कानून बनाम कानून: पिथौरा तहसील में न्याय की धज्जियां!एक कलम, दो फैसले एक तहसीलदार ने दूसरे के आदेश को ठुकराया!”
Mahasamund/महासमुंद जिले के पिथौरा तहसील न्यायालय में इन दिनों ऐसा कानूनी घमासान देखने को मिल रहा है, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र और न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला इतना उलझा हुआ है कि यहां एक नहीं, बल्कि दो “कानून” आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं—और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह टकराव किसी आम व्यक्ति के बीच नहीं, बल्कि स्वयं तहसीलदारों के आदेशों के बीच हो रहा है।

यह पूरा विवाद तब सामने आया जब एक ही भूमि, एक ही खसरा नंबर और एक ही पक्षकारों के मामले में अलग-अलग समय पर अलग-अलग तहसीलदारों द्वारा दिए गए आदेशों में भारी विरोधाभास देखने को मिला। सूत्रों के अनुसार, तत्कालीन तहसीलदार नितिन ठाकुर द्वारा दिए गए आदेश को वर्तमान तहसीलदार मनीषा देवांगन ने केवल नजरअंदाज किया, बल्कि उसे “डस्टबिन” में डालने जैसा व्यवहार करते हुए नया आदेश जारी कर दिया।
“ब-121 से अ-70 तक: कागज पर बदला गया कानून!”
मामले की जड़ में जाएं तो पता चलता है कि इससे पहले इसी प्रकरण को तत्कालीन तहसीलदार नमिता मारकोले द्वारा राजस्व संहिता की मद ब-121 के तहत “विविध सामान्य राजस्व प्रकरण” के रूप में दर्ज किया गया था। उस समय इस प्रकरण को विधिवत न्यायालयीन प्रक्रिया के तहत सुनवाई के लिए लिया गया था।

लेकिन जैसे ही पदस्थापना बदली और वर्तमान में तहसीलदार मनीषा देवांगन ने कार्यभार संभाला, पूरे मामले की दिशा ही बदल गई। आरोप है कि उन्होंने बिना किसी बिना वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए, पहले से दर्ज “मद ब-121” प्रकरण को पेन से काटकर “मद अ-70” में परिवर्तित कर दिया। जो राजस्व न्यायालय कानून प्रकिया के विपरीत है।
यह कदम न केवल प्रशासनिक दृष्टि से असामान्य है, बल्कि कानूनी रूप से भी गंभीर अनियमितता की श्रेणी में आता है। क्योंकि किसी भी प्रकरण का मद आवेदक के आवेदन के आधार पर दर्ज किया जाता है परंतु तहसीलदार पिथौरा द्वारा ब -121 के मद में दर्ज प्रकरण को अ -70 बिना किसी सीमांकन के एवं प्रकरण में हुएं जांच में बिना अनावेदक की उपस्थिति के सिर्फ हल्का पटवारी के प्रतिवेदन पर मामला दर्ज कर बेदखली की कार्यवाही करना विधि विपरीत है
“न्यायालय में बिना गवाही, सीधे बेदखली का फरमान!”
इस पूरे प्रकरण में सबसे विवादास्पद पहलू यह सामने आया कि तहसीलदार मनीषा देवांगन द्वारा बिना आवेदक और अनावेदक—दोनों पक्षों की गवाही लिए ही अनावेदक को भूमि से बेदखल करने का आदेश जारी कर दिया गया।
मामले में आवेदक अरविंद नेताम ने 14 जुलाई 2025 को रवि कुमार ठाकुर के खिलाफ आवेदन प्रस्तुत किया था, जिसमें भूमि स्वामी हक की जमीन पर अवैध निर्माण को रोकने की मांग की गई थी। इस आवेदन को ब-121 के तहत दर्ज कर अनावेदक को नोटिस भेजा गया।
जब अनावेदक न्यायालय में उपस्थित हुआ, तो उसने स्पष्ट रूप से आपत्ति दर्ज कराई कि इसी विषय, इसी खसरा नंबर और उन्हीं पक्षकारों के बीच वर्ष 2022-23 में पहले ही प्रकरण चल चुका है, जिसे उसी न्यायालय द्वारा यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था कि वाद भूमि में निर्मित मकान बना हुआ हैआवेदक सक्षम न्यायालय से अनुतोष प्राप्त कर सकता है।
इसके बावजूद, इन तथ्यों को दरकिनार करते हुए वर्तमान तहसीलदार मनीषा देवांगन द्वारा 6 अप्रैल 2026 को एकतरफा आदेश अनावेदक के विरुद्ध पारित कर दिया गया,और उसी दिन अनावेदक के विरुद्ध बेदखली वारंट जारी कर दिया गया जिसमें अनावेदक को उक्त भूमि से बेदखल करने का निर्देश दिया गया।
“अपील अवधि खत्म होने से पहले ही कार्रवाई!”
