे।और दिलचस्प बात यह कि उस कार्यालय में एक विश्राम गृह भी बनाया गया है जिसमें AC से लेकर विश्राम की व्यवस्था है।
“अब फाइल कम और बहस ज्यादा चलेगी … जंगल बचाने से ज्यादा कुर्सी बचाने की चिंता होगी!”
कायाकल्प फंड का फंडा: पैसा आया कहां से?
अब सबसे बड़ा सवाल—इस कार्यालय को सजाने-संवारने में पैसा किसका लगा?
•क्या यह सरकारी फंड से हुआ?
•या फिर “चंदा” नामक रहस्यमयी स्रोत से?
•या फिर जंगल के पेड़ों ने खुद ही सहयोग कर दिया?
इस सवाल पर अधिकारी चुप हैं, और चुप्पी इतनी गहरी है कि जंगल के सन्नाटे को भी शर्म आ जाए।
पुरानी खबर, नया तमाशा विभाग अभी तक कुंभकर्ण निंद्रा में!
यह पहला मौका नहीं है जब इस तरह का मामला सामने आया हो।पहले भी इस विषय को हमने अपने पोर्टल के माध्यम से प्रमुखता से उठाया गया था, लेकिन उच्च अधिकारियों ने शायद इसे “कॉमेडी शो” समझकर नजरअंदाज कर दिया। पर इस बार मामला थोड़ा ज्यादा “सीरियस कॉमेडी” बन गया है—क्योंकि बात अब सीधे सरकारी परिसर और नियमों की हो रही है। जिसका थिएटर का फीता उसी विभाग के मुखिया ने काटा है।

पंडरी से सफारी तक: कार्यालयों की यात्रा!
सूत्र बताते हैं कि पहले से ही पंडरी स्थित वन विभाग परिसर में संघ का कार्यालय मौजूद है। फिर सवाल उठता है—जब एक ऑफिस था, तो दूसरा खोलने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या विभाग के पैसा का गबन का नया फंडा अपनाया गया है?
क्या यह “वन विभाग विस्तार योजना” है या “राजनीतिक शाखा विस्तार मिशन”?
वन्यजीवों की प्रतिक्रिया (काल्पनिक लेकिन सटीक!)
अगर जंगल के जानवर बोल पाते, तो शायद कहते—बाघ: “हम तो अपने क्षेत्र में ही रहते हैं, ये इंसान हर जगह राजनीति ले आते हैं!”
हिरण: “हमें तो अब डर शिकारियों से नहीं, बहसों से लगता है!”
बंदर: “हम पर तो उछल-कूद का आरोप था, असली उछलकूद तो यहां हो रही है!”
संघ का पक्ष: ‘एकता और विकास’!
संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि यह कार्यालय कर्मचारियों की एकता, समर्पण और संघर्ष का प्रतीक है।उनके अनुसार, यह नई ऊर्जा और दिशा देने वाला केंद्र बनेगा।प्रदेश अध्यक्ष अजीत दुबे और अन्य पदाधिकारियों को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी गई है।कार्यक्रम में कई वरिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी मौजूद रहे, जिससे आयोजन भव्य और सफल बताया जा रहा है।
जनता का सवाल: नियम कहां गए?
लेकिन आम जनता और कुछ कर्मचारियों के मन में सवाल अभी भी गूंज रहा है—
• क्या सरकारी कार्यालय में इस तरह का उद्घाटन नियमों के तहत हुआ?
• क्या मंत्री की जानकारी के बिना ऐसा करना उचित है?
• क्या कर्मचारी अब नौकरी कम और राजनीति ज्यादा करेंगे?
जांच की मांग: ‘कॉमेडी का क्लाइमेक्स’!
अब इस पूरे मामले में उच्च स्तरीय जांच की मांग उठ रही है।लोग चाहते हैं कि यह पता लगाया जाए कि—
•कार्यालय किस अनुमति से खुला?
•पैसा कहां से आया?
•और सबसे जरूरी—मंत्री जी को क्यों नहीं बुलाया गया?
अंतिम दृश्य: जंगल में राजनीति का नया अध्याय कुल मिलाकर, यह पूरा मामला एक ऐसी फिल्म जैसा लग रहा है, जिसमें—हीरो: अधिकारी विलेन: नियम-कानून
और कॉमेडियन: पूरा सिस्टम!
अब देखना यह है कि यह “राजनीतिक सफारी” आगे क्या रंग दिखाती है—क्या यहां फिर से जंगल की बातें होंगी या राजनीति की बेलें और फैलेंगी?
एक बात तो तय है—छत्तीसगढ़ के इस वन विभाग ने यह साबित कर दिया है कि जंगल सिर्फ पेड़ों का नहीं, बल्कि विचारों (और कभी-कभी विचारधाराओं) का भी होता है!