कानूनी जानकारों के अनुसार, किसी भी न्यायिक आदेश के खिलाफ अपील करने के लिए एक निर्धारित समय सीमा होती है। लेकिन इस मामले में आरोप है कि आदेश पारित होते ही अपील अवधि समाप्त होने का इंतजार किए बिना ही बेदखली की प्रक्रिया शुरू कर दी गई।
सूत्र बताते हैं कि प्रशासनिक अमला तेजी से कार्रवाई की तैयारी में जुट गया है, और 13 अप्रैल 2026 को स्वयं तहसीलदार मनीषा देवांगन मौके पर पहुंचकर कब्जा दिलाने की तैयारी कर रही हैं।इससे यह प्रतीत होता है कि तहसीलदार मनीषा देवांगन मामले को व्यक्तिगत लेकर वंदे भारत ट्रेन में बैठकर अनावेदक की वाद भूमि को आवेदक को कब्जा दिलाने की तैयारी कर रही है।
“राजनीतिक दबाव या प्रशासनिक मनमानी?”
इस पूरे घटनाक्रम ने तब और तूल पकड़ लिया जब यह चर्चा सामने आई कि इस कार्रवाई के पीछे जनपद पंचायत अध्यक्ष के पति का दबाव काम कर रहा है। हालांकि इस आरोप की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन स्थानीय स्तर पर इस चर्चा ने माहौल को और गरमा दिया है।
•क्या तहसीलदार मनीषा देवांगन राजनीतिक प्रतिनिधियों की निज सचिव बन गई है ?
•क्या अब पिथौरा तहसील किसान और आम आदमी के न्याय का मंदिर कम राजनीतिक और दलालों का अखाड़ा बन चुका है?
यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला केवल प्रशासनिक अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह सत्ता के दुरुपयोग और न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप का गंभीर उदाहरण बन सकता है।
“मैं ही राजा, मैं ही मंत्री?”
पूरे घटनाक्रम को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि तहसील कार्यालय में नियम-कानून की बजाय व्यक्तिगत निर्णय हावी हो गए हैं। एक ही मामले में अलग-अलग आदेश, बिना सही जांच व कानूनी प्रक्रिया के मद परिवर्तन, गवाही के बिना निर्णय, और अपील अवधि की अनदेखी—ये सभी संकेत देते हैं कि कहीं न कहीं न्यायिक मर्यादा का उल्लंघन हो रहा है।
स्थानीय लोगों और कानून विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह एक खतरनाक मिसाल बन सकती है, जहां प्रशासनिक अधिकारी अपने अधिकारों का मनमाना उपयोग करने लगेंगे।
“अब नजरें वरिष्ठ न्यायालय पर टिकी है!
इस पूरे प्रकरण के बाद अब सभी की निगाहें वरिष्ठ न्यायालय और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया जाएगा या फिर पीड़ित पक्ष को न्याय पाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ेगी।
पिथौरा तहसीलदार पहले से विवादित रही है न्याय की कुर्सी पर विवादित अधिकारी बैठाना उचित नहीं है। फिलहाल, पिथौरा तहसील का यह मामला केवल एक जमीन विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह “कानून बनाम कानून” की ऐसी जंग बन चुका है, जिसने न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।












